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दोहा संग्रह

जिनके सुमिरन मात्र से, पूरण होते काज। प्रातःकाल में हम जपें ,एक दन्त महाराज। मूषक वाहन,गजवदन,लम्बोदर महाकाय। एकदंत,शंकरसुवन,मोदकप्रिय मुस्काय।। सिद्धि विनायक,गणपति कृपा कोर वर्षाय। गौरीनन्दन विघ्रराज,पूजत हम हर्षाय। जिज्ञासा के चक्षु जब,होने लगें अधीर। मन के आँगन जागरण,करते हैं रघुवीर।। वीणा वादिनि ने किया इस जग का कल्याण। उनके आशीर्वाद से,पुलकित हैं पाषाण । मातु भगवती का करूँ ,वंदन पूजन ध्यान। धन वैभव के साथ में , मिले शक्ति वरदान। कमरों से दिखती नहीं ,कहीं किरण की कोर। मुर्गे भी यहाँ है नहीं, बता सकें जो भोर।। मर्यादा को लांघता,, रात्रि काल का शोर। अलसाने कुछ भाव को,लेकर आयी भोर।। भोर किरण की रश्मियां,खिली खिली है धूप। ओढ़  चूनरी  मखमली, वसुधा  लगे  अनूप।। अपने बारे में सदा,कहते हैं विद्वान। मैं तो बस विद्यार्थी,ना हमको है ज्ञान।। प्राची की लखि लालिमा,खगकुल खोलें पाँख। घुँघरू पग में बांधकर,स्वप्न तैरता आँख।। उदित भानु  की रश्मियां, लेकर बड़ीं गुलाल। वसुधा मुख पाकर खिला,चुटकी एक गुलाल। मंगल गायन कर रही, किरण क्षितिज की ओर। ले अपने भुजपाश में,खुली लालिमा डोर।। प्र...