साइकिल का भूत(कहानी)
लक्ज़री कार में सवार युवक प्रसन्नचित होकर यही सोचता है कि हवा में विचरण कर रहा हूँ, मोटर ट्रक वाले भी यही सोचकर मुदित होते हैं कि मेरे उपयोग के लिये ही इस सड़क का निर्माण कराया गया है। वायुयान वाले तो साक्षात सातवें आसमान में होते ही हैं। उड़ान भरते समय उनके मन में यही कल्पना होती है कि संसार में दूसरा व्यक्ति मेरे समान नहीं है। ठीक मेरी भी मनःस्थिति एक बार हुई जब मैंने किसी प्रकार से मित्रों के सहयोग से खरीदी एक पुरानी साइकिल पूरे बारह सौ पचास की। मित्रों का सहयोग इसलिए क्योंकि तब कोई ई एम आई का सिस्टम नहीं था। साइकिल के पहिये चलने के बाद रुकने का नाम न लेते थे और गद्दी की हालत ऐसी चरमरा रही थी पता नहीं कितने लोग इसका आनन्द ले चुके हैं। साइकिल की तारीफ में और क्या कसींदे कसूं? मेरे लिये तो आठवाँ अजूबा थी, जिसने मेरे पंख लगा दिए थे। मैं ख्यालों में खोया हुआ गद्दी पर अवस्थित होकर तरह-तरह के रंगीन सपने मन में सँजो रहा था। अनुभूति दिव्य थी कि सातवें आसमान पर विचरण करने का अधिकार पत्र मिल गया है।आनन्द की अनुभूति अपने चरम पर थी। मन कल्पनाओं के सिन्धु में गोते लगा रहा था।...