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मई, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

धंधे में बरकत

सूरज की किरणें परदों से छन छन कर अंदर तक आ रही थीं । बाहर पेड़ों पर खगकुल परिहास करने लगा था। उनके उसी परिहास की चूं-चूं कानों में टकरा रही थी। आँखों में कुछ अजीब सा महसूस होने लगा था तभी चादर को  ऊपर तक खींचकर अपना चेहरा ढक लिया था छुटकी ने देर तक सोने की इच्छा से। चादर को ऊपर तक खींचकर सिर ढका ही था तभी घर की डोर बेल बजी छुटकी ने एक दम अपना चादरा को दूर फेंक दिया और उठ खड़ी हुई दरवाजे की तरफ जाने के लिये। "बेटा और सो ले थोड़ी देर।" माँ ने कहा। लेकिन बेटा सबसे पहले गेट पर। ऐसा इसलिये नहीं कि कोई द्वार पर आया है ऐसा इसलिए क्योंकि उसके दादा जी प्रातः काल को सैर से वापस जो आ गए थे ।  पिछले एक महीने से उस पर विशेष प्यार उड़ेल रहे थे। बिना टॉफी, बिना चॉकलेट घर में घुसते ही नहीं थे। इन्हीं टॉफियों और चॉकलेटों ने छुटकी को चादरा छोड़ने पर मजबूर कर दिया था। मम्मी 10 बजे तक मुश्किल से जगा पाती थी लेकिन आजकल पहली  डोर वेल  पर उपस्थित हो जाती थी। छदामी लाल अपनी पोती पर  पिछले एक महीने से बडे दयालु थे। उसकी हर इच्छा पूरी करते थे।  नये खिलौने भी आ गए,नई फ्रॉक भी और प्रतिदिन ...

तथास्तु - निगेटिव हो जाओ

एक बार एक कहावत सुनी थी कि प्रभु के समक्ष जो माँगते हैं  वही मिलता है। उदाहरण के लिये प्रभु का हाथ हमेशा ऊपर होता है आशीर्वाद की मुद्रा में । जब कहते हैं कि प्रभु हम जीत जाएं तो प्रभु वहीं से कहते हैं 'तथास्तु', अर्थात ऐसा ही हो , और यदि कहीं निकल गया प्रभु हम कहीं हार न जाएं। प्रभु फिर भी वही कहेंगे 'तथास्तु' अर्थात अब हमारे ऊपर है कि हम किस पर 'तथास्तु' कहलाना है। किसलय के दिमाग में यही चल रहा था कुन्तु आज कुछ ज्यादा ही चल रहा था पता नहीं एक कहानी कहाँ से उसके दिमाग मे घुस गयी जो सहसा निकल ही नहीं रही थी। किसलय बचपन से बड़ी होनहार थी,अपनी कक्षा में अब्बल आया करती थी। सभी साथी उसका लोहा मानते थे। और पूरे वर्ष इस बात की प्रतिस्पर्धा रहती थी कि अब्बल कौन आएगा। लेकिन उनके मन में वही रहता था कि कक्षा में अब्बल ही आना है।  इसीलिए शायद उसे 'तथास्तु' का वरदान मिलता रहा। इधर किसलय इसी सोच में डूबी अपने परिवार की  और आस पड़ौस की सेवा में लगी हुई थी। उसका पूरा परिवार और कुछ पड़ौसी भी कोरोना संक्रमण की चपेट में थे ।घर के सभी सदस्य पॉजिटिव पाये गए थे केवल किसलय को छोड़...

नीली पॉलीथिन (कहानी)

अचानक नींद खुली तो अजीब सा महसूस किया शर्मा जी ने। दो बार आँखों को मला शायद कोई स्वप्न हो लेकिन फिर वही पुनः खाँसने की तेज आवाज सुनाई दी। रात का समय बाहर निकल नहीं सकते बिना किसी काम के। फिर कहीं  एक बार तन्द्रा टूटी तो रात काली। यही सोचकर लेटने ही वाले थे फिर खाँसने की आवाज सुनाई दी । इस बार कुछ पहचानी सी आवाज लगी ,थोड़ा ध्यान से सुना तो ये कोई और नहीं बल्कि बगल वाले घर से नायब  साहब लगातार खांस रहे थे। शर्मा जी की मानवीयता  कुछ जाग्रत हुई सोचा फोन करके तो कम से कम पता ही लगालें आखिर पड़ौस धर्म भी यही कहता है। शर्मा जी ने मोबाइल उठाया ही था   फोन करने के लिये अनायास पिछली वर्ष की बात याद आ गयी कि नायाब साहब ने सोसाइटी में कितना बड़ा फंक्शन किया था अपने बेटे की शादी के बाद। इकलौता बेटा आरव शादी के बाद  अपनी जॉब के सिलसिले में पत्नी सहित विदेश चला गया था। बड़ा होनहार बालक, बड़ा आज्ञाकारी सबसे दुआ सलाम। कभी किसी से ऊँची आवाज में बात नहीं सुनी । पूरी सोसाइटी तारीफ करती है उसकी। आज वह घर से दूर है तो चलो उनका हालचाल पूछ लेते हैं। घन्टी घिन घिनाकर शांत हो गयी। केवल व...

ऑनलाइन क्रिया (कहानी)

बाबू जी कैसे हैं आप? अपना ध्यान रखना दवाई टाइम से लेते रहना, किसी भी प्रकार की आवश्यकता हो हमें बताये, बेटे ने व्हाट्सऐप वीडियो कॉल करके कहा । "हाँ बेटा तू अपना ध्यान रखना तो बिल्कुल अकेला है।" वहाँ इतना कहते हुए फोन रख दिया। दीनानाथ जी बहुत खुश थे अपने इकलौते बेटे अनमोल से। हों भी क्यों न अमेरिका में रहते हुए भी प्रतिदिन कॉल करके पूछ लेता था। कितना संस्कारी बेटा था। अपने कुर्ते पर हाथ फेरते हुए देखो कितने अच्छे कपड़े मंगवाता है,हाथ पर बंधी घड़ी, मोबाईल दीवार पर चलचित्र देखने के लिये स्मार्ट टीवी और न जाने कितनी चीजें ऑनलाइन मंगाता रहता था अपने बाबूजी के लिए। पास पड़ौस वाले जलते थे उसके बेटे की तरक्की से। बाबूजी भी सब समझते थे।लेकिन कुछ नहीं कहते थे किसी से। पड़ौस के कुछ लोग रोजाना आकर उनके पास आकर बैठते थे। दीनानाथ जी कुछ न कुछ उन्हें जलपान अवश्य कराते क्योंकि बेटा ऑनलाइन सारी चीजें मंगा दिया करते थे। चलते चलते पड़ौसी पूछ लिया करते कोई चीज की जरूरत हो तो मंगा लेना हम आखिर आपके पड़ौसी हैं । यदि आपका बेटा नहीं है तो क्या हुआ हम सब हैं। बाबूजी जी की आज आँख नहीं लग रही थी। कुछ बैचेनी ...

एक सिलेण्डर ऑक्सीजन (कहानी)

आजकल सेठ धनीराम की तिजोरी घुँघरू बाँधकर नर्तन कर रही है अपने चारों तरफ के भरे हुए कोने सुखानुभूति दे रहें हैं। ऊपर से लगातार ठूँसे जा रहे अनगिनत नोट रखने की जगह नहीं बची है। दिन में दो बार बैंक भेजा जा रहा है कैश।  तिजोरी की चकाचौंध में सब कुछ भूल चके हैं सेठ जी केवल मशीन बने पैसे गिनने में लगे हैं ग्राहक से सीधे मुख बात ही नहीं कर रहें है। एक ग्राहक काफी देर से गिड़गिड़ा रहा था "'बाबूजी आपकी आपकी दुकान पर ऑक्सीमीटर और नेबुलाइजर मिल जाएगा क्या ? " थोड़ी देर सिर खुजलाते हुए क्या माँगा आपने? "बाबूजी एक नेबुलाइजर और एक ऑक्सीमीटर  बहुत जरूरी है मिल जाये तो बहुत मेहरबानी होगी। आपका जिंदगी भर एहसान नहीं भूलूँगा।" "अरे भाई थोड़ी देर पहले आये होते तो अवश्य दे देता। अभी -अभी एक ग्राहक फोन आ चुका है उसे देना है माफ करना भाई, वो भी  मजबूर है।" "अरे बाबूजी कैसे भी करिए हमें दे दीजिए जो मांगो सो ले लो पर मुझे  दे दो। जब वो आ जाए तो कहीं से भी और व्यवस्था कर लीजिए।" "अरे ऐसे थोड़े ही होता है एक ही बचा है हमारे पास जिसका फोन आया है वी भी अपना ही आदमी है। उस...

फ़र्ज़ (कहानी)

 फ़र्ज़- लम्बी लम्बी डगें भरते हुए आज यथावत लाल कुछ बेचैनी की मुद्रा  में हाँफते हुए चले जा रहे थे। तभी एकाएक मेरी नजर उनकी मुख मुद्रा पर पड़ी पहचानने में देर नहीं लगी क्योंकि वो साप्ताहिक मंडली के जुझारू साथी जो हैं, मैंने राम-राम करते हुए पूछ ही लिया  "भाई यथावत जी क्या हुआ, कैसे दौड़ लगाए जा रहे हो? कुछ परेशान कैसे दिख रहे हो।" इतना कहते हुए मैंने हाथ बढ़ाया उनसे मिलाने के लिये। यथावत जी दूर से ही हाथ जोड़कर बोले- ''भैया आज मुझसे दूर ही रहो। उसी चीनी राक्षस ने हमें घेर लिया है उसे ही टेस्ट कराने जा रहें हैं।' इतना कहते कहते दो तीन छींकें मार दी। मैं भी घबराकर थोड़ा पीछे हटा 'सोसल डिस्टेंसिंग' करने के लिये और झट से अपना हैंकी मुँह पर बाँध लिया। प्रक्टिकली तो मुझे भी दूरी बना लेनी थी किन्तु मित्र की इस कंडीशन को देखते हुए तरस आ रहा था। मन भागने को कर रहा था किन्तु दिल सहायता करने को और फ़र्ज़ निभाने को धड़क रहा था। आखिर धड़कते हुए दिल की आवाज़ सुनी और पूछ लिया, "आख़िर बात क्या है, परेशान कैसे हो? घर से कोई साथ नहीं आया तुम्हें दिखाने के लिये?" यथावत लाल यथार...

मोबाइल बोल रहा हूँ

मैं मोबाइल बोल रहा हूँ आज मैं बहुत परेशान हूँ और आपलोगों को कुछ आप बीती बताना चाहता हूँ। आज देश वैश्विक संकट कोरोना से जूझ रहा है। वहीं अपने देश में अपने प्रधानमंत्री श्री  मोदी जी ने सारे देश को लोकडाउन कर रखा है। सारे हिंदुस्तानी घर पर बैठे हए है मुझे पकड़कर। मुझे एक मिनट के लिए भी आराम नहीं दे रहें मैं भी वैसे ही सेवा कर रहा हूँ जैसे किसी हॉस्पिटल में डॉक्टर भगवान का अवतार लेकर कर रहें हैं।  मुझे भी थकावट महसूस होती है किंतु चैन नहीं । इंसान के कोरोना वायरस कहीं मेरे अंदर न आ जाये,यही डर सता रहा है। आदमी को तो आशोलेट किया जा रहा है किन्तु मेरे आइसोलेशन का चीरहरण हो रहा है , खैर !अब कर ही क्या सकता हूँ। मैं कोई आदमी तो हूँ नहीं लेकिन फिर भी इस संकट की घड़ी में पूरी मानवता के साथ खड़ा हूँ कंधा से कंधा मिलाकर, पल-पल की अपडेट दे रहा हूँ। ये सज्जन जो मोबाइल पर लिख रहें हैं अभी थोड़ी देर पहले बैठे हुए थे जब इन्हें थकान महसूस हुई तो लेटकर लिखने लगे किन्तु मोबाइल छोड़ने का नाम नहीं ले रहे हैं। जब मैं नहीं था तो ये रोज कलम लेकर डायरी में लिखा करते थे। अब ये भी आलसी हो गए हैं डायरेक...