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जून, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

साइकिल का भूत(कहानी)

लक्ज़री कार में सवार युवक प्रसन्नचित होकर यही सोचता है कि हवा में विचरण कर रहा हूँ, मोटर ट्रक वाले भी यही सोचकर मुदित होते हैं कि मेरे उपयोग के लिये ही इस सड़क का निर्माण कराया गया है। वायुयान वाले तो साक्षात सातवें आसमान में होते ही हैं। उड़ान भरते समय उनके मन में यही कल्पना होती है कि संसार में दूसरा व्यक्ति  मेरे समान नहीं है। ठीक मेरी भी मनःस्थिति एक बार हुई जब मैंने किसी प्रकार से मित्रों के सहयोग से खरीदी एक पुरानी साइकिल पूरे बारह सौ पचास की। मित्रों का सहयोग इसलिए क्योंकि तब कोई ई एम आई का सिस्टम नहीं था।  साइकिल के पहिये चलने के बाद रुकने का नाम न लेते थे और गद्दी की हालत ऐसी चरमरा रही थी पता नहीं कितने लोग इसका आनन्द ले चुके हैं। साइकिल की तारीफ में और क्या कसींदे कसूं?  मेरे लिये तो आठवाँ अजूबा थी, जिसने मेरे  पंख लगा दिए थे। मैं ख्यालों में खोया हुआ गद्दी पर अवस्थित होकर तरह-तरह के रंगीन सपने मन में सँजो रहा था। अनुभूति दिव्य थी कि सातवें आसमान पर विचरण करने का अधिकार पत्र मिल गया है।आनन्द की अनुभूति अपने चरम पर थी। मन कल्पनाओं के सिन्धु में गोते लगा रहा था।...

बन्धन से आज़ाद(कहानी)

कभी कभी आइना भी हमारे अंदर की जिज्ञासा को पंख प्रदान कर देता है।चेहरे की लालिमा, निखरा हुआ रूप, कुछ लटकटी हुई लटें और अधरों की मुस्कराहट चट्टानों के सीने में हलचल पैदा करने के लिये पर्याप्त होते हैं।पैरों की पाजेब में  तो तपस्वियों के ईमान भंग करने की क्षमता भला फिर आम आदमी की क्या औकात। ऐसे ही रूप लावण्य की स्वामिनी अनुभूति आईने के सम्मुख खड़ी  अपने अतीत में चली जाती है और वह पृष्ठ पढ़ने लगती है जो उसके शोध कार्य के समय का है। प्रोफेसर डॉ व्यथित अपनी लेखनी  के लिए जग मशहूर  थे  अपना ईमान डिगने से नहीं रोक पा रहे थे जब उनकी ऑफिस में एक सुंदरी अर्थात शोध की छात्रा ने उनके कमरे में आने की अनुमति माँगी। "अरे तुमसे हजार बार कहा है कि मेरे आफिस में आने के लिए अनुमति की आवश्यकता नहीं है तुम मेरी प्रिय विद्यार्थियों में से एक हो।" डॉ व्यथित ने अनुभूति के  रूप लावण्य को एकटक निहारते हुए कहा। यद्यपि इस प्रकार की टिप्पणी अनुभूति के लिए पहली बार थी फिर भी इसका बुरा नहीं माना गुरुदेव का आशीर्वाद समझकर खुश हो ली। जब कोई लड़की पहली बार किसी की टिप्पणी सहन करले तो निश्चित रू...

जमा न कोई खेल

अपने प्रिय जन के सम्मुख है,कानों खिंची गुलेल। भरसक कोशिश करके देखी , जमा न कोई खेल। सुर से लेकर तान अलग है,  फिर भी गाते गाना। कोरस से कहाँ देखा जाता,  नायक का सटियाना। वाद्य यंत्र भी मिला न पाये, पदचापों से मेल। देख देख हैरान मदारी, बिगड़ा हुआ जमूड़ा। मुद्रा के थैले में रखता, अहंकार का कूड़ा। बूढ़ी अम्मा के हाथों से, ढीली हुई नकेल।  उदित भानु के हाथ जोड़कर,  खिलती सूर्यमुखी। पर सन्ध्या के अवसानों में, होती बड़ी दुःखी। सूखे अंडूके ना देते, उम्मीदों का तेल। परीक्षा की कॉपी में रखे, जिसने पन्ने कोरे। खिसियानी बिल्ली सा देखो,  अपने दाँत निपोरे। शेरों की मांदों के आगे ,गीदड़ दिए धकेल। अभी नर्सरी दांव पेंच की, फिर भी कसा लँगोट। प्रतिद्वंद्वी से जीत मांगते,  दिखा दिखाकर नोट। चढ़ी हुई कुर्ते की बाँहें, टक्कर सकीं न झेल। लिए तराजू घूम रहे हैं , बिके न कोई मोल। लोक लुभावन ऑफर के भी, काम न आएं बोल।  थोक दुकानों के आगे ये, लेकर चले ढकेल। अजमा कर तो देख चके हैं सब तरकश के तीर। सिर्फ ख्वाबो तक सीमित है, सत्ता की तश्वीर। पाले तक भी खेल न पाए,गुड्डा गुड़िया मेल। डॉ राजीव कुमा...

आत्म निर्भर

 *व्यंग्यम मधुरम : आत्मनिर्भर – डॉ राजीव पाण्डेय,गाजियाबाद – युवा प्रवर्तक* https://yuvapravartak.com/?p=49007 "आत्मनिर्भरता" पर एक व्यंग्य आपको सोचने पर मजबूर कर देगा।