जय जय माँ अम्बे
*जय जय माँ अम्बे*
श्रद्धा से घट स्थापना,अपनी करुण पुकार।
वरदहस्त सिर पर रखो,हमको करो दुलार।
जय जय माँ अम्बे ।
वृषभ पर आरूढ़ हैं, ले 'कर' में त्रिशूल।
शैल पुत्री धारण करें, दूजे 'कर' में फूल।
योगीजन विकसित करें,चक्रीय मूलाधार।
जय जय माँ अम्बे।
जिनके वृत से फल मिले,तप त्याग वैराग्य।
ब्रह्म चारिणी पूजकर , मिलता है सौभाग्य।
दूजे दिन की साधना, करें सुखी संसार।
जय जय माँ अम्बे ।
सिंह सवारी स्वर्ण रंग, अर्द्ध चंद्र है माथ।
तृतीय शक्ति आराधना, दें जीवन में साथ।
परम पदों के हित रहे, आराधन अधिकार।
जय जय माँ अम्बे।
मन्द हंसी अधरों रखें, कूष्माण्डा का रूप।
श्रद्धा से चौथे दिवस, अर्चन वन्दन धूप।
सुख समृद्धि देकर करें,भवसागर से पार।
जय जय माँ अम्बे।
शुभ्र वर्ण कमलासिनी,जननी भगवन स्कंद।
चित्तवृत्ति रहती नहीं, आराधन से मन्द।
पंचम दिन की शुद्धि भी, देती जग से तार।
जय जय माँ अम्बे।
कात्यायनि फलदायिनी,करें अलौकिक तेज।
छठवें दिन आशीष को, अन्तस रखें सहेज।
सर्वस्व न्योछावर भाव , करता है उद्धार।
जय जय माँ अम्बे।
कालरात्रि के रुप का ,सप्तम दिवस विधान।
शुभंकरी के तेज से, नित डरते शैतान ।
इनके पूजन मात्र से, खुले सिद्धि के द्वार।
जय जय माँ अम्बे।
महा गौरी फल दात्री , माँ का अष्टम रूप।
बिना भेद के फलित हों, सज्जन दुर्जन भूप।
मिटा कलुषता पा सकें,मंगलमय अभिसार।
जय जय माँ अम्बे।
सिद्धिदात्रि का नवदिवस,करे कामना पूर्ण।
नव दिवसों की साधना ,करें हमें सम्पूर्ण।
दुर्गा के नवरूप की ,महिमा अपरम्पार।
जय जय माँ अम्बे।
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