नीली पॉलीथिन (कहानी)
अचानक नींद खुली तो अजीब सा महसूस किया शर्मा जी ने।
दो बार आँखों को मला शायद कोई स्वप्न हो लेकिन फिर वही पुनः खाँसने की तेज आवाज सुनाई दी। रात का समय बाहर निकल नहीं सकते बिना किसी काम के। फिर कहीं एक बार तन्द्रा टूटी तो रात काली।
यही सोचकर लेटने ही वाले थे फिर खाँसने की आवाज सुनाई दी ।
इस बार कुछ पहचानी सी आवाज लगी ,थोड़ा ध्यान से सुना तो ये कोई और नहीं बल्कि बगल वाले घर से नायब साहब लगातार खांस रहे थे।
शर्मा जी की मानवीयता कुछ जाग्रत हुई सोचा फोन करके तो कम से कम पता ही लगालें आखिर पड़ौस धर्म भी यही कहता है।
शर्मा जी ने मोबाइल उठाया ही था फोन करने के लिये अनायास पिछली वर्ष की बात याद आ गयी कि नायाब साहब ने सोसाइटी में कितना बड़ा फंक्शन किया था अपने बेटे की शादी के बाद।
इकलौता बेटा आरव शादी के बाद अपनी जॉब के सिलसिले में पत्नी सहित विदेश चला गया था।
बड़ा होनहार बालक, बड़ा आज्ञाकारी सबसे दुआ सलाम। कभी किसी से ऊँची आवाज में बात नहीं सुनी । पूरी सोसाइटी तारीफ करती है उसकी।
आज वह घर से दूर है तो चलो उनका हालचाल पूछ लेते हैं।
घन्टी घिन घिनाकर शांत हो गयी।
केवल वही आवाज खाँसने की। शर्मा जी को कुछ घबराहट हुई आखिर बात क्या है? पहले तो कभी ऐसा नहीं हुआ कि फोन न उठा हो वो हमेशा अपने पास ही रखते थे।
चलो दोबारा फिर मिलाते हैं फिर ट्राई किया बेनतीजा। चिंता बढ़ना लाज़मी था। अब शर्मा जी घर से बाहर निकल तो आये अपनी पत्नी के लाख विरोध के बाद लेकिन उनके घर में घुसने की हिम्मत नहीं कर पा रहे थे। शर्मा जी का दिल बैठा जा रहा था उसका कारण नायब साहब की खांसी नहीं बल्कि दो दिन लगातार पार्क में उनके साथ बैठे जो थे।
नायब साहब की खांसी देखकर मन बैठ रहा था। कहीं मुझे भी न हो जाये मेरे घर में तो कई लोग हैं कहीं वायरस ने जकड़ लिया तो कहीं के नहीं रहेंगें।
दिल नहीं मान रहा था आखिर शर्मा जी ने खिड़की से झाँककर देखा तो नायब साहब जमीन पर पड़े हैं और लगातार खांसे जा रहे हैं।
चिंता और प्रबल हुई तुरन्त उनके बेटे को कॉल लगाया जो विदेश में था। बेटा बड़ा चिंतित कुछ नहीं कर सकता था। फ्लाइट पहले से ही बंद कर रखी थी। शर्मा जी से ही आरव ने अनुरोध किया
"अंकल आप कुछ कोई एम्बुलेंस मिल जाये तो किसी हॉस्पिटल में पहुंच जाएं कुछ ट्रीटमेंट ही मिल जाये। आप अपने स्तर से देखिये मैं यहां से ट्राई करता हूँ।अंकल में आपका एहसान जिंदगी भर नहीं भूलूँगा।"
नहीं बेटा ऐसा मत बोलो मैं प्रयास कर रहा हूँ।
शर्मा जी रोज न्यूज देख रहे थे इसलिए कुछ नम्बर भी कलेक्ट कर लिए थे अपनी डायरी में ।
अब मिलाना शुरू किया कभी किसी हॉस्पिटल तो कभी किसी हॉस्पिटल। लेकिन निर्रथक कोई रेस्पॉन्स नहीं।
इतनी देर में कुछ पड़ौसी और भी एकत्रित हो गए थे,वो भी ट्राई करने लगे।
उनमें से कुछ तो ऐसे कहाँ बीमारी मोल लेने पर तुले हो। अब जो भी होगा सुबह देख लेंगे कहकर चलते बने।
विश्व व्यापी वायरस ने आज आदमी को इतना मजबूर कर दिया चाहकर भी दूसरे की हेल्प नहीं कर पा रहा था सब असहज अपने आपको बचाने में लगे हैं लेकिन बच कोई नहीं रहा।
शर्मा जी अब तक बीसियों फोन मिला चुके लेकिन कोई जबाब नहीं मिला कहीं से।
आख़िरकार एक किसी भले आदमी ने फोन तो उठा लिया जब देखा बार बार कॉल आ रही है इसलिए।
फोन उठाकर इतना ही हड़बड़ाहट में बोला मेरे इसी नम्बर पर व्हाट्सएप कर दो समस्या क्या है। जैसे ही फ्री होता हूँ तुरन्त आऊँगा।
मरता क्या न करता ऐसा ही किया सारी डिटेल लिखकर भेज दी और इंतजार करने लगे।
एक एक कर सभी पड़ौसी भी अपने अपने घरों को चले गए।
इधर शर्मा जी की पत्नी खिड़की से बार बार चिल्ला रहीं थी "सारे मोहल्ले का तुमने ही ठेका ले रखा हैं।"
"नहीं ऐसा नहीं है भागवान फोन ही तो मिलाकर एम्बुलेंस बुला रहा हूँ। इतना तो कर ही सकता हूँ। तुम बहुत जल्दी भूल जाती हो पिछले वर्ष जब तुम दर्द से कराह रहीं थी घर पर कोई नहीं था। तब नायब साहब ही थे जिन्होंने तुम्हें हॉस्पिटल ले जाकर भर्ती किया था जब तुम्हारा इतना बी पी बढ़ गया था। उस दिन नायब साहब वास्तव में भगवान के रूप में आये थे मेरी जिंदगी में।आज उन्हीं की बदौलत तुम बची हो। मैं तो अगले दिन लौट पाया था। उस दिन तुम्हें कुछ हो गया होता तो जिंदगीभर मैं तो पछताता रह जाता।"
"हाँ वो तो ठीक कह रहे हो धन्नू के पापा। फिर वो वक्त और था आज का वक्त और है। आज तो छूत की बीमारी है कोई जानबूझकर अपने गले नहीं लगाता।अब आ भी जाओ अंदर सुबह देख लेना।"
नायब साहब की खाँसी अब काफी थम चुकी थी। कभी-कभी एक या दो बार आ रही थी ।
इतना सन्तोष कर लिया सुबह तक ठीक हो जाएंगे।
अंदर चले गए शर्मा जी लेकिन नींद आंखों से बहुत दूर जा चुकी थी वही दृश्य घूम रहा था नायब साहब का।
वास्तव में व्यक्ति अपने कामों से याद किया जाता है शर्मा जी ने साक्षात देखा था नायब साहब का कार्य। सभी मोहल्ले वाले कितना आदर करते थे। लेकिन आज इस महामारी ने सबको दूर कर दिया है।
यही सोचते सोचते कब आँख लग गयी पता ही नहीं चला। सुबह पाँच बजे एक एम्बुलेंस के सायरन ने सबकी तन्द्रा तोड़ दी
सब अपने अपने घरों की खिड़कियों से झांक-झांककर देख रहे थे। एम्बुलेंस से तीन चार पी पी ई किट पहने डाक्टर कर्मचारी निकले उन्होंने दरवाजा तोड़ा अंदर चले गए बहुत देर तक नहीं निकले तो मन मे आशंका होने लगी सभी को ।
थोड़ी देर बाद बाहर आते हुए दिखे । जिज्ञासावश सभी की नजरें उसी गेट की तरफ थी । नीली पॉलीथिन में कुछ बंधा हुआ स्ट्रेचर पर कुछ पड़ा था।
कुछ लोग उस एरिया को सील कर रहे थे। सील करने के बाद एक बोर्ड चस्पा कर दिया । पूरे मोहल्ले में सायरन बजाकर कह दिया गया इस एरिया से कोई भी 10 दिन तक बाहर नहीं निकलेगा। यह एरिया कंटेन्मेंट जोन में हैं।
आज समझ में आ रहा था कंटेन्मेंट क्या होता है कोई न कोई नायब साहब जरूर कंटेन्मेंट जोन बनाकर चले जातें है। इतने फोन करने पर सिस्टम जाग गया होता तो शायद नायब साहब नीली पॉलीथिन में विदा नहीं होते। अब तो बस केवल दो आँसू ही बचे थे लुढ़कने के लिये वो अनायास ढरक गए।
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