धंधे में बरकत
सूरज की किरणें परदों से छन छन कर अंदर तक आ रही थीं । बाहर पेड़ों पर खगकुल परिहास करने लगा था। उनके उसी परिहास की चूं-चूं कानों में टकरा रही थी। आँखों में कुछ अजीब सा महसूस होने लगा था तभी चादर को ऊपर तक खींचकर अपना चेहरा ढक लिया था छुटकी ने देर तक सोने की इच्छा से। चादर को ऊपर तक खींचकर सिर ढका ही था तभी घर की डोर बेल बजी छुटकी ने एक दम अपना चादरा को दूर फेंक दिया और उठ खड़ी हुई दरवाजे की तरफ जाने के लिये। "बेटा और सो ले थोड़ी देर।" माँ ने कहा। लेकिन बेटा सबसे पहले गेट पर। ऐसा इसलिये नहीं कि कोई द्वार पर आया है ऐसा इसलिए क्योंकि उसके दादा जी प्रातः काल को सैर से वापस जो आ गए थे । पिछले एक महीने से उस पर विशेष प्यार उड़ेल रहे थे। बिना टॉफी, बिना चॉकलेट घर में घुसते ही नहीं थे। इन्हीं टॉफियों और चॉकलेटों ने छुटकी को चादरा छोड़ने पर मजबूर कर दिया था। मम्मी 10 बजे तक मुश्किल से जगा पाती थी लेकिन आजकल पहली डोर वेल पर उपस्थित हो जाती थी। छदामी लाल अपनी पोती पर पिछले एक महीने से बडे दयालु थे। उसकी हर इच्छा पूरी करते थे। नये खिलौने भी आ गए,नई फ्रॉक भी और प्रतिदिन ...