दोहा संग्रह

जिनके सुमिरन मात्र से, पूरण होते काज।

प्रातःकाल में हम जपें ,एक दन्त महाराज।


मूषक वाहन,गजवदन,लम्बोदर महाकाय।

एकदंत,शंकरसुवन,मोदकप्रिय मुस्काय।।


सिद्धि विनायक,गणपति कृपा कोर वर्षाय।

गौरीनन्दन विघ्रराज,पूजत हम हर्षाय।


जिज्ञासा के चक्षु जब,होने लगें अधीर।

मन के आँगन जागरण,करते हैं रघुवीर।।


वीणा वादिनि ने किया इस जग का कल्याण।

उनके आशीर्वाद से,पुलकित हैं पाषाण ।


मातु भगवती का करूँ ,वंदन पूजन ध्यान।

धन वैभव के साथ में , मिले शक्ति वरदान।


कमरों से दिखती नहीं ,कहीं किरण की कोर।

मुर्गे भी यहाँ है नहीं, बता सकें जो भोर।।


मर्यादा को लांघता,, रात्रि काल का शोर।

अलसाने कुछ भाव को,लेकर आयी भोर।।


भोर किरण की रश्मियां,खिली खिली है धूप।

ओढ़  चूनरी  मखमली, वसुधा  लगे  अनूप।।


अपने बारे में सदा,कहते हैं विद्वान।

मैं तो बस विद्यार्थी,ना हमको है ज्ञान।।


प्राची की लखि लालिमा,खगकुल खोलें पाँख।

घुँघरू पग में बांधकर,स्वप्न तैरता आँख।।


उदित भानु  की रश्मियां, लेकर बड़ीं गुलाल।

वसुधा मुख पाकर खिला,चुटकी एक गुलाल।


मंगल गायन कर रही, किरण क्षितिज की ओर।

ले अपने भुजपाश में,खुली लालिमा डोर।।


प्रातः वंदन में लिखें,पुलकित स्वर्णिम भोर।

प्रेम पंथ को बाँधती, शब्द- शब्द की डोर।


हुआ आगमन अरनिमा,तमस रहा अवलोक।

निशा काल के सदन में, मना रहा है शोक।।


अवनी मुख को चूम कर,किरणें हो गईं लाल।

खगकुल शाखें छोड़कर, मिला रहा है ताल।


अभिलाषा मन मे लिये,विकल खड़े  जज़्बात।

दिवस विरह में जी रहे,स्वप्न सताएं रात।


अरुणोदय की अरुणिमा, उदित भानु का भाव।

निज आलस को त्याग कर, दो मूछों पर ताव।


लिए लालिमा आ गयी , मंगल कारी भोर।

कलरव की प्रतियोगिता,तरुओं पर पुरजोर।।


मात्र एक ठहराव है , सन्ध्या का अवसान।

खुशियों को लेकर खड़ा,प्रातः का दिनमान।


मन के  विचलन का नहीं ,अपने पास उपाय।

प्रियवर अपने ज्ञान से, देना हमको राय।।


वंचित सुविधा से करे,राष्ट्र धर्म का ग्रन्थ।

कैसे पावन हम कहें,सही दिखाता पंथ।।


आतुरता मन में लिए,मचल रहें हैं पाँव।

करें शब्द आराधना,किसी प्रेम के गाँव।।


सागर सरिता का कभी,होता नहीं बिछोह।

मन के कोने में कहीं,फिर कैसा  निर्मोह।


जीवन उसका ही सफल, जिसका होता लक्ष्य।।

उसको क्या मंजिल मिले, जो बैठा नेपथ्य।


तेरह ग्यारह में लिखे,दोहों को भरपूर।

मन की सारी भ्रांतियां,हो जायेंगी दूर।


दोहा लिखना है सरल,लिखें लगाकर ध्यान।

गूगल वर्षा कर रहे, बाँट बांट कर ज्ञान।


इस जीवन की राह में,अगणित आये मोड़।

उनको शब्दों  में रहा  , आज प्रेम से जोड़।


विस्मित कोने में खड़ी,सपनों की सौगात।

कर्ण जोहते  बाट  को, सुनने अन्तस बात।


अभिलाषा लेकर चले,करने भारत सैर।

देखा हमने मानचित्र,  फ़टी विबाई पैर।।


आगत का स्वागत करें,अपनी बांह पसार।

 वसुधा पर बढ़ता रहे ,भाई चारा प्यार।


सीना जोरी कर  रहे, नहीं जताते  खेद।

जिस थाली में खा रहे,उसमें करते छेद।।


होता क्या  हिन्दुत्व है, पढ ले तू जा वेद।

तभी समझ में आएगा,तने जड़ों का भेद।।


प्रातः स्वागत में खड़ा,शिखरों पर दिनमान।

वसुधा पर बिखरी मिली,किरणों की मुस्कान।


दर्शन कर हर्षित हुए,अन्तर के दो नैन।

तन मन में सिहरन हुई,स्वप्न हुए बेचैन।


योग साधना का हुआ,भंग तपस्या जाप।

शिखर पिघलते ही गये,देख झील का ताप।


अधर अधर  में हैं  खड़े,लिए अधर विस्वास।

अधर मिलन को बाबरे,अधर अधर के पास।


अलसायी आँखे मलें,चन्दा देख  चकोर।

अलकों पर नर्तन करें,स्वप्न सजाएं मोर।


किलकत किरणें नित करें,तरूणाई का मान।

मन  मलीनता  में करे , सन्ध्या का अवसान।


दन्त पंक्ति  में दे दमक , प्राची  से  दिनमान।

ढलती सन्ध्या में ढला,मुखमण्डल  का मान।


तन मन को पुलकित करे,मन का कोमल भाव।

प्रेम  व्याकरण  कब पढ़े , निज मूंछों  का ताव।


तनी  गर्दनों  की  सुनी,  कहाँ कभी मनुहार।

प्रेम दृष्टि  से बह  चली, उर से अविरल धार।


मर्दन  से तो  रिक्तता , पाते  हैं भुजपाश।

प्रेम दृष्टि  से आ रहा , बाँहों  में  आकाश।


कमर करधनी का कथन,पैजनिया की चाप 

झंकृत तारों में झुकी,मन मृदंग की थाप।


अनुभावों का व्याकरण,कहीं समेटे बिन्दु।

दो शब्दों में कब बंधा,अन्तस् वाला सिन्धु।


अपने कदमों से डिगे,जब जीवन की भक्ति।

लक्ष्य प्राप्ति को बढ़ चली,अंतर्मन की शक्ति।


दीन दुखी पर कर रहे,हम शक्ति का प्रयोग।

मौन व्यवस्था मुख लिये,करती रही वियोग।


चित्रावली आनन्द को , बाट निहारे नैन।

किंतु विवशता  जी  रही, अंतर्मन बैचेन।


चेतनता में शून्यता, साँसे बड़ी उदास।

जाने कब तक आएगा ,बाँहो में आकाश।


जगती के अनुभाव की, अभिव्यक्ती है  बिन्दु।

पाषाणों के  प्रेम ने, बाँध लिया है सिन्धु।


अन्तस् धारण कर रही, आशायी उल्लास।

संवेदन लेकर चली,झील शिखर के पास।


हिंदुस्तानी  सभ्यता  ,कहें  सभी अध्याय ।

सहज सुलभ आथित्य को,लिखती रहती चाय।


वसुधा ने धारण किया,वासंती परिधान।

मुक्त कंठ से कर रहा ,जीव जगत गुणगान।


आल्हादन को दे रहें। ,झंकृत वीणा तार।

कहीं तलहटी खो गया,शिखरों का आधार।


मन मयूर नर्तन करें,देख क्षितिज की ओर।

अंतर दर्पण पग लखें,अश्रु नयन की कोर।

 

हाथ भजन मनका लिए,कदम हुए बेहोश।

पंगु अवस्था को जिये,मनका सारा जोश।


आसमान को बांधने, लिए हाथ में  डोर।

मन पंक्षी की वेदना,मिला कहीं ना छोर।


अनुष्ठान के साथ में,अपना घर परिवार।

सेवा में खुलते रहें,  मन मंदिर के  द्वार।


शब्दों के अतिरिक्त मैं, नहीं जानता गेम।

कविता से ही रह गया पहला अंतिम प्रेम।


 प्राची आभा खोलती, चेतनता के द्वार।

झंकृत मन के कर रहे,अब वीणा के तार।


राग शिखर पर चढ़ रहे ले वीणा की डोर।

सुन कोकिल के गीत को हुई सुहावन भोर


मन मयूर नर्तन करे,सुन वीणा की तान।

अधरों पर बसने लगी, एक मधुर मुस्कान।


आल्हादन तन मन भरे,वीणा रूपी साज।

 धरती अम्बर डोलते, छोड़ सुनें सब काज।


वीणा छेड़े रागिनी,सुन वैष्णव का ज्ञान।

अन्तरमन में रह गया, केवल प्रभु का ध्यान।


प्रातःकाल का जागरण, देता है स्फूर्ति।

तन मन को दे ऊर्जा, और करे प्रतिपूर्ति।


जबसे वसुधा को मिला आसमान का साथ।

जगन्नाथ की भूमिका निभा रहा है हाथ।


लेकर कर में प्रतिवद्धता,कर्ण लगा है यंत्र।

स्वप्न पुरुरवा के लिये, जपे उर्वशी  मन्त्र।


 जबसे वसुधा को मिला आसमान का साथ।

जगन्नाथ की भूमिका निभा रहा है हाथ।


 प्रातःकाल का जागरण, देता है स्फूर्ति।

तन मन को दे ऊर्जा, और करे प्रतिपूर्ति।


 लेकर कर में प्रतिवद्धता,कर्ण लगा है यंत्र।

स्वप्न पुरुरवा के लिये, जपे उर्वशी  मन्त्र।


 एक इबादत लिख रहा, नैनों का इकरार।

झंकृत करते वेदना ,अधरों के अशआर।


प्रतीक्षारत मुनिवर खड़े,निकट जलधि के द्वार।

बैकुण्ठी  अव धारणा  , रचे   नया संसार।


घूँघट की परिकल्पना,प्रथम मिलन की सेज।

चारधाम की याचना , मन में रखो  सहेज।


अलसायी आँखें मले,बेचैनी की भोर।

सपनीली करवट लिए,गयी निशा झकझोर।


कानों में मिश्री घुले,अधरों पर रसपान।

अन्तस् झंकृत कर रही,नित वीणा की तान।


गोधूलि वेला लिए ,सन्ध्या का अवसान।

प्राण संचरण कर रहा, प्रातःकाल दिनमान।


अक्षर मेरी साधना ,  अक्षर मेरे प्राण।

लिए अमरता तत्व को,करें जगत कल्याण।


कस्तूरी है नाभि में,ढूढे कटी प्रदेश।

जिज्ञासा की दृष्टि का,बूँद बूँद उन्मेष।


अवनी मुख को चूम कर,किरणें हो गईं लाल।

खगकुल शाखें छोड़कर,मिला रहा है ताल।


कभी दिवस व्याकुल रहा,कभी मौन है मास।

प्यारी कसमों को कहाँ, मिलता यहां उजास।


भोर किरण के साथ ही,खगकुल खोलें पाँख।

निद्रा में अलसा गयी , सपनों डूबी आँख।


रात जागरण को कहे,दिवस लिखे व्यवधान।

प्राण विवशता को जियें,मिलता नहीं निदान।


महिमा लखिकर देश की,हर मुख खिले अनन्त।

परम  शांति की कल्पना , वर्णित करें  दिगन्त।


चहल,पहल के गांव में ,मन  सरिता के तीर।

पाने अंजुलि वारि की,,प्रस्तर बड़ा  अधीर।


नयन देख हर्षित हुए,धरती जलद  पहाड़।

ठौर खोजने को चले,मन के सभी उजाड़।


हमें लड़ाकर चाहिए,उनको केवल वोट।

अपने बच्चे जब पलें, स्वयं कमाए नोट।


 राजनीति का चढ़ गया, ग्रुप में आज बुखार।

अपने मत को दे रहे, देखो पैनी धार।


 जातिवाद का चल दिया चौसर पर अब दांव।

 विकसित होने खड़ा,गली मुहल्ला गांव।


चर्चा में वे ही पड़े,जो नहीं करते वोट।

फिर क्यों रिश्तों पर करें, ऐसी गहरी चोट।


 प्रात काल तक सो रहे, हम फैलाकर टांग।

कानों तक ना पहुंचती ,अब मुर्गों की बांग।


राधे राधे जप रहा ,हर दिनआठों याम।

मूर्त रूप में कल्पना,कर देंगे घनश्याम।


अन्तस जागी प्रीति का,निभा रहा है धर्म।

पर  मधुकर को वेदना,कली न जाने मर्म।


जिया कल्पना लोक में,जी भरकर संयोग।

किन्तु भृमर की आंख से,टपक रहा है वियोग।


हम कैसे पानी रखें, बोतल चलती आज।

संसाधन सब सूखते, चिंतित बड़ा समाज।


दोहा लिखने के लिए,करते आज प्रयास।

तेरह ग्यारह में लिखें,मन के कुछ अभिलाष।


 लिखने का जारी रखें ,हम अपना अभियान।

भावुक मन की वेदना,हो पथ पर गतिमान।


सुखद मिलन के स्वप्न को,देख रही है रात।

सूनापन व्याकुल हुआ,कहने को जज़्बात।


 कृष्ण नाम अधरों रखा,अपनी उम्र तमाम।

यदि राधा को खोजते, मिल जाते घनश्याम।


मकर राशि में रवि लिखें,नित नूतन अनुबंध।

शिखरों पर चढ़ते मिले,गुड़ तिल के सम्बंध।


प्रात  काल में  हम  करें,   गंगाजली नहान।

यथाशक्ति फिर हम करें ,मुक्त हस्त से दान।


खुशियों को हम खोजते, जाकर के बाज़ार।

किंतु खजाना है बड़ा,हम सबका परिवार।


सूरज दादा मुख ढकें, लगा बड़ा सा मास्क।

यहाँ ठिठुरती उंगलियां, करें न कोई टास्क।


यू पी के दरबार में,घोषित हुआ चुनाव।

जातिवाद की दे रही , मूँछे ऊँची ताव।


स्वप्न बेचकर सो गया ,अपना सकल जहान।

होठों पर सजने लगी ,मधुर मधुर मुस्कान।


सुबह सांझ को ताकते , ये मदमाते नैन, 

कब वीणा की आएगी एक मधुर सी तान।


 कांग्रेस है  काग रेस ,  सपा सफा  की ओर।

बसपा का मन कंपकपा, कमल ढूढता छोर।


वीणा की कानों पड़े, मधुरिम झंकृत तान।

अधरों पर सजने लगी,एक मधुर मुस्कान।


कर वीणा की रागिनी , अनुररागों में व्यस्त।

अस्त व्यस्त अभ्यस्त भी, होते हैं अलमस्त।


 सुबह शाम को जप रहा ,राधा पावन नाम।

महारास लिखता रहे , वृंदावन का धाम।


कोमा ने अवरुद्ध की, फुलस्टॉप की चाल।

प्रश्नचिन्ह को देखकर, विषम्य हुआ निहाल।


अधर गुलाबी पंखुड़ी,नैना तीर कमान।

तटबन्धों को तोड़कर,मिले रत्न की खान।


 सिर्फ मोर्निंग तक हुए,अब अपने अनुबंध।

ज्वार समेटे जी रहे  ,जीवन के तटबंध।


 उल्लासों  की भोर से,कहे उदासी सांझ।

निशा सुंदरी कोख फिर,रही बाँझ की बाँझ।


 देख सुहानी भोर को, मुर्गा देता बांग।

 विस्तर भी थक जाएगा, मत फैलाओ टांग।


 प्रातःकाल से शाम तक ,लेकर ये एहसास।

करते हैं महसूस हम, हो तुम मेरे पास।


अब साजन की बाँह में, लौट रही है ठंड।

उधर झील भी भोगती,इच्छाओं का दंड।


मंगल दर्शन से करें,हर दिन की शुरुआत।

पूरणता को प्राप्त हों,अन्तस के जज्बात।


प्रेम लोक का केंद्र है, ब्रज वृन्दावन धाम।

कृष्ण प्रेम की चाह में, जपते राधा नाम।


प्रातकाल मंगल करे,नवल रश्मि के साथ।

प्रीति पाठ के सौपकर,  बढ़ा रहा है हाथ।


प्रकृति ने हमको दिया,अनुपम दिव्य स्वरूप।

दिव्य दृष्टि से देखते,सुर नर मुनि अरु भूप।


प्रातःकाल का जागरण, देता है स्फूर्ति।

तन मन को दे ऊर्जा, और करे प्रतिपूर्ति।



जबसे वसुधा को मिला आसमान का साथ।

जगन्नाथ की भूमिका निभा रहा है हाथ।


लेकर कर में प्रतिवद्धता,कर्ण लगा है यंत्र।

स्वप्न पुरुरवा के लिये, जपे उर्वशी  मन्त्र।


 जबसे वसुधा को मिला आसमान का साथ।

जगन्नाथ की भूमिका निभा रहा है हाथ।


 प्रातःकाल का जागरण, देता है स्फूर्ति।

तन मन को दे ऊर्जा, और करे प्रतिपूर्ति।


 लेकर कर में प्रतिवद्धता,कर्ण लगा है यंत्र।

स्वप्न पुरुरवा के लिये, जपे उर्वशी  मन्त्र।


 एक इबादत लिख रहा, नैनों का इकरार।

झंकृत करते वेदना ,अधरों के अशआर।


 प्रतीक्षारत मुनिवर खड़े,निकट जलधि के द्वार।

बैकुण्ठी  अवधारणा  ,रचे   नया संसार।


 घूँघट की परिकल्पना,प्रथम मिलन की सेज।

चारधाम की याचना , मन में रखो  सहेज।


अलसायी आँखें मले,बेचैनी की भोर।

सपनीली करवट लिए,गयी निशा झकझोर।


कानों में मिश्री घुले,अधरों पर रसपान।

अन्तस् झंकृत कर रही,नित वीणा की तान।


गोधूलि वेला लिए ,सन्ध्या का अवसान।

प्राण संचरण कर रहा, प्रातःकाल दिनमान।


अक्षर मेरी साधना ,  अक्षर मेरे प्राण।

लिए अमरता तत्व को,करें जगत कल्याण।


कस्तूरी है नाभि में,ढूढे कटी प्रदेश।

जिज्ञासा की दृष्टि का,बूँद बूँद उन्मेष।


 प्रातः स्वागत में खड़ा,शिखरों पर दिनमान।

वसुधा पर बिखरी मिली,किरणों की मुस्कान।


 दर्शन कर हर्षित हुए,अन्तर के दो नैन।

तन मन में सिहरन हुई,स्वप्न हुए बेचैन।


 योग साधना का हुआ,भंग तपस्या जाप।

शिखर पिघलते ही गये,देख झील का ताप।


अधर अधर  में हैं  खड़े,लिए अधर विस्वास।

अधर मिलन को बाबरे,अधर अधर के पास।


अलसायी आँखे मलें,चन्दा देख  चकोर।

अलकों पर नर्तन करें,स्वप्न सजाएं मोर।


किलकत किरणें नित करें,तरूणाई का मान।

मन  मलीनता  में करे , सन्ध्या का अवसान।


दन्त पंक्ति  में दे दमक , प्राची  से  दिनमान।

ढलती सन्ध्या में ढला,मुखमण्डल  का मान।


तन मन को पुलकित करे,मन का कोमल भाव।

प्रेम  व्याकरण  कब पढ़े , निज मूंछों  का ताव।


तनी  गर्दनों  की  सुनी,  कहाँ कभी मनुहार।

प्रेम दृष्टि  से बह  चली, उर से अविरल धार।


मर्दन  से तो  रिक्तता , पाते  हैं भुजपाश।

प्रेम दृष्टि  से आ रहा , बाँहों  में  आकाश।


कमर करधनी का कथन,पैजनिया की चाप 

झंकृत तारों में झुकी,मन मृदंग की थाप।


अनुभावों का व्याकरण,कहीं समेटे बिन्दु।

दो शब्दों में कब बंधा,अन्तस् वाला सिन्धु।


अपने कदमों से डिगे,जब जीवन की भक्ति।

लक्ष्य प्राप्ति को बढ़ चली,अंतर्मन की शक्ति।


 दीन दुखी पर कर रहे,हम शक्ति का प्रयोग।

मौन व्यवस्था मुख लिये,करती रही वियोग।


चित्रावली आनन्द को , बाट निहारे नैन।

किंतु विवशता  जी  रही, अंतर्मन बैचेन।


चेतनता में शून्यता, साँसे बड़ी उदास।

जाने कब तक आएगा ,बाँहो में आकाश।


वीणा वादिनि ने किया इस जग का कल्याण।

उनके आशीर्वाद से,पुलकित हैं पाषाण ।


जगती के अनुभाव की, अभिव्यक्ती है  बिन्दु।

पाषाणों के  प्रेम ने, बाँध लिया है सिन्धु।


अन्तस् धारण कर रही, आशायी उल्लास।

संवेदन लेकर चली,झील शिखर के पास।


हिंदुस्तानी  सभ्यता  ,कहें  सभी अध्याय ।

सहज सुलभ आथित्य को,लिखती रहती चाय।


वसुधा ने धारण किया,वासंती परिधान।

मुक्त कंठ से कर रहा ,जीव जगत गुणगान।


आल्हादन को दे रहें। ,झंकृत वीणा तार।

कहीं तलहटी खो गया,शिखरों का आधार।


मन मयूर नर्तन करें,देख क्षितिज की ओर।

अंतर दर्पण पग लखें,अश्रु नयन की कोर।

 

हाथ भजन मनका लिए,कदम हुए बेहोश।

पंगु अवस्था को जिये,मनका सारा जोश।


आसमान को बांधने, लिए हाथ में  डोर।

मन पंक्षी की वेदना,मिला कहीं ना छोर।


अनुष्ठान के साथ में,अपना घर परिवार।

सेवा में खुलते रहें,  मन मंदिर के  द्वार।


शब्दों के अतिरिक्त मैं, नहीं जानता गेम।

कविता से ही रह गया पहला अंतिम प्रेम।


 प्राची आभा खोलती, चेतनता के द्वार।

झंकृत मन के कर रहे,अब वीणा के तार।


राग शिखर पर चढ़ रहे ले वीणा की डोर।

सुन कोकिल के गीत को हुई सुहावन भोर


मन मयूर नर्तन करे,सुन वीणा की तान।

अधरों पर बसने लगी, एक मधुर मुस्कान।


आल्हादन तन मन भरे,वीणा रूपी साज।

 धरती अम्बर डोलते, छोड़ सुनें सब काज।


वीणा छेड़े रागिनी,सुन वैष्णव का ज्ञान।

अन्तरमन में रह गया, केवल प्रभु का ध्यान।


अलसायी आँखे मलें,चन्दा देख  चकोर।

अलकों पर नर्तन करें,स्वप्न सजाएं मोर।


अहंकार में डूबकर, नहीं रुके जज्बात।

सूरज को दे रोशनी,जुगनूं की औकात।


 प्रातः स्वागत में खड़ा,शिखरों पर दिनमान।

वसुधा पर बिखरी मिली,किरणों की मुस्कान।


दर्शन कर हर्षित हुए,अन्तर के दो नैन।

तन मन में सिहरन हुई,स्वप्न हुए बेचैन।


अधर अधर  में हैं  खड़े,लिए अधर विस्वास।

अधर मिलन को बाबरे,अधर अधर के पास।


किलकत किरणें नित करें,तरूणाई का मान।

मन  मलीनता  में करे , सन्ध्या का अवसान।


दन्त पंक्ति  में दे दमक , प्राची  से  दिनमान।

ढलती सन्ध्या में ढला,मुखमण्डल  का मान।


तन मन को पुलकित करे,मन का कोमल भाव।

प्रेम  व्याकरण  कब पढ़े , निज मूंछों  का ताव।


तनी  गर्दनों  की  सुनी,  कहाँ कभी मनुहार।

प्रेम दृष्टि  से बह  चली, उर से अविरल धार।


मर्दन  से तो  रिक्तता , पाते  हैं भुजपाश।

प्रेम दृष्टि  से आ रहा , बाँहों  में  आकाश।


कमर करधनी का कथन,पैजनिया की चाप।

झंकृत  तारों में झुकी , मन मृदंग  की  थाप।


चेतनता में शून्यता, साँसे बड़ी उदास।

जाने कब तक आएगा ,बाँहो में आकाश।


अपने कदमों से डिगे,जब जीवन की भक्ति।

लक्ष्य प्राप्ति को बढ़ चली,अंतर्मन की शक्ति।


अनुभावों का व्याकरण,कहीं समेटे बिन्दु।

दो शब्दों में कब बंधा,अन्तस् वाला सिन्धु।


दीन दुखी पर कर रहे,हम शक्ति का प्रयोग।

मौन व्यवस्था मुख लिये,करती रही वियोग।


चित्रावली आनन्द को , बाट निहारे नैन।

किंतु विवशता  जी  रही, अंतर्मन बैचेन।


वीणा वादिनि ने किया इस जग का कल्याण।

उनके आशीर्वाद से,पुलकित हैं पाषाण ।


जगती के अनुभाव की, अभिव्यक्ती है  बिन्दु।

पाषाणों के  प्रेम ने, बाँध लिया है सिन्धु।


अन्तस् धारण कर रही, आशायी उल्लास।

संवेदन लेकर चली,झील शिखर के पास।


हिंदुस्तानी  सभ्यता  ,कहें  सभी अध्याय ।

सहज सुलभ आथित्य को,लिखती रहती चाय।


वसुधा ने धारण किया,वासंती परिधान।

मुक्त कंठ से कर रहा ,जीव जगत गुणगान।


आल्हादन को दे रहें। ,झंकृत वीणा तार।

कहीं तलहटी खो गया,शिखरों का आधार।


मन मयूर नर्तन करें,देख क्षितिज की ओर।

अंतर दर्पण पग लखें,अश्रु नयन की कोर।


हाथ भजन मनका लिए,कदम हुए बेहोश।

पंगु अवस्था को जिये,मनका सारा जोश।

 

आसमान को बांधने, लिए हाथ में  डोर।

मन पंक्षी की वेदना,मिला कहीं ना छोर।


प्राची आभा खोलती, चेतनता के द्वार।

झंकृत मन के कर रहे,अब वीणा के तार।


राग शिखर पर चढ़ रहे ले वीणा की डोर।

सुन कोकिल के गीत को हुई सुहावन भोर


मन मयूर नर्तन करे,सुन वीणा की तान।

अधरों पर बसने लगी, एक मधुर मुस्कान।


 आल्हादन तन मन भरे,वीणा रूपी साज।

 धरती अम्बर डोलते, छोड़ सुनें सब काज।


 वीणा छेड़े रागिनी,सुन वैष्णव का ज्ञान।

अन्तरमन में रह गया, केवल प्रभु का ध्यान।


शब्दों के अतिरिक्त मैं, नहीं जानता गेम।

कविता से ही रह गया पहला अंतिम प्रेम।


अनुष्ठान के साथ में,अपना घर परिवार।

सेवा में खुलते रहें,  मन मंदिर के  द्वार।


देव दिवाली के दिये,करें जगत उजियार।

बेबस कोने में छिपे,निशा काल अंधियार।



मन की पीड़ा हर सके,एक प्रज्ज्वलित दीप।

अंतर्मन से खीज ले,विस्वासों का सीप।


तमस निशा को चीरता, दीपक का आलोक।

झंझावाती आंधियां, रहा खड़ा था रोक।


आशाओं के दीप भी ,मन में करें प्रकाश।

नर्तन आँगन में करें,उपवन के उल्लास।



जिसने जीवन में किया,शिक्षक का सम्मान।

उसके स्वागत में खड़ा,अम्बर में दिनमान।


शब्द सृजन के हित मिला, माँ से ये वरदान।

 नित्य कलम करती रहे,साहित्यिकअवदान।


भू पर  आई अप्सरा, कर षोडस श्रृंगार।

पिय के हिय में आ गयी,वह नयनों के द्वार।


अधरा तो मधुमास है, आँखें तीर कमान।

भृमरा का मन डोलता,करने को रसपान।


पावस ऋतु की रूपसी,सागर उठी हिलोर।

चंदा मुख को लखि रहा,बैठा डाल चकोर।


बासंतिक परिधान में,देख उर्वशी चित्र।

भंग तपस्या कर रहे,मन के विस्वामित्र।


सजी धजी है राधिका,रचना भाव विभोर।

मन के आँगन में बसा, गोकुल का चितचोर।


मंगल की ले कामना,करतीं करवा चौथ।

मन के आँगन ना रहे,कहीं विरह की सौत।


स्थल वन्दित   हो गया, शिखर बड़ा कैलाश।

पार्वती शिव   के हुए,  पूर्ण सभी  अभिलाष।


 मास आश्विन शुक्ल पक्ष, तिथी चतुर्थी योग।

प्रथम पूज्य का आगमन,सुफल सुखद संयोग। 


पौराणिक  सन्दर्भ में, कह   रहे  वेद व्यास। 

गौरी सुत से याचना,   लेखक बनिये खास।


एक।  शर्त पर हो गए,  प्रभु गणेश तैयार।

लिक्खूँगा  निर्बाध मैं,  रहना है होशियार।


वेदव्यास जी कह रहे,ज्ञान बहुत अत्यल्प ।

प्रभु जी लिखना शुद्ध तुम,टूटे नहीं प्रकल्प।


ठीक चतुर्थी के दिवस, बोलें ऋषिवर श्लोक।

दस दिवसों का घोर तप,  कोई सका न रोक।


इक ही आसन पर जमे,गए दिवस दस बीत।

जड़बत  मिट्टी  धूल में,  नहीं हुए   भयभीत।


कार्य समापन बाद ही, जमकर किया नहान। 

उसी सरस्वति का मिले, हमको बड़ा बखान।


संयम पूजा  पाठ के,  दस दिवसीय महत्व।

आराधक ही जानता, होता   क्या है  तत्व।


करें विसर्जित वासना,  दस दिन के पश्चात।

होती निर्मल आत्मा ,  कटती दुख की रात।


विघ्न हरण से कर रहे,    सामूहिक अनुरोध।

हमको  आशिष दीजिये,दिव्य ज्ञान का बोध।


सीना जोरी कर  रहे, नहीं जताते  खेद।

जिस थाली में खा रहे,उसमें करते छेद।


होता क्या  हिन्दुत्व है, पढ ले तू जा वेद।

तभी समझ में आएगा,तने जड़ों का भेद।


काशी मेरी आत्मा,अयोध्या मेरे प्राण।

वृंदावन के वास ने ,किया सदा कल्याण।


काशी की आराधना,सुमिर अयोध्या धाम। 

राधे।  राधे  रटन से, मन वृंदावन धाम।


माँ के आशिर्वाद की ,हमें मिली है छाँव

जीवन जीने के लिये, पिता सिखाते दाँव।


 मंगल वेला में करें ,प्रभु का सुमिरन नाम।

स्वार्थ सिद्ध से हट करें, मनोयोग निष्काम।


 मिट्टी को मथकर दिया,मूर्ति रुप साकार।

उन चरणों में शीश रख,वन्दन बारम्बार।


 विरह व्यथा को कह रहा,आँखों छलका नीर।

इसी  नीर  के  साथ में,बह जाती  है पीर ।



कोरोना के  काल में, लगा रहे सब  मैथ।

आखिर तीनों में बड़ा,हुआ कौन सा पैथ।


दादा पोते में  हुआ, आज बड़ा    मनभेद।

तने जड़ों से कह रहे,व्यक्त करो कुछ खेद।


बच्चों की हठधर्मिता, बोलें तीखे बोल।

मर्यादा को लाँघकर, लगा रहें हैं मोल।


जब से आस्था में हुए,शंकाओं के छेद।

निज घर में एकल पड़े, दादा आयुर्वेद।


घुट्टी से काढ़ा तलक,अपने रहे उसूल।

जीवन की हर व्याधियां कटती रहीं समूल।


चम्पा गुड़हल पर हँसे, अब टेसू के फूल।

फ़टी गुलाबी पाँखुरी,बढ़ते देख बबूल।


मीठी मीठी  टाफियां, मुख को देती स्वाद।

किन्तु कसैले स्वाद ही,काट रहे अवसाद।


जबसे हमने ले लिया कुछ तकनीकी  बोध।

पुरुखों के सम्मुख खड़े, बनकर के अवरोध।


सभी विचारों के अलग ,हैं अपने आराध्य।

किन्तु काटता कौन है,अपने रोग असाध्य।


केवल  आकर्षित  करे, अपने नयन दहेज।

किन्तु जिन्दगी के लिये,आता काम परहेज।


व्हिस्की सोडा हो गए, आज समय की मांग।

शंकर के आराध्य हम,  नहीं  भूलते  भाँग।


बेमतलब के द्वंद  में, फंसा रहें   हम टांग।

ज्ञान सदा आगे रहा, दूर  बहुत   फर्लांग।


 प्रभु के मंगल नाम से, हो दिन की शुरुआत।

जीवन में मिलती रहे, खुशियों की बरसात।


मुर्गे जहाँ देते नहीं, प्रातःकाल में बांग।

वहाँ पर भी किरणें भरें,धरती के फर्लांग।


सदा जीत को ही किया, जिसने अंगीकार।

उसको कैसे हो सके ,हार कभी स्वीकार।


 साधक को मिल जाएंगे, मुरलीधर जी श्याम।

अधरों पर रखें सदा,बस राधा ही   नाम


प्रात जागरण कर करें,पहले क्रिया नित्य।

हाथ जोड़ दर्शन करें,  प्राची में आदित्य।


मुख मुद्रा के साथ में, कर लें जिव्हा साफ।

चक्कर वक्कर का सदा,गिरतानीचा ग्राफ।


प्रातः काल जल को पिएं,हम दो तीन गिलास।

भटक न पाए रोग भी , कभी पेट के   पास।


निकले बाहर सैर को ,  गति न रहे उन्नीस।

इसी साधना में लगें ,  मिनट सदा चालीस।


कपाल भांति अरु भ्रामरी,नित अनुलोम विलोम।

झंकृत हो   मस्तिष्क  भी,  करें उच्चरित  ओम।


आसन जीवन में   रहे,   दृढ़ता के आधार।

भानु सम्मुख हम  करें ,त्रियोदश नमस्कार।


आसन क्रिया  योग से  ,   तन को लगे  थकान।

शव आसन हो शान्त चित,बिना किसी व्यवधान।


बिन नागा के हम  करें,निर्मल सलिल नहान।

तन मन को स्फूर्ति दे, कर दे पावन ध्यान।


आराधन प्रभु का करें,नित्य लगाकर ध्यान।

अपने  मधुरिम  कण्ठ से, बोलें   मीठे  गान।


इस नश्वर संसार में, हम ईश्वर के अंश।

उसके आशीर्वाद से ,पाते हम अवतंस।


सारी क्रिया बाद ही , लें पौष्टिक  आहार।

शुद्ध सात्विक ही रहें, मन मे सदा विचार।


प्रकृती के सुकुमार कवि, सुमित्रा नन्दन पन्त।

हिंदी के थे वर्ड्सवर्थ, अरु धरती के कन्त।


 बूस्ट,कम्प्लेन,हार्लिक, इम्यूनिटी उपाय।

अब तक टीवी देखकर,पैसा दिया लुटाय।


तुलसी,अदरक गुर्च में ,काली मिर्च मिलाय।

 इससे   काढ़ा जो बने, अपने  प्राण बचाय।


तुलसी काली मिर्च में,लें अदरक को पीस।

उबला संग गिलोय के, काढ़ा है इक्कीस।


तीन बार सिर ढांककर, लें जमकर के  भाप।

सीने से हट जाएगा, कोरोना का बाप।


पानी नित्य उबालकर,खूब पियें दिनरात।

मिट जाये जड़ से सदा, कफ पित्त और बात।


चुटकी भर सेंधा नमक, पानी रखें उबाल।

करें गरारे हम सभी, खूब फुलाकर गाल।


निद्रा पूरी ले करें, हल्का प्राणायाम।

सेवन तरल पदार्थ का, दे हमको आराम।


ममता में ममता नहीं   ,  भोग रहा बंगाल।

आदर्शों को कर दिया,बिल्कुल ही कंगाल।


कभी शेरनी ना करे,भक्षण  निज संतान।

आज्ञाकारी वो रहे, या फिर वो     शैतान।


खेला जमकर खेलकर ,मचा रहे उत्पात।

कोने में घायल पड़े,  जनता के जज़्बात।


खुशियों के इज़हार में,है मातम का खेल।

छुट्टा हाथी हो गए,   फिरते  बिना नकेल।


धंधे चौपट कर दिये , लगा रहे हैं  आग।

मिटा विरोधी तत्व को, मना रहे हैं फाग।


आँसू ले बूत में खड़े,  श्री  रविन्द्र   टेगौर।

ममता मुझको दीजिए,कहीं ठिकाना और।


जिनके गीतों से हुआ,  आजादी उदघोष।

उनकी धरती को मिला,मौतोंका परितोष।


पावन धरती ने जना, अद्भुत वीर सुभाष।

ममता उनके कृत्य का,उड़ा रहीं परिहास।


सत्ता के इस खेल में, मचा हुआ संग्राम।

रहीं बिलखती चूड़ियां,देख रहीं कुहराम।


जीवन साथी है नहीं, सत्ता मात्र रखैल।

पाँच साल के बाद में,मिलता दूजा बैल।


सूरज की पहली किरण, लायी नूतन भोर।

तमस कोहरा छँट गया,गन्धित मन की कोर।


कोई विधायक, मंत्री, कोई बना प्रधान।

कहीं बचा न कोई भी,खाली हुआ मकान।


निसन्तान दशरथ हुए, पुरी अयोध्या धाम ।

तीन रानियों से चला, नहीं वंश का नाम।


पूजन वन्दन सब किया, पूजे सन्त समाज।

अग्निदेव पूरण करें, सबके बिगड़े काज।


घोर तपस्या से किया , अग्निदेव का यज्ञ।

मन्त्रों को खुद बोलते, जैसे कोई विज्ञ।


अग्निदेव खुश हो दिया, 'तस्मै' का एक पात्र।

इच्छित फल रानी मिले, खाएं इसको मात्र।


कौशल्या कैकई चखा ,सँग सुमित्रा स्वाद।

पल में सब के कट गए,जीवन के अवसाद।


पंख पसारे उड़  रही, नभ में कोई चील।

खीर पात्र को देखकर, उडने में दी ढील।


बिनु विलंब के ले गयी, नभ में खीर उड़ाय।

यही सोच मन में लिए ,आज पेट भर जाय।


ठिठकी लखिकर आश्रम, करने को विश्राम।

जहाँ अंजना माई का,चले भजन  अभिराम।


नभ में उड़ती चील को, रही अंजना देख।

गिरा चील के पात्र से, वहीं खीर की रेख।


मुख अंजना के गिरी, आकर के कुछ खीर।

खीर उदर  जाकर   लगी, माता हुई अधीर।


उदर अंजना के गयी, अग्निदेव की खीर।

आराधन शिव का हरे,सदा उदर की पीर।


चैत्र मास तिथि पूर्णिमा, शुक्ल पक्ष का योग।

मंगल था पावन दिवस,जननी का सुख भोग।


मात अंजना ने जने ,  हनुमान से   वीर।

आजीवन सेवक रहे,जिनके प्रभु रघुवीर।


तन जनेऊ से हुआ, पावन  परम    पुनीत।

जन्मजात जिसको मिला, राम नाम संगीत।


पिता केसरी के हुए , पुत्र   बहुत  बलवान।

पवनपुत्र निशिदिन भेजें,प्रेम सहित श्रीमान।


शिव के ग्यारेवें हुए ,    ये  हैं  रुद्र   अवतार।

जिनका सुमिरन कर सके,हम सबका उद्धार।


मिला जगत में सात को ,सदा रहे असितत्व।

इनमें इक हनुमान   हैं, जो  पाये    अमरत्व।


 विध्वंसक  हैं पाप  के, और  बांटते नेह।

बजरंगी कहते इन्हें,क्योंकि बज्र सी देह ।


स्वर्ण मुकुट सिर पर रखे,तन पर मात्र लँगोट।

हाथ गदा एक अस्त्र है, कवच पूँछ की ओट।


माता  सीता से लिया  ,  सिन्दूर का ज्ञान।

पोता पूर्ण शरीर पर ,करने प्रभु कल्याण।


ऐसे हनुमत  वीर को, जो करता है याद।

जीवन में  निर्भय बने, और रहे आबाद।



सत्य सनातन सभ्यता, दे हमको सन्देश।

इसको  जीवन में रखें, चाहे रहें विदेश।


चैत्र  शुक्ल की प्रतिपदा , वसुधा का श्रृंगार।

नव पल्लव विकसित हुए, सजता माँ दरबार।



चार चरण में हम करें, सुंदर खूब बखान।

श्रोता   डुबकी मारकर, कर लेवें रसपान।


ग्यारह तेरह सम  विषम , होता एक  विधान ।

यति गति लय के साथ में,लघु गुरु का भी ध्यान।


शब्द सृजन पर हो रहा,दोहों से आगाज़।

कवि कल्पना को मिले, आज नयी परवाज़।


महा काली, माँ लक्ष्मी, और सरस्वति रूप।

श्रद्धा के नव दिवस में,पूजित हुए स्वरूप।


चैत्र शुक्ल की प्रतिपदा , वसुधा का श्रृंगार।

नव पल्लव विकसित हुए, सजता माँ दरबार।


उर में हो संवेदना, अधरों पर मुस्कान।

जिव्हा रस हमको करे,भक्ति के रसखान।


इस जगती में नारि के ,देखो कितने रूप।

उसकी गोदी खेलते, आकर सुर नर भूप।


ग्यारह तेरह सम बिषम,होता एक विधान।

यति गति लय के साथ में, गुरु लघु  का भी ध्यान।


वसुधा नाचे पहनकर, बासंती परिधान।

कामदेव का लग रहा केवल रति में ध्यान।


मन मयूर नर्तन करे,लखि वसुधा श्रृंगार।

प्रेम सरोबर डूबकर,मादक हैं अंगार।


बासंती  ऋतु  देखकर, पतझर खोजे ठौर।

पुनि पुनि मन में खीझता, देख आम का बौर।


चम्पा  बेला  को  लखें, अब टेसू के फूल।

मुख मण्डल रवि का तके, सूरजमुखी दुकूल।


सिर कलशी धारण किये,करती अलसी नृत्य।

 खड़े साथ में ज्वार के, बदल रहे हैं कृत्य।


एक आँख से लग रहे, कहीं कटारी तीर।

दोनों से जब भी लगें , कौन बंधाये धीर।


 सपनों के  बाजार में, रहे शान्ति को खोज।

लेकिन खिलते हैं नहीं,मन के कभी सरोज।


किलकत किरणें नित करें,तरूणाई का मान।

मन मलीनता में करे , सन्ध्या का अवसान।


दन्त पंक्ति में दे दमक,प्राची से दिनमान।

ढलती सन्ध्या में ढला,मुखमण्डल  का मान।


तन मन को पुलकित करे मन का कोमल भाव।

प्रेम व्याकरण कब पढ़े,निज मूंछों का ताव।


तनी गर्दनों की सुनी,कहाँ कभी मनुहार।

प्रेम दृष्टि से बह चली, उर से अविरल धार।


मर्दन से तो रिक्तता पाते हैं भुजपाश।

प्रेम दृष्टि से आ रहा,बाँहों में आकाश।


कमर करधनी का कथन,पैजनिया  की चाप।

झंकृत तारों में झुकी मन मृदंग की थाप।


देश विरोधी ताकतें, रचती है षड़यंत्र।

फूट डालकर धर्म में, तोड़ रहीं   हैं तंत्र।


 विश्व मंच पर हो सके, हिंदी का कल्याण।

सेवा में अर्पित करें, अपने तन मन प्राण।


 मिलकर बढ़ने में कहीं, आयी एक दरार।

वर्ग विभाजन ठीक है,हो न कभी तकरार।


 संक्रति  का  पर्व ये ,  देता है सन्देश।

निकल संक्रमण काल से, मिले नया परिवेश।


दिव्य सनातन देश में,हिंदु धर्म पर नाज़।

फिर भी घर में घुस रहा,आज सेंटाक्लाज।


हमने तो सीखा यही,बनना हमें उदार।

पर गिरवी रखते नहीं, अपने कभी विचार।


आदर सबका जानते, सबको देते प्यार।

हम तो बांटें फूल ही, वो क्यों बांटें खार।


विश्व बन्धु की भावना,मंगलमय परिवार।

चोट आस्था पर करें,तो करते प्रतिकार।


काश टॉफियों में मिले, सहज प्रेम विस्वास।

धोखा बिल्कुल भी नहीं,आता हमको रास।



प्रातः किरणें पा हुई,वसुधा भाव विभोर।

मन के उपवन में करें,नर्तन प्रमुदित मोर।


प्रातः वन्दन में सभी ,खड़े हुए कर जोर।

वसुधा के कल्याण को,करना नन्दकिशोर।


प्रातकाल उठकर करें,प्रभु का सुमिरन नाम।

तदुपरांत सारे करें ,पूरण अपने काम।

शीतलता देता कभी,कभी दिखाता ताव।

उस रवि का संदेश है,बदले मनुज स्वभाव।


खेती से पलते मिलें,नित्य सृजन के बीज।

सत्ता कृषक देव की,झेल सके न खीज।


हँसते गाते कट गए,अपने उमर पचास।

प्रभु से है बस कामना,काम करें कुछ खास।


धूप छाँव सी जिंदगी,सुख दुःख का संयोग।

जब तक काया ये रहे ,जीवन जियें निरोग।


जीवन जीने के लिए ,तन मन करता काम।

उस शरीर को चाहिए, थोड़ा सा आराम।


अलसायी आँखे मले,व्याकुल मुर्गा भोर।

मनुज उठा फिर भी नहीं, खूब लगाया जोर।


कहीं भूत में खो गयी, ये पगलाई भोर।

पनिहारिन को ताकती, नित पनघट की डोर।


कली कली से फूटता,करुणा का मकरन्द।

पीकर उस मकरन्द को,मिलता बस आनन्द।


आनन्दित मन हो गया,प्रमुदित मन की कोर।

वसुधा वेसुध झूमती,देख अवतरण भोर।


हँसते गाते कट गए,अपने वरष पचास।

प्रभु से है बस कामना,काम करें कुछ खास।


धूप छाँव सी जिंदगी,सुख दुःख का संयोग।

जब तक काया ये रहे ,रखना हमें निरोग।


जन्मदिवस की कामना,आयीं मन के द्वार।

स्वीकारें सब मित्रगण, इस दिल का आभार।


पाकर के शुभकामना,होता मालामाल।

मन के कोमल हो गये, अपने यक्ष सवाल।


तन वृंदावन हो गया,दुआ मिली भरपूर।

मन आँखों में आ गए,मित्र बसे जो दूर।


ब्रजमंडल में जन्म ले,बना बरेली वास।

करुणा को जीकर लिखा,कविता में मधुमास

 

करनी कथनी से मिला,मंचों पर परितोष।

प्रभु की कृपा से मिला,घर में है संतोष।


चेहरे पर मुस्कान है,अंदर से गम्भीर।

मन को कोमल कर रहे,हास्य व्यंग्य के तीर।


चुम्बक सा प्रभु से मिला,आकर्षक व्यक्तित्व।

सिद्ध धरा पर कर रहे,आने का असितत्व।


कहीं बेटियां दाँव पर,कहीं सन्त का अंत।

धिक धिक ऐसे तंत्र को, हों अपराध अनन्त।


लेखक के हाथों सदा,कलम बड़ा हथियार।

जिसका रह सकता नहीं,कोई खाली वार।


बड़ा अलौकिक मिल रहा,प्रकृती का उपहार।

किरणों ने आकर किया,वसुधा का श्रृंगार।


ब्रह्मचारिणी देवि का,मन में करें विचार।

इच्छित वर देकर हमें,करें बहुत उपकार।


लेखन अपना चाहिए, गरिमा के अनुकूल।

प्रमुदित मन हो पढ़ सके,जैसे विकसित फूल।


अपनी अक्षर साधना,लिए अमरता तत्व।

सदियों तक जीवित रहे, साधक का कृतित्व।


शब्द शब्द में बृह्म हैं,शब्द बहुत अनमोल।

कर सकते कुरुक्षेत्र भी,अपने तीखे बोल।


शब्दों से कुरुक्षेत्र है,शब्दों से वनवास।

पूरित शब्दों से हुआ,गीता का अभिलाष।


सकल विश्व में शब्द की,महिमा बड़ी अनन्त।

दुर्जन,निश्चर भी रचे,कहीं रचे अरिहंत।


भू पर  आई अप्सरा, कर षोडस श्रृंगार।

पिय के हिय में आ गयी,वह नयनों के द्वार।


अधरा तो मधुमास है, आँखें तीर कमान।

भृमरा का मन डोलता,करने को रसपान।


पावस ऋतु की रूपसी,सागर उठी हिलोर।

चंदा मुख को लखि रहा,बैठा डाल चकोर।


बासंतिक परिधान में,देख उर्वशी चित्र।

भंग तपस्या कर रहे,मन के विस्वामित्र।


सजी धजी है राधिका,रचना भाव विभोर।

मन के आँगन में बसा, गोकुल का चितचोर।


मंगल की ले कामना,करतीं करवा चौथ।

मन के आँगन ना रहे,कहीं विरह की सौत।


सुबह सुबह होती रहे,जय श्री कृष्णा श्याम।

सृजन धर्म का सिलसिला ,चले सदा अभिराम।


खुद ही खुद से होगया, ख़ुद ही ख़ुद विस्तार।

खुद ही खुद संकल्प ये ,ख़ुद पायेगा पार।


संकल्पों ने खींच दी,लम्बी एक लकीर।

तब से दृढ़ संकल्प है,मन का अति गम्भीर।



संकल्पित मन वेग की,,दूर क्षितिज तक दृष्टि।

बढ़ते पग से नाप ली,आदर्शो की सृष्टि।


दृष्टि बसा भूगोल को,कदम लिखें इतिहास।

वसुधा पर खिलता रहे,जगती का उल्लास।


बड़े लक्ष्य ने तज दिया,मन का सब संकोच।

स्थिर दृढ़ता को नहीं ,हिला सका उत्कोच।


उदित भानु करता रहा,पावन दृढ़ संकल्प।

इसीलिए मग में मिली,बाधाएं अति अल्प।


कल्प तरु ढिंग बैठकर,आशावादी सोच।

पागल मन की हर गया,पीड़ा रूपी मोच।


मन के कोने में रखा,नहीं कोई सन्देह। 

इसीलिए जग का मिला,इच्छित ऊर्जित नेह।


ढलती सांझों ने किया,तम का नित प्रतिकार।

प्रातःभू को तब मिला,उदित भानु संसार।


जब तक मानी है नहीं,कर्तव्यों ने हार।

वसुधा रोली में सजी,खुशियां अपरम्पार।


संकेतों में जब मिले, खुशियों का इज़हार।

धन्यवाद लिखकर करें,चुकता सभी उधार।


देव दिवाली के दिये,करें जगत उजियार।

बेबस कोने में छिपे,निशा काल अंधियार।



मन की पीड़ा हर सके,एक प्रज्ज्वलित दीप।

अंतर्मन से खीज ले,विस्वासों का सीप।


तमस निशा को चीरता, दीपक का आलोक।

झंझावाती आंधियां, रहा खड़ा था रोक।


आशाओं के दीप भी ,मन में करें प्रकाश।

नर्तन आँगन में करें,उपवन के उल्लास।


मास कार्तिक पूर्णिमा, अनुपम पर्व प्रकाश।

जग को रोशन कर रहे,खुशियों के आकाश।


स्वच्छ चाँदनी में रखी,शरद रात्रि में खीर।

खाकर प्रातः काल में, बदले हम तकदीर।


राजनीत का खेल भी , बड़ा ही अपरम्पार।

कहीं कहीं मातम मिला, कहीं कहीं त्यौहार।


देवेंदर के  साथ  में, आये अजित पवार।

और देखते रह  गए, चाचा  जी सरदार।


घोर विरोधी से मिला,हुआ नया इक पाप।

गहरे सागर ले गया,शिवजी का अभिशाप।


चतुर खिलाड़ी हैं बड़े, श्रीमन शरद पवार।

कांगरेस के  साथ  में, दी  शिवसेना मार।


बीत रहा है आज से, दो हजार उन्नीस।

देना प्रभु जी बीस में,खुशी हमें इक्कीस।।



पुण्य धरा को है नमन,जन्मे भगत,सुभाष।

शेखर विस्मिल लिख गए,फौलादी एहसास।


क्रांति सदा लिखती रही, उत्सव के निष्कर्ष।

इसीलिए ये स्वर्ग है,अपना भारत वर्ष।


जब तक सीमा पर खड़े,अपने वीर जवान।

तभी तलक हम सो रहे,यहाँ चादरा तान।


लिए तिरंगा दे रहे,जो अपने निज प्राण।

न्यौछावर उन पर सदा,गीता वेद पुराण।


वीरों से लिखती रही ,क्रांति मंत्र की बात।

तभी हमें ये दे सके,आजादी सौगात।


बाट जोहता ही रहा, सत्तर वर्षीय तंत्र।

अब पीओके माँगता, अब अपना गणतंत्र।


तीन सौ सत्तर हट सकी, सत्तर सालों बाद।

अब लगता हो जायेगा, पी ओ के आजाद।


जब अधरों पर चढ़ गया,सहज राष्ट्रीय गीत।

तब सैंतालीस लिख गया,क्रांति मंत्र की जीत।


सभी मनुज मिलकर लड़े, आजादी की जंग।

अब नफरत भी आ गयी,जब चढ़ा सियासी रंग।


तीन रंगों में है लिखा,शांति सम्रद्धि अरु त्याग।

अपने दिल में भी रहे,इसके प्रति अनुराग।

 

 वेग थामने के लिये,कुहरा कसे लगाम।

सूरज करता दिख रहा, यौगिक प्राणायाम।



अमरीका ईरान में,शुरू अघोषित जंग।

लहू किसी का भी बहे,सदा एक सा रंग।


लगता है अब विश्व में, शुरू तीसरा युद्ध।

भारत की हो भूमिका, बने महात्मा बुद्ध।


कंकरीट  के शहर  में, धन के पीछे पाँव।

हम तो विकसित हो गये,छूट गया है गाँव।


लिया उधारी में बड़ा, मंजिल ऊपर ठाँव।

उसे चुकाने में  गया, जीवन का हर दाँव।


जिसने जीवन में किया,शिक्षक का सम्मान।

उसके स्वागत में खड़ा,अम्बर में दिनमान।



धनतेरस

हो त्रियोदश कार्तिक, कृष्ण पक्ष का योग।

धनवन्तरि का प्राकट्य, स्वस्थ रहें सब लोग।


धनतेरस के दिवस पर,खूब सजे बाजार।

क्रय करने कुछ वस्तुएं, लगा रहे रफ्तार।


नरक चतुर्दशी

कृष्ण चतुर्दश को लिये,नरकासुर के प्राण।

राक्षस योनि से बचा,कृष्ण किया कल्याण।


काली चौदस के दिवस,एक जलाते दीप।

विनती है यमराज से, ना हो काल समीप।


घोर अमावस के दिवस, पुनःअयोध्या धाम।

घर के दीपक बोलते, स्वागत जय श्री राम।


लक्ष्मी जी को पूजते,खील बताशा भोग।

हो घर में धन सम्पदा,निकट न आते रोग।


गली गली में हो रहा , घोर पटाखा शोर।

थल से नभ तक छा गया,प्रदूषण घनघोर।ज़


फुलझड़ियों को देखकर,रॉकेट भरें छलांग।

बम तो ऐसे फट रहा , जैसे पी ली  भाँग।


गोवर्धनपूजा(अन्नकूट)

छोटी उंगली पर उठा,गोवर्धन महाराज।

मान मिलाया धूल में,हिला इन्द्र का ताज।


छप्पन भोगों पर हुआ,अन्नकूट को गर्व।

गोवर्धन को  पूजकर, मना रहे  ये  पर्व।


भैया दूज

यमुना ने यमराज का ,खूब  किया सत्कार।

यमद्वितीया के पर्व पर,भाई बहन का प्यार।


पूजन कर यमराज का, करते यमुना स्नान।

नरकलोक से मुक्ति हो,कहता पदम पुराण।


जीवन में प्रतिदिन मिले,मंगलकारी भोर।।

प्रेम और बन्धुत्व की,खुले कभी ना डोर।।


लाक्डाउन अब हो गया,पूरा हिंदुस्तान।

चौदह अप्रेल तक रहे,अपने घर इंसान।


चलते चलते लिख दिया,रिश्तों का एहसास।

अपनों से मिलता सदा,पतझर में मधुमास।


अमरीका ईरान में,शुरू अघोषित जंग।

लहू किसी का भी बहे,सदा एक सा रंग।


लगता है अब विश्व में, शुरू तीसरा युद्ध।

भारत की हो भूमिका, बने महात्मा बुद्ध।


माघ पूर्णिमा का दिवस,जन्में श्री रविदास।

सन्त शिरोमणि कर्म से,रखते दृढ़ विश्वास।


फागुन महीने से हमें, है अनुपम अनुराग।

तन  खिलता है रंग से,मन गाता है फाग।


बीच भँवर जब भी फँसा,अगर कहीं जलयान।

कंठ गरल धारण किया,लगा शम्भु ने ध्यान।


दैत्य दानवी चाल का,जिसे पूर्व में ज्ञान।

हमें सुधा वितरित किया,करके खुद विषपान।


बड़े  प्रेम से भेजता, चुटकी एक गुलाल।

मन की इच्छा है यही, ना हो सूना भाल।


रंगों से मस्ती  मिले, भीगे तन  उल्लास।

मन के आंगन में बने,खुशियों के आवास।


पूड़ी से गुजिया तलक,विविध बने पकवान।

भोग लगा कर प्रेम  से, जेमे हम श्रीमान।


प्रभु से करते कामना,खुशियां मिले अपार।

मस्ती को गाता मिले,होली का त्यौहार।


इस नफरत की आग में,गईं अनेकों जान।

खूनी होली  खेलता  ,दंगे में इंसान।


जनता कर्फ्यू के दिवस,घर पर रहिये मित्र।

देखो सबके  साथ  में, टी वी पर चलचित्र।


घण्टा थाली शंख को, नहीं जाइये भूल।

कोरोना तो आज ही ,चाट सकेगा धूल।


हो सकती अंताक्षरी,अरु लूडो का खेल।

देखो कैसे फिर  बढ़े,  प्रेम तने की बेल।


मिलकर काम  बटाइये, अर्धांगिन  के संग।

कटना निश्चित मानिए,ग्रह कलेश की जंग।


बच्चों  से  मस्ती करें , खूब  खिलाएं खेल।

उनको पिकनिक ये लगे,ना समझे वे जेल।


पीअम के आव्हान का,सफल करें अभियान।

जग की सरिता में  चले, जीवन का जलयान।


तपोभूमि ऋषि मयन की,मार्कण्ड का धाम।

मात शीतला को जपे,मैनपुरी अभिराम।


घर में बैठे अरु लिखें,कविताएं दो चार।

समय कटेगा प्यार से,बचे सकल संसार।


बिना सुगर के ही पिये, हम कितनी भी चाय।

कविता में देते   रहें ,मीठी - मीठी राय। 


सुबह शाम योगा करें,दिन में देखें न्यूज।

बेमतलब की बात में,ना होवें कन्फ्यूज।


हम बिल्कुल भी ना  छुएं, ताला कुंडी द्वार।

धोखे से यदि छू गए , धुलें  हाथ हर बार।


इज्जत की अब बात है,बचे आँख मुँह नाक।

देव स्वरूपा मानकर,  इनको  रखना पाक।


जीवन भर पिसते रहे ,  करते- करते काम।

मुश्किल से है अब मिला,इक्कीस दिन विश्राम।


कठिन दिनों में हम करें,सृजन भरे कुछ काम।

जो सदियों तक दे सके  ,जग में अपना नाम।


नव दुर्गा में हो सकें ,सेवा के  कुछ काम।

मानो संगम में उतर, कर लिए चारों धाम।


घर मानें हिम कन्दरा  ,जहाँ  लगालें ध्यान।

मिली ऊर्जित शक्ति से,तोड़ें रिपु अभिमान।


कर एकान्तिक साधना ,  होकर  सबसे   दूर।

फिर खुलकर जीवन  जियें, खुशियों से भरपूर।


बाहर   जाने की  नहीं ,चले  भ्रात तरकीब।

घर के आँगन में जियें,खिलकर ज्यों राजीव। 


कोशिश मन से कीजिये, नैया होगी पार।

मनोयोग से मिल सके,संकट पर अधिकार।


पेड़ लगेंगे शहर में,  अबकी कई हजार।

दूषित साँसों को मिले,जीवनका आधार।


सिद्धि हो संकल्प की,दिखें सड़क पर पेड़।

फाइल में दम तोड़ती,लगे पेड़  की मेड़।


कोशिश सबकी चाहिये,सूख न  पायें पेड़।

मिलकर सब चिंता करें,बचपन वृद्ध अधेड़।


पेड़ लगाने   के  लिये , अधिकारी  तैयार।

फाइल लेकर दौड़ती,तेज सड़क पर कार।


पटल सुबह ही हो गया,जैसे पावन धाम।

कलम हमारी ने लिखा,कृष्णा जी के नाम।


बहिनों की राखी बँधे, अब सैनिक के हाथ।

आजीवन मिलता रहे,उनका हमको साथ।


मथुरा की आराधना,गोकुल जैसा ठाँव।

वृंदावन में रास कर,जमे द्वारिका पाँव।


अभिलाषा ह्रदय बसी,अपने मन के ठाँव।

आँखें व्याकुल खोजती,कृष्ण लला के पाँव।


कृष्ण राधिका रास हो,अपने मन के गाँव,

बजे प्रेम की बांसुरी,घनी कदम्बन छाँव।


हम सबकी आराधना,कृष्ण लला के पाँव।

कोकिल सी धुन पा सके,कौओं की भी काँव।


सुबह शाम देखो यहाँ, मनुज रहा है भाग।

इसी जुगत में है लगा, बुझे पेट की आग।


रोजी रोटी के लिये, है सडकों पर भीड़।

साथ लिये संकल्प को, हो छोटा सा नीड।


चौराहे की बत्तियाँ, प्रतिपल दें संकेत।

जो इसको ना मानता,रहता है वो खेत।


आँख बचाकर भागते,बड़े फितरती लोग।

दुर्घटना से सामना, जीवन भर का रोग।


आज बड़े ही सिरफिरे, तोड़ रहे कानून।

बनें मुसीबत और को, बनते अफलातून।


परिवर्तन के दौर में, चढ़ा सेलफी क्रेज।

सिर पर भूत सवार है,चाहे कोई भी ऐज।


एक सेलफी के लिये,सड़कें पटरी जाम।

नया चला इस्टन्ट ये,करता काम तमाम।


जिसने जीवन में किया,शिक्षक का सम्मान।

उसके स्वागत में खड़ा,अम्बर में दिनमान।


अक्षर अक्षर ब्रह्म है,सदा अमरता प्राप्त।

वसुधा से ब्रह्मांड तक,इसकी शक्ति व्याप्त।


नारों में छाया रहा,अपना चौकीदार।

इसीलिये ये आंकड़ा,गया तीन सौ पार।


छप्पन से ज्यादाहुआ, सीनेका आकार।

विश्व गुरु का स्वप्न भी, लगता अब साकार।


नेता नहीं विपक्ष का,ऐसा दूजी बार।

बाँहे समेटे कर रहे , शेरों से तकरार।


मोदी युग में ना रहा,कहीं ठिकाना ठौर।

इसीलिएअब चल रहा,इस्तीफों का दौर।


दो चरणों के बाद भी,दिखता नहीं उपाय।

ब्रह्म अस्त्र ना दे रहा,राहुल जी को 'न्याय'।


कागा स्वर में आ गयी,कोकिल सी आवाज़।

मौसम भी डरने लगा, कहाँ गिरेगी  गाज़।


कांगरेस में चल रहा, इस्तीफों का दौर।

वे सब मिलकर ढूंढते,नया ठिकाना ठौर।


जीत हार भी दे रहा, निश्चित कुछ सन्देश।

कोरे भाषण से कभी, नहीं चला है देश।


प्राची से अरुणिम प्रभा,दमके वसुधा भाल।

कलरव से  गुंजित हुई,तरुओं की हर डाल।


कृषक के सम्मान में,अब सबका है ध्यान।

उनके हित में आ रहे,नित नूतन सोपान।


तपन  सूर्य में  बन्द है , कोयल का भी राग।

नवल रश्मियां भी अभी,उगल रहीं हैं आग।


मित्रों में चलता नहीं, भला बुरा कुछ यार।

आपस मे बढ़ता रहे, भाईचारा प्यार।


मैनपुरी से आगरा ,बीच फिरोजाबाद।

वहां से भी आगे चले, मिले गाजियाबाद।


सप्त स्वरों में गा रहा,प्राची से दिनमान।

विहगों के अधरों  खिली, मधुर मधुर मुस्कान।


हम सबकी अब हो गयी,लगभग उमर पचास।

शब्दों में गरिमा रहे, मतलब हो कुछ खास।


दिन भर काफी व्यस्त है, बना बनाकर ताज।

लोकतंत्र में आगरा ,बना रहे सरताज।


कुछ पर राधे प्रेम का, सिर पर चढ़ा बुखार।

और लखनवी मित्र को,शैम्पेन से प्यार।


मित्रों की ये मंडली ,मिली दिनों के बाद।

खुशियों से होता रहे,पटल सदा आबाद।


जीवन मे मानो नही, कभी किसी से हार।

उंगली दबी निकालिये, चाहें डाँट, पुचकार।

योग 

नियमित जीवन में करें,घण्टे भर का योग।

तन मन को सुख शांती , कटते जड़ से रोग।


ईसा राम रहीम हों, चाहे नानक नाम।

योगासन में साथ हो,थोड़ा  प्राणायाम।


उगते सूरज का करें ,प्रातः स्वागत रोज।

इस शरीर में रोग को,नहीं पाओगे खोज।


सूर्योदय से शाम तक, रहे ताजगी शेष।

घण्टे भर के योग से, ऊर्जा करें निवेश।


ऋषि पतञ्जलि ने दिया, ये अनुपम वरदान।

डंका बजता विश्व में,चमक रहा दिनमान।


योगासन में मिल रहा,बहुत मान सम्मान।

कुछ तो सेवा में लगे,कुछ की चली दुकान।

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ईश्वर ने सबको दिए,अलग अलग ही रूप।

कहीं कटोरा हाथ मे,  कहीं  बनाता भूप।


सिर पर आ गया,अपने गुरु का हाथ।

उसको जीवन में सदा,मिलता प्रभु का साथ।


गुरुवर के आशीष से, होते पूरण काम।

उनके पावन चरण में,सारे तीरथ धाम।


दोहे मात्रा में लिखें, लिखें वर्ण में छ्न्द।

गज़लें बहरें माँगती,गीत माँगता बन्ध।


कंकरीट  के शहर  में, धन के पीछे पाँव।

हम तो विकसित हो गये,छूट गया है गाँव।


लिया उधारी में बड़ा, मंजिल ऊपर ठाँव।

उसे चुकाने में  गया, जीवन का हर दाँव।


पहले झप्पी प्यार की, फिर मारें वे आँख।

भारत  में फैला रहे , इटली वाली पाँख।


होली के रंग से खिले,अधरों पर मुस्कान। 

मन को मीठा कर सकें, ऐसे हों पकवान।


इस होली पर ना रहे  , कोई  सूना  गाल।

प्रेम सहित मलते रहें,चुटकी एक गुलाल।


दुश्मन के हर कृत्य को,कदम उठेंगे ठोस।

ठोस कदम इतने हुऐ ,. उठने  में  बेहोश।


खतरे में दिखने लगा,पोलटिक्स का खेल।

इसी लिए अब हो रहा,सांप नेवला मेल।


चोर उचक्कों ने किया,बेमौसम गठजोड़।

उन सब में कैसी लगी,पीअम पद की होड़।


तिरंगे पर भी लग रहा , भगवा जैसा टैग।

फिर क्या हम फहराएंगे, भाग चलो ले बैग।


राजनीति का हो गया ,कितना गन्दा खेल।

सूक्ति बदलने पर तुला,साँप नेवला मेल।


 कायर हमला ले गया,सैनिक  दर्जन चार ।

और शहादत मांगती,हमला हो उस पार।


त्याग तपस्या प्रेम अरु, है ममता की खान।

सृष्टि रचयिता नारि का, हो जग में सम्मान।


लू चलती दोपहर में, मत करना व्यवधान।

विस्तर पर आराम है ,बिना चादरा तान।


गृहमंत्री इस फोन पर, लगा रहीं प्रतिबन्ध।

फिर भी चोरी से कहें, शब्दों के अनुबन्ध।


डाल डाल पाती जपे, राधे कृष्णा नाम।

प्रेम सिंधु में  डूबने ,चल वृन्दावन धाम।


सेवा श्रद्धा ज्ञान में , था आगे बंगाल।

आज चुनावी दंश ने, बना दिया कंगाल।


मोदी जी को ला रहे,  अब तो एक्ज़िट पोल।

दुश्मन सारे मौन हैं ,देख शाह का ढोल।


नव सृजन कर अनवरत,करें लेखनी धन्य।

सुखद भाव अविरल अमर,होते हैं अनुमन्य।


आज  शाम  को नौ  बजे, अपनी चौखट धाम।

करें प्रज्ज्वलित हम सभी,दिया देश के नाम।


उर पर प्रभुवर राम का,आजीवन अधिकार।

हनुमत से है प्रार्थना, दें मन में संचार।


प्रभु ने सबकी थाम ली ,मजबूती से डोर।

वो ही करते नित्य हैं , मंगलकारी भोर।


अपलक रहे निहारते, मदिरालय का धाम।

भक्त व्यथा को देखकर,मौन खड़ा है जाम।


मदिरालय तक दौड़ते, पूरा करने ख्वाब।

लाठी पर भारी पड़ी, पौआ एक शराब।


चला चीन से वायरस,धरे रूप विकराल।

राक्षस जैसी वृत्ति का,है कोरोना काल।


कोरोना से कब बचा,कोई राजा रंक।

इसके सम्मुख जो गया, मिला विषैला डंक।


एक मुखौटा मुख लगा, हों प्रच्छालित हाथ।

चौखट के अन्दर रहें, बस अपनों के साथ।


भीड़ भाड़ के क्षेत्र में, नहीं करें  प्रस्थान।

सामाजिक दूरी बनी, जीवन की वरदान।


किसी बाहरी वस्तु को, मत करना प्रयोग।

जीवन से भी मिट सके,बहुत बड़ा दुर्योग।


रौद्र रूप में भी रही, माँ की ममता  साथ।

आज तलक भी याद है,लोरी वाला हाथ।


 माँ को शब्दों में लिखूँ, ऐसी कहाँ औकात।

 कलम सदा ही रोकते,आँसू के जज़्बात।


लाख टके से कीमती,होता आशिर्वाद।

माँ की ममता का नहीं,हो सकता अनुवाद।


अपनी सन्तति के लिये,भूली निज पहचान।

आँसू अंदर पी लिए, चेहरे पर मुस्कान।


माँ को शब्दों में लिखूँ, ऐसी कहाँ औकात।

शब्दों पर भारी पड़े,आँसू के जज़्बात।


रौद्र रूप में भी रही, माँ की ममता  साथ।

आज तलक भी याद है,लोरी वाला हाथ।


लाख टके से कीमती,होता आशिर्वाद।

माँ की ममता का नहीं,हो सकता अनुवाद।


अपनी सन्तति के लिये,भूली निज पहचान।

आँसू अंदर पी लिए, चेहरे पर मुस्कान।


सेवा श्रद्धा ज्ञान में , था आगे बंगाल।

आज चुनावी दंश ने, बना दिया कंगाल।


सन्नाटे को  चीरकर , चलने को मजबूर।

सड़कों पर थैला लिए,चलता है मजदूर।


जीवन जीने की जुगत, करली है भरपूर।

मंजिल फिर भी दीखती आसमान से दूर।


जिन हाथों से थे बने,सिंहासन और ताज।

दो रोटी को हो गये , वो देखो मोहताज।


लिये विवशता भाव को,निकले अपने गाँव।

मंजिल से  पहले थके,  छाले वाले पाँव।


दया भाव भी जग सके,अपने मन के गाँव।

मरहम थोड़ी लग सके, फ़टी विबाई पाँव।


अभिलाषा मन में लिए,निकल पड़े हैं ठाँव।

मीलों की गिनती करें, घायल नंगे  पाँव।


आशाओं का के लिया, कंधों पर सामान।

भरी दुपहरी तोडती, सब उनके अरमान।


जैसे भी हो हम करें, कुछ सेवा सम्मान।

मजदूरों के रूप में ,आये हैं भगवान।


उस रज कण को पूजिये, जैसे तीर्थ स्थान।

जहाँ जहाँ पद से बन गए,अद्भुत अमिट निशान।


आशाओं का के लिया, कंधों पर सामान।

भरी दुपहरी तोडती, सब उनके अरमान।


*दोहे गमछा के* 


कोरोना के काल में,है गमछा हथियार।

करता संकट काल में,भव सागर से पार।


गर्मी  सर्दी ताप से,सदा बचाता यार।

मुँह को कसकर बाँधिये,घूमो नहीं उघार।


गमछा में गुण बहुत है,सदा राखिए संग।

कोरोना की कर सके,ये मर्यादा भंग।


प्रात काल से शाम तक,हो इसका उपयोग।

तन मन को आराम दे,और भगाये रोग।


इस जग में ना दूसरा,इतना सुन्दर मास्क।

इसे पहनकर हो सुगम,जीवन का हर टास्क।


गमछा से होने लगे,जग में लोग महान।

इसे पहनकर शौक से, दिखा रहें हैं शान।


गमछा को अपना रहा ,अपना पूरा देश।

संस्कृति की रक्षा करें,मिटा जगत के क्लेश।


गमछा को अब मिल गया,मोदी जैसा ब्राण्ड।

जिसकी पावर है बहुत, बचे सकल ब्रह्मांड।


मानवता को है बड़ा, गमछा पर अभिमान।

आज व्यवस्था से लड़े, और बचाये प्राण।


बड़े पुराने काल  से , है गमछा परिधान।

इसे पहनकर बच सके,अपना हिन्दुस्तान।


कांगरेस में चल रहा,इस्तीफों का दौर।

वे सब मिलकर ढूँढते, नया ठिकाना ठौर।


बचपन में खेले सभी कोड़ा वाले खेल

जो पीछे मुड़ देखता उसमें देते पेल


मिलन हिमालय का हुआ, मैना से इक बार।

दो   कन्या गंगा  -उमा,   जन्मी उनके द्वार।


गंगा पावन  रूप थी, पहुँच गयीं  सुरलोक।

उमा तपस्या शिव मिले,सुधर गया इहलोक।


पुरी अयोध्या राज्य में,नहीं सगर सन्तान।

वंशज पाने के लिये ,त्याग तपस्या ध्यान।


नृपति सगर को मिल गया,भृगुऋषि का वरदान।

दोनों   रानी   से उन्हें,    मिलें   खूब  सन्तान।


पहली रानी  से  हुए , असमंजस  महाराज।

साठ हजार दूजी जने,सफल हुए सब काज।


असमंजस महाराज के,तेजस्वी अशुमान।

अश्वमेघ की घोषणा, चमक उठे दिनमान।


बात पची न इंद्र को, घोड़ा  लिया चुराय।

उसकी रक्षा के लिये,सगर पुत्र भिजवाय।


षट सहस्र थे महावली ,पहुँच गये पाताल।

कपिल मुनि का आश्रम,पूरा दिया खंगाल।


अश्व बंधा पाया वहीं, जहाँ ऋषी ध्यानस्थ।

क्रोधित   उत्पाती हुए,  महावली मदमस्त।


यज्ञ विघ्न से बढ़ गया,कपिल मुनि का ताप।

भस्म ज्वाला मय  हुआ ,साठ हजार का पाप।


चाचाओं की खोज में,निकल पड़े अशुमान।

पाया केवल भस्म को ,समझ गये  श्रीमान।


उनके तर्पण  के लिये ,मामाजी  का ध्यान।

केवल सुरसरि ही करे, गरुण दिया ये ज्ञान।


अंशुमान महाराज ने,किया त्याग घनघोर।

किन्तु सफल ना हो सके, चर्चाएं  चहुँ ओर।


भगीरथ पुत्र दिलीप ने, लेकर दृढ़ संकल्प।

ब्रह्मलोक को चल दिये ,करने कायाकल्प।


ब्रह्माजी को खुश किया, शिवजी लिए मनाय।

गङ्गा जी को सुख मिला, शीश जटा पर आय।


विन्दुसार से चल पड़ी ,धाराएं भी सात।

संग भगीरथ सातवीं,  जो थी गंगा मात।


ऋषि जुन्ह के आश्रम , यज्ञ हुआ व्यवधान।

क्रोधित ऋषि ने पी लिया, गंगा का सम्मान।


ऋषिमुनि सब विस्मित हुए,है स्तुति एक उपाय।

मुदित  ऋषि वर कर्ण   से, गंगा  जी  प्रकटाय।


बेटी ऋषिवर जुन्ह की,नया मिला एक नाम।

उसी  जान्हवी को  सभी ,पूजै  जैसे  धाम।


पुनः निकलकर चल पडीं, भागीरथ के संग।

सगर पुत्र तर्पित  हुए, मुदित लोक के  अंग।


गंगोत्री  से कर  शुरू, सुरसरि  का  वृत्तांत।

गंगासागर तक कलम,लिखकर होती शांत।


विरह व्यथा को कह रहा, आँखों छलका नीर।

इसी  नीर  के  साथ  में ,बह  जाती  है पीर ।


बेर केर का कब निभा,बहुत दिनों तक खेल।

किला रेत सा ढह गया , जिसे रहे थे झेल।


काव्य कलश में हैं छिपे, नित नूतन सोपान।

उपमानों में कल्पना,ऊँची भरे उड़ान।


जीवन पथ पर है मिला,प्रभु का नित आशीष।

धूप छाँव में हो गये   , अपने  वर्ष उनतीस।


जीवन भर मिलती रही,कहीं धूप अरु छाँव।

उस पथ  पर  बढ़ते  रहे, हम दोनों के पाँव।


मेजर शर्मा सोमनाथ,मोर्चा था बड़ग्राम।

शहादत से पहले किया,अरि का काम तमाम।


नौशेरा में थे लड़े,स्टेनगन के साथ।

वीर पराक्रमी साहसी, नायक श्री जदुनाथ ।


हवलदार मेजर हुए, पीरू सिंह महान।

दुश्मन बंकर ध्वस्त कर,लिखा नया बलिदान।


लांसनायक करमसिंह, लिया मोर्चा जीत।

साहस से खिसका गए,वे दुश्मन की भीत।


गुरुवचन सालारिया,थे कैप्टेन जावांज 

दफना चोटी पर गए, चालीस की आवाज।


बासठ वाले युद्ध में,धन सिंह थापा वीर।

मेजर से कर्नल बने,तोड़ चीन प्राचीर।


जोगिंदर सिंह वीर थे,अपने  सूबेदार।

चीनी फौजों को छका, किया वार पर वार।


सन बासठ के युद्ध में,मेजर सिंह शैतान।

रेजांग ला का मोर्चा, हुए जहाँ कुर्बान।


साहस के पर्याय थे, अब्दुल वीर हमीद।

पाकिस्तानी टैंक की ध्वस्त करी उम्मीद।


आर्देशवीर पुरजोर जी,तारापोरे वीर।

पाकिस्तानी टैंक भी, साठ दिए थे चीर।


एल्बर्ट एक्का साहसी,लांसनायक जावांज।

लड़े इकहत्तर युद्ध में,दवा शत्रु आवाज।


फ्लाइंग ऑफिसर रहे, ये सिंह निर्मल जीत।

अरि सेंवर जेट दो,ध्वस्त दुश्मनी भीत।


लेफ्टिनेंट सेकेंड थे,अरुण वीर खेत्रपाल।

तोड़े दुश्मन टैंक को,साहस दिखा कमाल।


जाट रेजीमेंट के,मेजर सिंह होशियार।

पैंसठ इकहत्तर जीत ,किया शत्रु बेकार।


सियाचिन मोर्चे पर लड़े,सिंह बाना सरदार।

पोस्ट उन्ही के नाम पर,थे उसके हकदार।


शांति सेना के लिए,रामास्वामी वीर।

तमिल टाइगर के दिये छः आतंकी चीर।


ख़लूबार को कर फतह, भर सेना में ओज।

दिला जीत होते अमर,कैप्टन श्री मनोज।


विक्रम बत्रा वीर को,कहें कारगिल शेर।

हम्प व रावी नाव में किया शत्रु को ढेर।


आटोमेटिक गन लिए,संजय रहे दहाड़।

दुश्मन भागे छोड़कर, हिंदुस्तानी पहाड़।


तीन चौकियां जीतकर,टाइगर हिल के पास।

योगेंदर जी ने था लिखा,एक नया इतिहास।


जीवन में माँ बाप से,मिला स्वांस आभास।

जीवन जीने के लिए,गुरु से मिला प्रकाश।


गुरु की महिमा में लिखें,कविताएं दो चार।

हमको  निश्चित ही मिले,भवसागर का पार।


जीवन में माँ बाप से,मिला स्वांस आभास।

जीवन जीने के लिए,गुरु से मिला प्रकाश।


जीवन जीने के लिये, पावक गगन समीर।

और वसुधा पर चाहिये, हमको थोड़ा नीर।


 कहाँ घोंसला बन सके,मानव हुआ अधीर।

गाँव शहर बस्ती बने,तब नदियों के तीर।


जबसे धरती पर घटा,पानी का आधार।

तब से बोतल में हुआ पानी का व्यापार।


इस जग में मजबूत हो,सम्बन्धों की नींव।

मन से मन मिलकर खिलें,जन मन के राजीव।


मन दर्पण में है लिखा,जीवन का कुछ सार।

शिल्प कथ्य पर है दिखा,दीपक का अधिकार।


जन जन के आराध्य हैं,अपने प्रभुवर राम।

राष्ट्र का मंदिर बने,पुरी अयोध्या धाम।


लिखते सब ही राम गुण, अर्द्ध रात्रि के वक्त।

ज्यों तुलसी जी हो गए , रत्ना के आसक्त।


हुई लेखनी राममय,बने राम के भक्त।

ज्यों तुलसी जी हो गए,रत्ना के आसक्त।


प्रात काल का है नमन, इसे करें स्वीकार।

शब्दों में लिखते रहें,सारे जग को प्यार।


कृष्ण कृष्ण जपते रहे,मिला न प्रभु का धाम

जिस दिन से राधा जपा,सहज मिले घनश्याम।


बिना बिसारे जब रहे, रसना पर इक नाम।

भवसागर से तर सकें,जपकर राधेश्याम।


मन में कृष्णा नाम हो, उर में राधा वास।

फिर जग से कैसी रहे, कैसी भी अभिलाष।


मन मयूर नर्तन करे,जपकर श्यामा श्याम।

बदन द्वारिका का हुआ,मन वृंदावन धाम।


जिव्हा पर जबसे चढ़ा, कॄष्ण राधिका नाम।

तन मन पावन हो गया,निष्कलंक निष्काम।


सुमिरन प्रभु के नाम से,शेष रही नहिं आस।

मन में पावन प्रेम है,और पैरों में रास।


कलह ईर्ष्या द्वेष से,होता है बिखराव।

खडे विपक्षी ताक में,चलने अपने दाँव।।


पिता पुत्र चाचा सभी,चलते अपने दाँव।

खड़ा विरोधी हंस रहा,सुन कागा की काँव।


पाँच साल के बाद में,करता गहरी चोट।

ताकत हमको जो मिली, वो होता है वोट।


लोकतंत्र के पर्व में,  बड़ा कीमती वोट।

किसी को सत्तासीन कर,किसी को देता चोट।


वोट हमारे से बचे,लोकतंत्र की लाज।

मुँह कु खाता कोई है,कोई करता राज।


पाँच वर्ष में एक दिन, जनता है सरताज।

पछतावा ही बस मिले, चूक गये गर आज।


वोट हमारा लिख रहा,किस किस की तक़दीर।

कोई राजा बन गया,  कोई बना फकीर।


नेताजी द्वारे खड़े,करिये खूब सवाल।

हंसकर बोलें चाहे वो,या हो जाएं लाल।


जनता से ही जीतता,अपना प्रजातंत्र।

युग परिवर्तन के लिये,वोट हमारा मंत्र।


ध्यान सदा ही रह सके,जब भी डाले वोट।

अच्छे को चुनकर करें,पाखंडी पर चोट।


वेशकीमती वोट का,हो पूरा उपयोग।

अच्छी सरकारें मिलें,करें पूर्ण सहयोग।


एक दिवस हो राष्ट्र हित,करने को मतदान।

पांच साल तक चाहिए, यदि हमको फलदान।


नया वर्ष हमसे कहे, यह नूतन सन्देश।

अपने भारतवर्ष में ,रहे राग ना द्वेष।


गीता वेद पुराण का, यही एक सन्देश।

हो समृद्धि विश्व की, सुखी रहे परिवेश।


अधरों पर फैली रहे,मधुर मधुर मुस्कान।

दुनिया में फिर हर जगह,मिले सुखों की खान।


कार्यदिवस में नौकरी, कविता को रविवार।

राह देखता आपकी,पूरा घर परिवार।


लेखन शक्ति आपको, प्रभु से मिली अपार।

फिर क्यों रचना और की, लेते रोज उधार।


अपनी रचना ही करें, पोस्ट पटल पर रोज।

साहित्यिक इस मंच पर, नूतन खिलें सरोज।


चेहरे पर खिलती रहे, मधुर मधुर मुस्कान।

तन को मिलती ऊर्जा, मन को मिलते प्राण।


तुलसी को मन में लिये, उर में बसते सूर।

मीरा सी दैनन्दिनी, फिर भी प्रभु से दूर।


मृगनयनी पढ़कर किया,नगर वधू गुणगान।

प्रियप्रवास  से दूर है ,मन की आज सुजान।


प्रमुदित मन को जब मिले, संध्या का अवसान।

तब समझो अब आ गए,निश्चेतन में प्राण।


कृत्य लिखें शालीनता,जिव्हा लिखे मिठास।

पग पूरण करते रहे,जग के सब अभिलाष।


लखि युगधर्मी भानु को,हैं बहुएं जिज्ञासु।

कोने में चुपचाप हैं,सम्प्रभुता की सासु।


उठ जाओ साथी सभी,होती मंगल भोर।

कविता की परिकल्पना ,चले क्षितिज की ओर।


 जिम्मेदारी में रहे,आजीवन ही व्यस्त।

फिर भी कहता ये रहा,हाल चाल हैं मस्त।


देव दिवाली के दिये,करें जगत उजियार।

बेबस कोने में छिपे,निशा काल अंधियार।


मन की पीड़ा हर सके,एक प्रज्ज्वलित दीप।

अंतर्मन से खीज ले,विस्वासों का सीप।


तमस निशा को चीरता, दीपक का आलोक।

झंझावाती आंधियां, रहा खड़ा था रोक।


आशाओं के दीप भी ,मन में करें प्रकाश।

नर्तन आँगन में करें,उपवन के उल्लास।


मास कार्तिक पूर्णिमा, अनुपम पर्व प्रकाश।

जग को रोशन कर रहे,खुशियों के आकाश।


संकेतों में जब मिले, खुशियों का इज़हार।

धन्यवाद लिखकर करें,चुकता सभी उधार।


खुद ही खुद से होगया, ख़ुद ही ख़ुद विस्तार।

खुद ही खुद संकल्प ये ,ख़ुद पायेगा पार।


संकल्पों ने खींच दी,लम्बी एक लकीर।

तब से दृढ़ संकल्प है,मन का अति गम्भीर।


संकल्पित मन वेग की,,दूर क्षितिज तक दृष्टि।

बढ़ते पग से नाप ली,आदर्शो की सृष्टि।


दृष्टि बसा भूगोल को,कदम लिखें इतिहास।

वसुधा पर खिलता रहे,जगती का उल्लास।


बड़े लक्ष्य ने तज दिया,मन का सब संकोच।

स्थिर दृढ़ता को नहीं ,हिला सका उत्कोच।


उदित भानु करता रहा,पावन दृढ़ संकल्प।

इसीलिए मग में मिली,बाधाएं अति अल्प।


कल्प तरु ढिंग बैठकर,आशावादी सोच।

पागल मन की हर गया,पीड़ा रूपी मोच।


मन के कोने में रखा,नहीं कोई सन्देह। 

इसीलिए जग का मिला,इच्छित ऊर्जित नेह।


ढलती सांझों ने किया,तम का नित प्रतिकार।

प्रातःभू को तब मिला,उदित भानु संसार।


जब तक मानी है नहीं,कर्तव्यों ने हार।

वसुधा रोली में सजी,खुशियां अपरम्पार।


संकल्पित मन ने छुए,प्रतिज्ञा के आकाश।


सुबह सुबह होती रहे,जय श्री कृष्णा श्याम।

सृजन धर्म का सिलसिला ,चले सदा अभिराम।


भू पर  आई अप्सरा, कर षोडस श्रृंगार।

पिय के हिय में आ गयी,वह नयनों के द्वार।


अधरा तो मधुमास है, आँखें तीर कमान।

भृमरा का मन डोलता,करने को रसपान।


पावस ऋतु की रूपसी,सागर उठी हिलोर।

चंदा मुख को लखि रहा,बैठा डाल चकोर।


बासंतिक परिधान में,देख उर्वशी चित्र।

भंग तपस्या कर रहे,मन के विस्वामित्र।


सजी धजी है राधिका,रचना भाव विभोर।

मन के आँगन में बसा, गोकुल का चितचोर।


मंगल की ले कामना,करतीं करवा चौथ।

मन के आँगन ना रहे,कहीं विरह की सौत।


लेखन अपना चाहिए, गरिमा के अनुकूल।

प्रमुदित मन हो पढ़ सके,जैसे विकसित फूल।


अपनी अक्षर साधना,लिए अमरता तत्व।

सदियों तक जीवित रहे, साधक का कृतित्व।


शब्द शब्द में बृह्म हैं,शब्द बहुत अनमोल।

कर सकते कुरुक्षेत्र भी,अपने तीखे बोल।


शब्दों से कुरुक्षेत्र है,शब्दों से वनवास।

पूरित शब्दों से हुआ,गीता का अभिलाष।


सकल विश्व में शब्द की,महिमा बड़ी अनन्त।

दुर्जन,निश्चर भी रचे,कहीं रचे अरिहंत।


ब्रह्मचारिणी देवि का,मन में करें विचार।

इच्छित वर देकर हमें,करें बहुत उपकार।


बड़ा अलौकिक मिल रहा,प्रकृती का उपहार।

किरणों ने आकर किया,वसुधा का श्रृंगार।


लेखक के हाथों सदा,कलम बड़ा हथियार।

जिसका रह सकता नहीं,कोई खाली वार।

कहीं बेटियां दाँव पर,कहीं सन्त का अंत।
धिक धिक ऐसे तंत्र को, हों अपराध अनन्त।

ब्रजमंडल में जन्म ले,बना बरेली वास।
करुणा को जीकर लिखा,कविता में मधुमास

करनी कथनी से मिला,मंचों पर परितोष।
प्रभु की कृपा से मिला,घर में है संतोष।

चेहरे पर मुस्कान है,अंदर से गम्भीर।
मन को कोमल कर रहे,हास्य व्यंग्य के तीर।

चुम्बक सा प्रभु से मिला,आकर्षक व्यक्तित्व।
सिद्ध धरा पर कर रहे,आने का असितत्व।

कली कली से फूटता,करुणा का मकरन्द।
पीकर उस मकरन्द को,मिलता बस आनन्द।

आनन्दित मन हो गया,प्रमुदित मन की कोर।
वसुधा वेसुध झूमती,देख अवतरण भोर।

हँसते गाते कट गए,अपने वरष पचास।
प्रभु से है बस कामना,काम करें कुछ खास।

धूप छाँव सी जिंदगी,सुख दुःख का संयोग।
जब तक काया ये रहे ,रखना हमें निरोग।

जन्मदिवस की कामना,आयीं मन के द्वार।
स्वीकारें सब मित्रगण, इस दिल का आभार।

पाकर के शुभकामना,होता मालामाल।
मन के कोमल हो गये, अपने यक्ष सवाल।

तन वृंदावन हो गया,दुआ मिली भरपूर।
मन आँखों में आ गए,मित्र बसे जो दूर।

अलसायी आँखे मले,व्याकुल मुर्गा भोर।
मनुज उठा फिर भी नहीं, खूब लगाया जोर।

कहीं भूत में खो गयी, ये पगलाई भोर।
पनिहारिन को ताकती, नित पनघट की डोर।

बचपन में खेले सभी कोड़ा वाले खेल।
जो पीछे मुड़ देखता उसमें देते पेल।

हँसते गाते कट गए,अपने उमर पचास।
प्रभु से है बस कामना,काम करें कुछ खास।

धूप छाँव सी जिंदगी,सुख दुःख का संयोग।
जब तक काया ये रहे ,रखना हमें निरोग

जीवन जीने के लिए ,तन मन करता काम।
उस शरीर को चाहिए, थोड़ा सा आराम।

खेती से पलते मिलें,नित्य सृजन के बीज।
सत्ता कृषक देव की,झेल सके न खीज।

शीतलता देता कभी,कभी दिखाता ताव।
उस रवि का संदेश है,बदले मनुज स्वभाव।

उठ जाओ साथी सभी, होती मंगल भोर।
कविता की परिकल्पना,चले क्षितिज की ओर।

तुलसी को मन में लिये, उर में बसते सूर।
मीरा सी दैनन्दिनी, फिर भी प्रभु से दूर।

प्रमुदित मन को जब मिले, संध्या का अवसान।
तब समझो अब आ गए,निश्चेतन में प्राण।

लखि युगधर्मी भानु को,हैं बहुएं जिज्ञासु।
कोने में चुपचाप हैं,सम्प्रभुता की सासु।

कृत्य लिखें शालीनता,जिव्हा लिखे मिठास।
पग पूरण करते रहे,जग के सब अभिलाष।

प्रमुदित मन को जब मिले, संध्या का अवसान।
तब समझो अब आ गए,निश्चेतन में प्राण।

मृगनयनी पढ़कर किया, नगरवधू गुणगान।
प्रियप्रवास से इसलिए, मन से दूर सुजान।

तुलसी को मन में लिये, उर में बसते सूर।
मीरा सी दैनन्दिनी, फिर भी प्रभु से दूर।

चेहरे पर खिलती रहे, मधुर मधुर मुस्कान।
तन को मिलती ऊर्जा, मन को मिलते प्राण।

नया वर्ष हमसे कहे, यह नूतन सन्देश।
अपने भारतवर्ष में ,रहे राग ना द्वेष।

गीता वेद पुराण का, यही एक सन्देश।
हो समृद्धि विश्व की, सुखी रहे परिवेश।

अधरों पर फैली रहे,मधुर मधुर मुस्कान।
दुनिया में फिर हर जगह,मिले सुखों की खान।

कार्यदिवस में नौकरी, कविता को रविवार।
राह देखता आपकी,पूरा घर परिवार।

लेखन शक्ति आपको, प्रभु से मिली अपार।
फिर क्यों रचना और की, लेते रोज उधार।

अपनी रचना ही करें, पोस्ट पटल पर रोज।
साहित्यिक इस मंच पर, नूतन खिलें सरोज।

कलह ईर्ष्या द्वेष से,होता है बिखराव।
खडे विपक्षी ताक में,चलने अपने दाँव।।

पिता पुत्र चाचा सभी,चलते अपने दाँव।
खड़ा विरोधी हंस रहा,सुन कागा की काँव।

पाँच साल के बाद में,करता गहरी चोट।
ताकत हमको जो मिली, वो होता है वोट।

लोकतंत्र के पर्व में,  बड़ा कीमती वोट।
किसी को सत्तासीन कर,किसी को देता चोट।

वोट हमारे से बचे,लोकतंत्र की लाज।
मुँह की खाता कोई है,कोई करता राज।

पाँच वर्ष में एक दिन, जनता है सरताज।
पछतावा ही बस मिले, चूक गये गर आज।

वोट हमारा लिख रहा,किस किस की तक़दीर।
कोई राजा बन गया,  कोई बना फकीर।

नेताजी द्वारे खड़े,करिये खूब सवाल।
हंसकर बोलें चाहे वो,या हो जाएं लाल।

जनता से ही जीतता,अपना प्रजातंत्र।
युग परिवर्तन के लिये,वोट हमारा मंत्र।

ध्यान सदा ही रह सके,जब भी डाले वोट।
अच्छे को चुनकर करें,पाखंडी पर चोट।

वेश कीमती वोट का,हो पूरा उपयोग।
अच्छी सरकारें मिलें,करें पूर्ण सहयोग।

एक दिवस हो राष्ट्र हित,करने को मतदान।
पांच साल तक चाहिए, यदि हमको फलदान।

बिना बिसारे जब रहे, रसना पर इक नाम।
भवसागर से तर सकें,जपकर राधेश्याम।

मन में कृष्णा नाम हो, उर में राधा वास।
फिर जग से कैसी रहे, कैसी भी अभिलाष।

मन मयूर नर्तन करे,जपकर श्यामा श्याम।
बदन द्वारिका का हुआ,मन वृंदावन धाम।

जिव्हा पर जबसे चढ़ा, कॄष्ण राधिका नाम।
तन मन पावन हो गया,निष्कलंक निष्काम।

सुमिरन प्रभु के नाम से,शेष रही नहिं आस।
मन में पावन प्रेम है,और पैरों में रास।

प्रात काल का है नमन, इसे करें स्वीकार।
शब्दों में लिखते रहें,सारे जग को प्यार।

कृष्ण कृष्ण जपते रहे,मिला न प्रभु का धाम
जिस दिन से राधा जपा,सहज मिले घनश्याम।

जन जन के आराध्य हैं,अपने प्रभुवर राम।
राष्ट्र का मंदिर बने,पुरी अयोध्या धाम।

लिखते सब ही राम गुण, अर्द्ध रात्रि के वक्त।
ज्यों तुलसी जी हो गए , रत्ना के आसक्त।

हुई लेखनी राममय,बने राम के भक्त।
ज्यों तुलसी जी हो गए,रत्ना के आसक्त।

इस जग में मजबूत हो,सम्बन्धों की नींव।
मन से मन मिलकर खिलें,जन मन के राजीव।

मन दर्पण में है लिखा,जीवन का कुछ सार।
शिल्प कथ्य पर है दिखा,दीपक का अधिकार।

जीवन जीने के लिये, पावक गगन समीर।
और वसुधा पर चाहिये, हमको थोड़ा नीर।

गुरु की महिमा में लिखें,कविताएं दो चार।
हमको  निश्चित ही मिले,भवसागर का पार।

जीवन में माँ बाप से,मिला स्वांस आभास।
जीवन जीने के लिए,गुरु से मिला प्रकाश।

कहाँ घोंसला बन सके,मानव हुआ अधीर।
गाँव शहर बस्ती बने,तब नदियों के तीर।

जबसे धरती पर घटा,पानी का आधार।
तब से बोतल में हुआ, पानी का व्यापार।

परमवीर चक्र

मेजर शर्मा सोमनाथ,मोर्चा था बड़ग्राम।
शहादत से पहले किया, अरि का काम तमाम।

नौशेरा में थे लड़े,स्टेनगन के साथ।
वीर पराक्रमी साहसी, नायक श्री जदुनाथ ।

हवलदार मेजर हुए, पीरू सिंह महान।
दुश्मन बंकर ध्वस्त कर,लिखा नया बलिदान।

लांसनायक करमसिंह, लिया मोर्चा जीत।
साहस से खिसका गए,वे दुश्मन की भीत।

गुरुवचन सालारिया,थे कैप्टेन जावांज
दफना चोटी पर गए, चालीस की आवाज।

बासठ वाले युद्ध में,धन सिंह थापा वीर।
मेजर से कर्नल बने,तोड़ चीन प्राचीर।

जोगिंदर सिंह वीर थे,अपने  सूबेदार।
चीनी फौजों को छका, किया वार पर वार।

सन बासठ के युद्ध में,मेजर सिंह शैतान।
रेजांग ला का मोर्चा, हुए जहाँ कुर्बान।

साहस के पर्याय थे, अब्दुल वीर हमीद।
पाकिस्तानी टैंक की ध्वस्त करी उम्मीद।

आर्देशवीर पुरजोर जी,तारापोरे वीर।
पाकिस्तानी टैंक भी, साठ दिए थे चीर।

एल्बर्ट एक्का साहसी,लांसनायक जावांज।
लड़े इकहत्तर युद्ध में,दवा शत्रु आवाज।

फ्लाइंग ऑफिसर रहे, ये सिंह निर्मल जीत।
अरि सेंवर जेट दो,ध्वस्त दुश्मनी भीत।

लेफ्टिनेंट सेकेंड थे,अरुण वीर खेत्रपाल।
तोड़े दुश्मन टैंक को,साहस दिखा कमाल।

जाट रेजीमेंट के,मेजर सिंह होशियार।
पैंसठ इकहत्तर जीत ,किया शत्रु बेकार।

सियाचिन मोर्चे पर लड़े,सिंह बाना सरदार।
पोस्ट उन्ही के नाम पर,थे उसके हकदार।

शांति सेना के लिए,रामास्वामी वीर।
तमिल टाइगर के दिये छः आतंकी चीर।

ख़लूबार को कर फतह, भर सेना में ओज।
दिला जीत होते अमर,कैप्टन श्री मनोज।

विक्रम बत्रा वीर को,कहें कारगिल शेर।
हम्प व रावी नाव में किया शत्रु को ढेर।

आटोमेटिक गन लिए,संजय रहे दहाड़।
दुश्मन भागे छोड़कर, हिंदुस्तानी पहाड़।

तीन चौकियां जीतकर,टाइगर हिल के पास।
योगेंदर जी ने था लिखा,एक नया इतिहास।
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जीवन पथ पर है मिला,प्रभु का नित आशीष।
धूप छाँव में हो गये   , अपने  वर्ष उनतीस।

जग में ऊंचा ही रहे,अपना हिंदुस्तान।
जिसकी रक्षा के लिये,गंवा रहे हैं प्राण।

आज शहादत लिख चली याद करेगा देश
जिंदा परिपाटी रहे,त्याग और बलिदान।

विरह व्यथा को कह रहा, आँखों छलका नीर।
इसी  नीर  के  साथ  में ,  बह  जाती  है पीर ।

बेर केर का कब निभा,बहुत दिनों तक खेल।
किला रेत सा ढह गया , जिसे रहे थे झेल।

काव्य कलश में हैं छिपे, नित नूतन सोपान।
उपमानों में कल्पना,ऊँची भरे उड़ान।

जीवन भर मिलती रही,कहीं धूप अरु छाँव।
उस पथ  पर  बढ़ते  रहे, हम दोनों के पाँव।


हनुमत कथा

निसन्तान दशरथ हुए, पुरी अयोध्या धाम ।

तीन रानियों से चला, नहीं वंश का नाम।


पूजन वन्दन सब किया, पूजे सन्त समाज।

अग्निदेव पूरण करें, सबके बिगड़े काज।


घोर तपस्या से किया , अग्निदेव का यज्ञ।

मन्त्रों को खुद बोलते, जैसे कोई विज्ञ।


अग्निदेव खुश हो दिया, 'तस्मै' का एक पात्र।

इच्छित फल रानी मिले, खाएं इसको मात्र।


कौशल्या कैकई चखा ,सँग सुमित्रा स्वाद।

पल में सब के कट गए,जीवन के अवसाद।


पंख पसारे उड़  रही, नभ में कोई चील।

खीर पात्र को देखकर, उडने में दी ढील।


बिनु विलंब के ले गयी, नभ में खीर उड़ाय।

यही सोच मन में लिए ,आज पेट भर जाय।


ठिठकी लखिकर आश्रम, करने को विश्राम।

जहाँ अंजना माई का,चले भजन  अभिराम।


नभ में उड़ती चील को, रही अंजना देख।

गिरा चील के पात्र से, वहीं खीर की रेख।


मुख अंजना के गिरी, आकर के कुछ खीर।

खीर उदर  जाकर   लगी, माता हुई अधीर।


उदर अंजना के गयी, अग्निदेव की खीर।

आराधन शिव का हरे,सदा उदर की पीर।


चैत्र मास तिथि पूर्णिमा, शुक्ल पक्ष का योग।

मंगल था पावन दिवस,जननी का सुख भोग।


मात अंजना ने जने ,  हनुमान से   वीर।

आजीवन सेवक रहे,जिनके प्रभु रघुवीर।


तन जनेऊ से हुआ, पावन  परम    पुनीत।

जन्मजात जिसको मिला, राम नाम संगीत।


पिता केसरी के हुए , पुत्र   बहुत  बलवान।

पवनपुत्र निशिदिन भजें,प्रेम सहित श्रीमान।


शिव के ग्यारेवें हुए ,    ये  हैं  रुद्र   अवतार।

जिनका सुमिरन कर सके,हम सबका उद्धार।


मिला जगत में सात को ,सदा रहे असितत्व।

इनमें इक हनुमान   हैं, जो  पाये    अमरत्व।


 विध्वंसक  हैं पाप  के, और  बांटते नेह।

बजरंगी कहते इन्हें,क्योंकि बज्र सी देह ।


स्वर्ण मुकुट सिर पर रखे,तन पर मात्र लँगोट।

हाथ गदा एक अस्त्र है, कवच पूँछ की ओट।


माता  सीता से लिया  ,  सिन्दूर का ज्ञान।

पोता पूर्ण शरीर पर ,करने प्रभु कल्याण।


ऐसे हनुमत  वीर को, जो करता है याद।

जीवन में  निर्भय बने, और रहे आबाद।


*करवाचौथ कथा*

एक  नगर में सेठ के, बेटे थे कुल सात।

इकलौती बेटी मिली, बहुत बड़ी सौगात।


सातों भाई बहिन से,करते अतुलित प्यार।

उसकी चिंता में रहें, घड़ी घड़ी तैयार।


उत्सव करवा चौथ का,घर भर में उल्लास।

माता भाभी संग में, बेटी का  व्रत खास।


खाना खाने  सायं को,  बैठे भाई सात।

तभी बहिन का ख्यालकर,जाग उठे जज्बात।


भूखी  बहिना देखकर  ,खाने का अनुरोध।

किंतु बहिन के धर्म का ,था थोड़ा सा बोध।


बिन बहिना के था नहीं,भोजन भी स्वीकार।

इसी लिये वे खोजने, चले एक उपचार।


छोटे भाई का सदा,चलता तेज दिमाग।

पूरी करने योजना , लेता  हाथ चिराग।


जलता दीपक रख दिया,किसी वृक्ष की ओट।

यद्यपि मन में थी नहीं, कहीं किसी के खोट।


दीपक छलनी ओट में, लगे चाँद साक्षात।

आकर बहिना से कहें समझाकर यह बात।


अर्घ्य चढ़ाने को हुई, जब बहिना तैयार।

कहे भाभियों से ननद, आओ जल्दी द्वार।


तब भाभी ने दी बता , भइयों की करतूत।

चाँद निकलने का यहाँ, दिखता नहीं सबूत।


भोली बहिना ने किया , भइयों  का विश्वास।

अर्घ्य चढ़ाकर खुश दिखी,उत्सव बनता खास।


अर्घ्य चढ़ाकर ज्यों लिया, एक निवाला खाय।

अपसकुन के प्रभाव से,छींक छींक अकुलाय।


अन्य निवाले का असर,गया कंठ में बाल।

तभी तीसरे कौर से, आया पति का काल।


रो रो कर के हो गया, उसका खस्ता  हाल।

बता भाभियाँ सच रहीं, क्यों आया यह काल।


भ्रात प्रेम में हो गया,व्रत का गलत विधान।

कुपित देवता ने लिए, तेरे पति के प्राण।


अब करवा ने ले लिया, निर्णय बड़ा कठोर।

पति के जीवनदान को,लगना पूरा जोर।


एक वर्ष तक ना किया,तब अंतिम  संस्कार।

सभी चतुर्थी व्रत  रही, करने पति उद्धार।


पति के शव पर थी उगी,एक साल तक घास।

 घोर आपदा भी नहीं, डिगा सकी विश्वास।


कार्तिक कृष्ण चौथ को , होता पूरा साल।

विधि विधान से वृत किया,नहीं हुई बेहाल।


उसके तप से खुश हुए, करवा और गणेश।

उसके पति को दे दिया,आशिष बड़ा विशेष।


पति को जीवित देखकर, प्रकट किया आभार।

कठिन तपस्या से मिला, उसको वापिस प्यार।


उसी दिवस से आज तक,मनता है यह पर्व।

सौ वर्षों तक पति जिये, जो है उसका गर्व।


महिला के सौभाग्य का,कितना पावन  कथ्य।

शब्दों में आबद्ध कर , राजीव चले  नेपथ्य।


माँ गंगा

मिलन हिमालय का हुआ, मैना से इक बार।
दो   कन्या गंगा  -उमा,   जन्मी उनके द्वार।

गंगा पावन  रूप थी, पहुँच गयीं  सुरलोक।
उमा तपस्या शिव मिले,सुधर गया इहलोक।

पुरी अयोध्या राज्य में,नहीं सगर सन्तान।
वंशज पाने के लिये ,त्याग तपस्या ध्यान।

नृपति सगर को मिल गया,भृगुऋषि का वरदान।
दोनों   रानी   से उन्हें,    मिलें   खूब  सन्तान।

पहली रानी  से  हुए , असमंजस  महाराज।
साठ हजार दूजी जने,सफल हुए सब काज।

असमंजस महाराज के,तेजस्वी अशुमान।
अश्वमेघ की घोषणा, चमक उठे दिनमान।

बात पची न इंद्र को, घोड़ा  लिया चुराय।
उसकी रक्षा के लिये,सगर पुत्र भिजवाय।

षट सहस्र थे महावली ,पहुँच गये पाताल।
कपिल मुनि का आश्रम,पूरा दिया खंगाल।

अश्व बंधा पाया वहीं, जहाँ ऋषी ध्यानस्थ।
क्रोधित   उत्पाती हुए,  महावली मदमस्त।

यज्ञ विघ्न से बढ़ गया,कपिल मुनि का ताप।
भस्म ज्वाला मय  हुआ ,साठ हजार का पाप।

चाचाओं की खोज में,निकल पड़े अशुमान।
पाया केवल भस्म को ,समझ गये  श्रीमान।

उनके तर्पण  के लिये ,मामाजी  का ध्यान।
केवल सुरसरि ही करे, गरुण दिया ये ज्ञान।

अंशुमान महाराज ने,किया त्याग घनघोर।
किन्तु सफल ना हो सके, चर्चाएं  चहुँ ओर।

भगीरथ पुत्र दिलीप ने, लेकर दृढ़ संकल्प।
ब्रह्मलोक को चल दिये ,करने कायाकल्प।

ब्रह्माजी को खुश किया, शिवजी लिए मनाय।
गङ्गा जी को सुख मिला, शीश जटा पर आय।

विन्दुसार से चल पड़ी ,धाराएं भी सात।
संग भगीरथ सातवीं,  जो थी गंगा मात।

ऋषि जुन्ह के आश्रम , यज्ञ हुआ व्यवधान।
क्रोधित ऋषि ने पी लिया, गंगा का सम्मान।

ऋषिमुनि सब विस्मित हुए,है स्तुति एक उपाय।
मुदित  ऋषि वर कर्ण   से, गंगा  जी  प्रकटाय।

बेटी ऋषिवर जुन्ह की,नया मिला एक नाम।
उसी  जान्हवी को  सभी ,पूजै  जैसे  धाम।

पुनः निकलकर चल पडीं, भागीरथ के संग।
सगर पुत्र तर्पित  हुए, मुदित लोक के  अंग।

गंगोत्री  से कर  शुरू, सुरसरि  का  वृत्तांत।
गंगासागर तक कलम,लिखकर होती शांत।

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*गमछा महिमा*

कोरोना के काल में,है गमछा हथियार।
करता संकट काल में,भव सागर से पार।

गर्मी  सर्दी ताप से,सदा बचाता यार।
मुँह को कसकर बाँधिये,घूमो नहीं उघार।

गमछा में गुण बहुत है,सदा राखिए संग।
कोरोना की कर सके,ये मर्यादा भंग।

प्रात काल से शाम तक,हो इसका उपयोग।
तन मन को आराम दे,और भगाये रोग।

इस जग में ना दूसरा,इतना सुन्दर मास्क।
इसे पहनकर हो सुगम,जीवन का हर टास्क।

गमछा से होने लगे,जग में लोग महान।
इसे पहनकर शौक से, दिखा रहें हैं शान।

गमछा को अपना रहा ,अपना पूरा देश।
संस्कृति की रक्षा करें,मिटा जगत के क्लेश।

गमछा को अब मिल गया,मोदी जैसा ब्राण्ड।
जिसकी पावर है बहुत, बचे सकल ब्रह्मांड।

मानवता को है बड़ा, गमछा पर अभिमान।
आज व्यवस्था से लड़े, और बचाये प्राण।

बड़े पुराने काल  से , है गमछा परिधान।
इसे पहनकर बच सके,अपना हिन्दुस्तान।


मजदूर की व्यथा

सन्नाटे को  चीरकर , चलने को मजबूर।
सड़कों पर थैला लिए,चलता है मजदूर।

जीवन जीने की जुगत, करली है भरपूर।
मंजिल फिर भी दीखती आसमान से दूर।

जिन हाथों से थे बने,सिंहासन और ताज।
दो रोटी को हो गये , वो देखो मोहताज।

लिये विवशता भाव को,निकले अपने गाँव।
मंजिल से  पहले थके,  छाले वाले पाँव।

दया भाव भी जग सके,अपने मन के गाँव।
मरहम थोड़ी लग सके, फ़टी विबाई पाँव।

अभिलाषा मन में लिए,निकल पड़े हैं ठाँव।
मीलों की गिनती करें, घायल नंगे  पाँव।

आशाओं का के लिया, कंधों पर सामान।
भरी दुपहरी तोडती, सब उनके अरमान।

जैसे भी हो हम करें, कुछ सेवा सम्मान।
मजदूरों के रूप में ,आये हैं भगवान।

उस रज कण को पूजिये, जैसे तीर्थ स्थान।
जहाँ जहाँ पद से बन गए,अद्भुत अमिट निशान।

आशाओं का के लिया, कंधों पर सामान।
भरी दुपहरी तोडती, सब उनके अरमान।
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सेवा श्रद्धा ज्ञान में , था आगे बंगाल।
आज चुनावी दंश ने, बना दिया कंगाल।

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मातृ दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं

माँ को शब्दों में लिखूँ, ऐसी कहाँ औकात।
शब्दों पर भारी पड़े,आँसू के जज़्बात।

रौद्र रूप में भी रही, माँ की ममता  साथ।
आज तलक भी याद है,लोरी वाला हाथ।

लाख टके से कीमती,होता आशिर्वाद।
माँ की ममता का नहीं,हो सकता अनुवाद।

अपनी सन्तति के लिये,भूली निज पहचान।
आँसू अंदर पी लिए, चेहरे पर मुस्कान।

रौद्र रूप में भी रही, माँ की ममता  साथ।
आज तलक भी याद है,लोरी वाला हाथ।

माँ को शब्दों में लिखूँ, ऐसी कहाँ औकात।
कलम सदा ही रोकते,आँसू के जज़्बात।

लाख टके से कीमती,होता आशिर्वाद।
माँ की ममता का नहीं,हो सकता अनुवाद।

अपनी सन्तति के लिये,भूली निज पहचान।
आँसू अंदर पी लिए, चेहरे पर मुस्कान।

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चला चीन से वायरस,धरे रूप विकराल।
राक्षस जैसी वृत्ति का,है कोरोना काल।

कोरोना से कब बचा,कोई राजा रंक।
इसके सम्मुख जो गया, मिला विषैला डंक।

एक मुखौटा मुख लगा, हों प्रच्छालित हाथ।
चौखट के अन्दर रहें, बस अपनों के साथ।

भीड़ भाड़ के क्षेत्र में, नहीं करें  प्रस्थान।
सामाजिक दूरी बनी, जीवन की वरदान।

किसी बाहरी वस्तु को, मत करना प्रयोग।
जीवन से भी मिट सके,बहुत बड़ा दुर्योग।

अपलक रहे निहारते, मदिरालय का धाम।
भक्त व्यथा को देखकर,मौन खड़ा है जाम।

मदिरालय तक दौड़ते, पूरा करने ख्वाब।
लाठी पर भारी पड़ी, पौआ एक शराब।


महाभारत


वृद्ध सिंह को देखकर,गीदड़ बदलें सोच,
सूर्यप्रभा को दे रहे,किरणों का उत्कोच।

कम्पन में पाये गये, प्रतिज्ञा के भी  पाँव।
निष्ठा पर भारी पड़ा,शकुनी का हर दाँव।

चौसर पर जबसे लगा,नारी का व्यक्तित्व।
खतरे में ही आ गया, लज्जा का अस्तित्व।

सिंघासन पर हो गयी,आकांक्षा  आरूढ़।
उसे बचा भी ना सका,विदुर ज्ञान भी गूढ़।

हठधर्मी ने लिख दिया,भीषणरण कुरुक्षेत्र।
अंधे देखें झांककर, संजय के ही  नेत्र।

सौंगन्धो के वश हुए,कहीं शिखा अरु केश।
युग की जंघा तोड़कर, बदल दिये परिवेश।
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उर पर प्रभुवर राम का,आजीवन अधिकार।
हनुमत से है प्रार्थना, दें मन में संचार।

प्रभु ने सबकी थाम ली ,मजबूती से डोर।
वो ही करते नित्य हैं , मंगलकारी भोर।

आज  शाम  को नौ  बजे, अपनी चौखट धाम।
करें प्रज्ज्वलित हम सभी,दिया देश के नाम।


*आक्रोश के दोहे*

मरकज तब्लीगी किया,देशद्रोह का काम।
दोज़ख में निश्चित मिलें, कौमें नमक हराम।

धर्म कर्म की आड़ में, षड्यंत्रों का  कार्य।
फाँसी वाला दण्ड ही, हो इनको अनिवार्य।

कुछ कठमुल्ले मौलवी,निकलें हैं गद्दार।
इनको ऐसे मारिये,जैसे मौत शियार।

खुदा मिलाने के  लिए, जो करते   गुमराह।
उनके सिर भी हो कलम,निकल न पायेआह।

तालीमों के नाम पर, कट्टरता की सीख।
या वो आतंकी बने ,या मांगे फिर भीख।

कोरोना फैला गयी, इनकी ये करतूत।
चौराहे पर  टांगिये, माँगे बिना सुबूत।

ठेंगे पर  जिसने रखे ,सरकारी आदेश।
गोली सीधे मारिये,  प्राण बचें ना शेष।

अनपढ़ ज़ाहिल का नहीं,कोई धर्म या दीन।
ऐसे कट्टर  पंथ से ,  मज़हब की   तौहीन।

आयत कहते हैं किसे,कहते किसे कुरान।
ये देखो अब  ले रहे,  निर्दोषों  के प्राण।

टोपी वाले मौलवी,कलियुग के जल्लाद।
सपने  जन्नत के दिखा, कौमें की बर्बाद।

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नव सृजन कर अनवरत,करें लेखनी धन्य।
सुखद भाव अविरल अमर,होते हैं अनुमन्य।

होली के रंग से खिले,अधरों पर मुस्कान।
मन को मीठा कर सकें, ऐसे हों पकवान।

इस होली पर ना रहे  , कोई  सूना  गाल।
प्रेम सहित मलते रहें,चुटकी एक गुलाल।

दुश्मन के हर कृत्य को,कदम उठेंगे ठोस।
ठोस कदम इतने हुऐ ,. उठने  में  बेहोश।

खतरे में दिखने लगा,पोलटिक्स का खेल।
इसी लिए अब हो रहा,सांप नेवला मेल।

चोर उचक्कों ने किया,बेमौसम गठजोड़।
उन सब में कैसी लगी,पीअम पद की होड़।

तिरंगे पर भी लग रहा , भगवा जैसा टैग।
फिर क्या हम फहराएंगे, भाग चलो ले बैग।

राजनीति का हो गया ,कितना गन्दा खेल।
सूक्ति बदलने पर तुला,साँप नेवला मेल।

कायर हमला ले गया,सैनिक  दर्जन चार ।
और शहादत मांगती,हमला हो उस पार।

त्याग तपस्या प्रेम अरु, है ममता की खान।
सृष्टि रचयिता नारि का, हो जग में सम्मान।

गली मोहल्ले शहर की , छान रहे है धूल।

लू चलती दोपहर में, मत करना व्यवधान।
विस्तर पर आराम है ,बिना चादरा तान।

गृहमंत्री इस फोन पर, लगा रहीं प्रतिबन्ध।
फिर भी चोरी से कहें, शब्दों के अनुबन्ध।

डाल डाल पाती जपे, राधे कृष्णा नाम।
प्रेम सिंधु में  डूबने ,चल वृन्दावन धाम।

सेवा श्रद्धा ज्ञान में , था आगे बंगाल।
आज चुनावी दंश ने, बना दिया कंगाल।

मोदी जी को ला रहे,  अब तो एक्ज़िट पोल।
दुश्मन सारे मौन हैं ,देख शाह का ढोल।

नारों में छाया रहा,अपना चौकीदार।
इसीलिये ये आंकड़ा,गया तीन सौ पार।

छप्पन से ज्यादाहुआ, सीनेका आकार।
विश्व गुरु का स्वप्न भी, लगता अब साकार।

नेता नहीं विपक्ष का,ऐसा दूजी बार।
बाँहे समेटे कर रहे , शेरों से तकरार।

मोदी युग में ना रहा,कहीं ठिकाना ठौर।
इसीलिएअब चल रहा,इस्तीफों का दौर।

दो चरणों के बाद भी,दिखता नहीं उपाय।
ब्रह्म अस्त्र ना दे रहा,राहुल जी को 'न्याय'।

कागा स्वर में आ गयी,कोकिल सी आवाज़।
मौसम भी डरने लगा, कहाँ गिरेगी  गाज़।

कांगरेस में चल रहा, इस्तीफों का दौर।
वे सब मिलकर ढूंढते,नया ठिकाना ठौर।

जीत हार भी दे रहा, निश्चित कुछ सन्देश।
कोरे भाषण से कभी, नहीं चला है देश।

प्राची से अरुणिम प्रभा,दमके वसुधा भाल।
कलरव से  गुंजित हुई,तरुओं की हर डाल।

कृषक के सम्मान में,अब सबका है ध्यान।
उनके हित में आ रहे,नित नूतन सोपान।

तपन  सूर्य में  बन्द है , कोयल का भी राग।
नवल रश्मियां भी अभी,उगल रहीं हैं आग।

मित्रों में चलता नहीं, भला बुरा कुछ यार।
आपस मे बढ़ता रहे, भाईचारा प्यार।

मैनपुरी से आगरा ,बीच फिरोजाबाद।
वहां से भी आगे चले, मिले गाजियाबाद।

सप्त स्वरों में गा रहा,प्राची से दिनमान।
विहगों के अधरों  खिली, मधुर मधुर मुस्कान।

हम सबकी अब हो गयी,लगभग उमर पचास।
शब्दों में गरिमा रहे, मतलब हो कुछ खास।

दिन भर काफी व्यस्त है, बना बनाकर ताज।
लोकतंत्र में आगरा ,बना रहे सरताज।

कुछ पर राधे प्रेम का, सिर पर चढ़ा बुखार।
और लखनवी मित्र को,शैम्पेन से प्यार।

मित्रों की ये मंडली ,मिली दिनों के बाद।
खुशियों से होता रहे,पटल सदा आबाद।

जीवन मे मानो नही, कभी किसी से हार।
उंगली दबी निकालिये, चाहें डाँट, पुचकार।

नियमित जीवन में करें,घण्टे भर का योग।
तन मन को सुख शांती , कटते जड़ से रोग।

ईसा राम रहीम हों, चाहे नानक नाम।
योगासन में साथ हो,थोड़ा  प्राणायाम।

उगते सूरज का करें ,प्रातः स्वागत रोज।
इस शरीर में रोग को,नहीं पाओगे खोज।

सूर्योदय से शाम तक, रहे ताजगी शेष।
घण्टे भर के योग से, ऊर्जा करें निवेश।

ऋषि पतञ्जलि ने दिया, ये अनुपम वरदान।
डंका बजता विश्व में,चमक रहा दिनमान।

योगासन में मिल रहा,बहुत मान सम्मान।
कुछ तो सेवा में लगे,कुछ की चली दुकान।

ईश्वर ने सबको दिए,अलग अलग ही रूप।
कहीं कटोरा हाथ मे,  कहीं  बनाता भूप।

सिर पर आ गया,अपने गुरु का हाथ।
उसको जीवन में सदा,मिलता प्रभु का साथ।

गुरुवर के आशीष से, होते पूरण काम।
उनके पावन चरण में,सारे तीरथ धाम।

दोहे मात्रा में लिखें, लिखें वर्ण में छ्न्द।
गज़लें बहरें माँगती,गीत माँगता बन्ध।

कंकरीट  के शहर  में, धन के पीछे पाँव।
हम तो विकसित हो गये,छूट गया है गाँव।

लिया उधारी में बड़ा, मंजिल ऊपर ठाँव।
उसे चुकाने में  गया, जीवन का हर दाँव।

पहले झप्पी प्यार की, फिर मारें वे आँख।
भारत  में फैला रहे , इटली वाली पाँख।

पेड़ लगेंगे शहर में,  अबकी कई हजार।
दूषित साँसों को मिले,जीवनका आधार।

सिद्धि हो संकल्प की,दिखें सड़क पर पेड़।
फाइल में दम तोड़ती,लगे पेड़  की मेड़।

कोशिश सबकी चाहिये,सूख न  पायें पेड़।
मिलकर सब चिंता करें,बचपन वृद्ध अधेड़।

पेड़ लगाने   के  लिये , अधिकारी  तैयार।
फाइल लेकर दौड़ती,तेज सड़क पर कार।

पटल सुबह ही हो गया,जैसे पावन धाम।
कलम हमारी ने लिखा,कृष्णा जी के नाम।

बहिनों की राखी बँधे, अब सैनिक के हाथ।
आजीवन मिलता रहे,उनका हमको साथ।

मथुरा की आराधना,गोकुल जैसा ठाँव।
वृंदावन में रास कर,जमे द्वारिका पाँव।

अभिलाषा ह्रदय बसी,अपने मन के ठाँव।
आँखें व्याकुल खोजती,कृष्ण लला के पाँव।

कृष्ण राधिका रास हो,अपने मन के गाँव,
बजे प्रेम की बांसुरी,घनी कदम्बन छाँव।

हम सबकी आराधना,कृष्ण लला के पाँव।
कोकिल सी धुन पा सके,कौओं की भी काँव।

सुबह शाम देखो यहाँ, मनुज रहा है भाग।
इसी जुगत में है लगा, बुझे पेट की आग।

रोजी रोटी के लिये, है सडकों पर भीड़।
साथ लिये संकल्प को, हो छोटा सा नीड।

चौराहे की बत्तियाँ, प्रतिपल दें संकेत।
जो इसको ना मानता,रहता है वो खेत।

आँख बचाकर भागते,बड़े फितरती लोग।
दुर्घटना से सामना, जीवन भर का रोग।

आज बड़े ही सिरफिरे, तोड़ रहे कानून।
बनें मुसीबत और को, बनते अफलातून।

परिवर्तन के दौर में, चढ़ा सेलफी क्रेज।
सिर पर भूत सवार है,चाहे कोई भी ऐज।

एक सेलफी के लिये,सड़कें पटरी जाम।
नया चला इस्टन्ट ये,करता काम तमाम।

जिसने जीवन में किया,शिक्षक का सम्मान।
उसके स्वागत में खड़ा,अम्बर में दिनमान।

अक्षर अक्षर ब्रह्म है,सदा अमरता प्राप्त।
वसुधा से ब्रह्मांड तक,इसकी शक्ति व्याप्त।

जनता कर्फ्यू के दिवस,घर पर रहिये मित्र।
देखो सबके  साथ  में, टी वी पर चलचित्र।

घण्टा थाली शंख को, नहीं जाइये भूल।
कोरोना तो आज ही ,चाट सकेगा धूल।

हो सकती अंताक्षरी,अरु लूडो का खेल।
देखो कैसे फिर  बढ़े,  प्रेम तने की बेल।

मिलकर काम  बटाइये, अर्धांगिन  के संग।
कटना निश्चित मानिए,ग्रह कलेश की जंग।

बच्चों  से  मस्ती करें , खूब  खिलाएं खेल।
उनको पिकनिक ये लगे,ना समझे वे जेल।

पीअम के आव्हान का,सफल करें अभियान।
जग की सरिता में  चले, जीवन का जलयान।

तपोभूमि ऋषि मयन की,मार्कण्ड का धाम।
मात शीतला को जपे,मैनपुरी अभिराम।

घर में बैठे अरु लिखें,कविताएं दो चार।
समय कटेगा प्यार से,बचे सकल संसार।

बिना सुगर के ही पिये, हम कितनी भी चाय।
कविता में देते   रहें ,मीठी - मीठी राय।

सुबह शाम योगा करें,दिन में देखें न्यूज।
बेमतलब की बात में,ना होवें कन्फ्यूज।

हम बिल्कुल भी ना  छुएं, ताला कुंडी द्वार।
धोखे से यदि छू गए , धुलें  हाथ हर बार।

इज्जत की अब बात है,बचे आँख मुँह नाक।
देव स्वरूपा मानकर,  इनको  रखना पाक।

जीवन भर पिसते रहे ,  करते- करते काम।
मुश्किल से है अब मिला,इक्कीस दिन विश्राम।

कठिन दिनों में हम करें,सृजन भरे कुछ काम।
जो सदियों तक दे सके  ,जग में अपना नाम।

नव दुर्गा में हो सकें ,सेवा के  कुछ काम।
मानो संगम में उतर, कर लिए चारों धाम।

घर मानें हिम कन्दरा  ,जहाँ  लगालें ध्यान।
मिली ऊर्जित शक्ति से,तोड़ें रिपु अभिमान।

कर एकान्तिक साधना ,  होकर  सबसे   दूर।
फिर खुलकर जीवन  जियें, खुशियों से भरपूर।

बाहर   जाने की  नहीं ,चले  भ्रात तरकीब।
घर के आँगन में जियें,खिलकर ज्यों राजीव।

कोशिश मन से कीजिये, नैया होगी पार।
मनोयोग से मिल सके,संकट पर अधिकार।

अमरीका ईरान में,शुरू अघोषित जंग।
लहू किसी का भी बहे,सदा एक सा रंग।

लगता है अब विश्व में, शुरू तीसरा युद्ध।
भारत की हो भूमिका, बने महात्मा बुद्ध।


माघ पूर्णिमा का दिवस,जन्में श्री रविदास।
सन्त शिरोमणि कर्म से,रखते दृढ़ विश्वास।

फागुन महीने से हमें, है अनुपम अनुराग।
तन  खिलता है रंग से,मन गाता है फाग।


बीच भँवर जब भी फँसा,अगर कहीं जलयान।
कंठ गरल धारण किया,लगा शम्भु ने ध्यान।

दैत्य दानवी चाल का,जिसे पूर्व में ज्ञान।
हमें सुधा वितरित किया,करके खुद विषपान।

बड़े  प्रेम से भेजता, चुटकी एक गुलाल।
मन की इच्छा है यही, ना हो सूना भाल।


रंगों से मस्ती  मिले, भीगे तन  उल्लास।
मन के आंगन में बने,खुशियों के आवास।

पूड़ी से गुजिया तलक,विविध बने पकवान।
भोग लगा कर प्रेम  से, जेमे हम श्रीमान।

प्रभु से करते कामना,खुशियां मिले अपार।
मस्ती को गाता मिले,होली का त्यौहार।

इस नफरत की आग में,गईं अनेकों जान।
खूनी होली खेलता,दंगे में इंसान।

चलते चलते लिख दिया,रिश्तों का एहसास।
अपनों से मिलता सदा,पतझर में मधुमास।

स्वच्छ चाँदनी में रखी,शरद रात्रि में खीर।
खाकर प्रातः काल में, बदले हम तकदीर।

राजनीत का खेल भी , बड़ा ही अपरम्पार।
कहीं कहीं मातम मिला, कहीं कहीं त्यौहार।

देवेंदर के  साथ  में, आये अजित पवार।
और देखते रह  गए, चाचा  जी सरदार।

घोर विरोधी से मिला,हुआ नया इक पाप।
गहरे सागर ले गया,शिवजी का अभिशाप।

चतुर खिलाड़ी हैं बड़े, श्रीमन शरद पवार।
कांगरेस के  साथ  में, दी  शिवसेना मार।

बीत रहा है आज से, दो हजार उन्नीस।
देना प्रभु जी बीस में,खुशी हमें इक्कीस।।

पुण्य धरा को है नमन,जन्मे भगत,सुभाष।
शेखर विस्मिल लिख गए,फौलादी एहसास।

क्रांति सदा लिखती रही, उत्सव के निष्कर्ष।
इसीलिए ये स्वर्ग है,अपना भारत वर्ष।

जब तक सीमा पर खड़े,अपने वीर जवान।
तभी तलक हम सो रहे,यहाँ चादरा तान।

लिए तिरंगा दे रहे,जो अपने निज प्राण।
न्यौछावर उन पर सदा,गीता वेद पुराण।

वीरों से लिखती रही ,क्रांति मंत्र की बात।
तभी हमें ये दे सके,आजादी सौगात।

बाट जोहता ही रहा, सत्तर वर्षीय तंत्र।
अब पीओके माँगता, अब अपना गणतंत्र।

तीन सौ सत्तर हट सकी, सत्तर सालों बाद।
अब लगता हो जायेगा, पी ओ के आजाद।

जब अधरों पर चढ़ गया,सहज राष्ट्रीय गीत।
तब सैंतालीस लिख गया,क्रांति मंत्र की जीत।

सभी मनुज मिलकर लड़े, आजादी की जंग।
अब नफरत भी आ गयी,जब चढ़ा सियासी रंग।

तीन रंगों में है लिखा,शांति सम्रद्धि अरु त्याग।
अपने दिल में भी रहे,इसके प्रति अनुराग।

वेग थामने के लिये,कुहरा कसे लगाम।
सूरज करता दिख रहा, यौगिक प्राणायाम।

अमरीका ईरान में,शुरू अघोषित जंग।
लहू किसी का भी बहे,सदा एक सा रंग।

लगता है अब विश्व में, शुरू तीसरा युद्ध।
भारत की हो भूमिका, बने महात्मा बुद्ध।

कंकरीट  के शहर  में, धन के पीछे पाँव।
हम तो विकसित हो गये,छूट गया है गाँव।

लिया उधारी में बड़ा, मंजिल ऊपर ठाँव।
उसे चुकाने में  गया, जीवन का हर दाँव।

जिसने जीवन में किया,शिक्षक का सम्मान।
उसके स्वागत में खड़ा,अम्बर में दिनमान।


दीपावली के पंच दिवसों की महत्ता


हो त्रियोदश कार्तिक, कृष्ण पक्ष का योग।
धनवन्तरि का प्राकट्य, स्वस्थ रहें सब लोग।

धनतेरस के दिवस पर,खूब सजे बाजार।
क्रय करने कुछ वस्तुएं, लगा रहे रफ्तार।


कृष्ण चतुर्दश को लिये,नरकासुर के प्राण।
राक्षस योनि से बचा,कृष्ण किया कल्याण।

काली चौदश के दिवस,एक जलाते दीप।
विनती है यमराज से, ना हो काल समीप।


घोर अमावस के दिवस,पुनःअयोध्या धाम।
घर के दीपक बोलते, स्वागत जय श्री राम।

लक्ष्मी जी को पूजते,खील बताशा भोग।
हो घर में धन सम्पदा,निकट न आते रोग।

गली गली में हो रहा , घोर पटाखा शोर।
थल से नभ तक छा गया,प्रदूषण घनघोर।

फुलझड़ियों को देखकर,रॉकेट भरें छलांग।
बम तो ऐसे फट रहा , जैसे पी ली  भाँग।


छोटी उंगली पर उठा,गोवर्धन महाराज।
मान मिलाया धूल में,हिला इन्द्र का ताज।

छप्पन भोगों पर हुआ,अन्नकूट को गर्व।
गोवर्धन को  पूजकर, मना रहे  ये  पर्व।


यमुना ने यमराज का ,खूब  किया सत्कार।
यमद्वितीया के पर्व पर,भाई बहन का प्यार।

पूजन कर यमराज का, करते यमुना स्नान।
नरकलोक से मुक्ति हो,कहता पदम पुराण।

जीवन में प्रतिदिन मिले,मंगलकारी भोर।।
प्रेम और बन्धुत्व की,खुले कभी ना डोर।।






केदारनाथ ज्योतिर्लिंग


द्वादश ज्योतिर्लिंग में,है पावन इक धाम।

राज्य उत्तराखंड में,बम भोले का नाम।।


जनपद रुद्रप्रयाग में,शिवलिंग अति प्राचीन।

केदारनाथ  धाम की, गाथा बड़ी युगीन।।


जिज्ञासा में कर्ण  हैं, सुनने को इतिहास।

मन को झंकृत कर सके,डमरू का आभास।।


पौत्र पांडवों में चला, जनमेजय का राज।

मंदिर का निर्माण कर,सुफल किये सब काज।।


नर नारायण ऋषि हुए, विष्णू  के अवतार।

घोर तपस्या में लगे, जगह श्रृंग केदार।।


विकट तपस्या को दिया,भोले ने वरदान।

ज्योतिर्लिंग के रूप में, श्रृंग चुना स्थान।।


कथा पंच केदार की,अनुपम बड़ी अनूप।

आराधन को दे रहे,,शिवलिंग स्वयं स्वरूप।।


महाभारत के युद्ध में, पांडव को सन्ताप।

भोले भक्ती से मिटे, भाई हत्या पाप।।


यही सोचकर कर रहे,शंकर जी की खोज।

काशी से हिम कन्दरा,मन के खिले सरोज।।


अडिग भक्ति से रीझकर, प्रकटे शम्भु दयाल।

मुक्त पाप से  कर दिया, आशिष से तत्काल।।


बैल रूप में जब हुए, भोले अंतर्ध्यान।

उनके पाँचो अंग से,बने पंच भगवान।।


कुबड़ा  आकृति से हुए, शिवलिंग जी केदार।

धड़ के ऊपर भाग से,पशुपति बन उद्धार।।


तुंगनाथ में बाँह से,मुख से रुध्दरनाथ।

अपने आशीर्वाद से,सदा निभाते साथ।।


नाभि और जटाओं से,पूजित हैं दो धाम।

कल्पेश्वर  महेश्वर,  हम जपते अभिराम।।


धरा धाम पर नित्य ही, होते हैं अवतार

मानवता के हित किया, मंदिर जीर्णोद्धार।।


सदी आठवीं में लिया, सत्य सनातन कार्य।

सदन त्याग  संयम लिए,चले शंकराचार्य।।


सन तेरह की त्रासदी,सब कुछ दिया उजाड़।

महिमा भोलेनाथ की,कुछ ना सकी बिगाड़।।


अप्रेल से नवम्बर तक,दर्शन के शुभ मास।

उनकी करुणा मात्र से, हों पूरण अभिलाष।।


वृश्चिक संक्रांति काल, बैशाखी संयोग।

ऊखीमठ में फिर लगे,भोले जी को भोग।।


महिमा ज्योतिर्लिंग की ,अद्भुत बड़ी अनूप।

गाते हैं सब प्रेम से, सज्जन  दुर्जन  भूप।।


केदारनाथ के साथ   , पहुँचना बद्रीनाथ।

भक्तिभाव से जप करें,और झुकाएं माथ।।



















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