संदेश

सिलेंडर ने नाक कटवा दी(व्यंग्य)

 *सिलेण्डर ने नाक कटवा दी* उन्नत ललाट ,उचके हुए कंधे,लम्बी कद काठी,रौबदार मूँछे, बगबगाता हुआ क्रीजदार  कुर्ता पायजामा,हाथ में मंहगी वाली घड़ी, पैरों में फैशनेबल जूतियां, गले में  मोटी पट्टी वाला गमछा, सिर पर नुकीली टोपी धारण किये हुए अपनी कोठी के बाहर लोन में कुर्सी पर विराजमान कस्बे के प्रतिष्ठित चौधरी सुल्तान सिंह सामने रखा हुआ हुक्का गुड़गुड़ाते हुए बार-बार अपनी हाथ की घड़ी पर नज़र डाल रहे थे। ऐसा लग रहा था की सज-धजकर कहीं जाना  चाहते हैं या किसी का बेसब्री से इंतजार कर रहें हैं। उन्होंने अपनी जेब से महंगा वाला आई फोन निकाला और गांव के नाई को  फोन मिलाते हुए बोले, "क्या हुआ महुआ,मैं तो बहुत देर से प्रतीक्षा  कर रहा हूँ ।"  राम राम करते हुए महुआ  बोला " बस अभी आया चौधरी साहब। लड़की वाले आ गए हैं,उन्हें लेकर ही आ रहा हूँ।"  चौधरी साहब सगर्व  मूंछों ही मूंछों में मुस्कुराए कि आज उनके लड़के के लिए रिश्ते वाले आ रहे हैं । उन्होंने इधर-उधर देखा सामने लगी  मेज पर स्वागत के लिये रखे गए सामान  पर नजर डाली कोई कमी तो नजर नहीं आ रही है।...

गीत खुशी से गायें(छठी मैया)

 चार दिवस के महापर्व को,मिलकर सभी मनाये । सूर्य देव की बहना के हम,गीत खुशी से गायें। प्रथम दिवस में नहाय खाय का,मूल गया बतलाया। शुद्ध सात्विक कद्दू शब्जी,दाल भात बनवाया। सायंकाल को बैठ वृती जन,प्रभु को भोग लगायें। सूर्य देव की बहना के हम गीत खुशी से गायें। चावल और गन्ने के रस की, बने शाम को खीर। परसादी की खीर रोटियां, बदल रहीं तकदीर। द्वितीय दिवस में खरना को हम,सिर्फ शाम को खायें।। सूर्य देव की बहना के हम गीत खुशी से गायें। अगले छत्तीस घण्टे की है, सुनलो अजब कहानी। रहें निर्जला सभी उपासक,छुएं न बिल्कुल पानी। मिलकर बनता गज़ब  ठेकुआ,जिसका भोग लगायें। सूर्य देव की बहना के हम,गीत खुशी से गायें। बनी बांस की एक टोकरी, जिसको दउरा कहते। पंच फलों को इसमें लेकर,शरण घाट की गहते। अस्ताचल गामी सूर्यदेव को,मिलकर अर्घ्य चढ़ाएं। सूर्य देव की बहना के हम गीत खुशी से गायें। पूर्व दिशा में मुँह करके ही, खड़े सलिल में होते। सूर्योदय का अर्चन करने, ध्यानमग्न हो खोते। चतुर्थ दिवस में सिर्फ व्रती ही,पूर्ण नियम अपनाएं। सूर्य देव की बहना के हम गीत खुशी से गायें। पूजा के उपरान्त ग्राम को, सभी व्रती जन आते।...

हम एक दीप जलायें

 *हम एक दीप जलायें* ज्योति पर्व पर अपने अंदर, हम एक दीप जलायें। अहंकार के सघन तिमिर में,नूतन आस जगायें। हम एक दीप जलायें। द्वार द्वार पर रोली अक्षत, घर वन्दनवार सजें। लक्ष्मी जी का स्वागत करने, प्रेम के गीत बजें। सारा जग ही अपना घर है,यही भाव अपनाएं। हम एक दीप जलायें। भाव स्वदेशी मन में लाकर, तब बाज़ार करेंगे।। भारत की मिट्टी से निर्मित, घर के दीप जलेंगे। अपने बन्धु बान्धवों को, आगे सदा बढ़ाएं। हम एक  दीप जलायें। फुलझड़ियों संग चरखी नाचे,  पर इतना ध्यान रहे। प्राणवायु अपनी पीड़ा को, रो रोकर नहीं कहे। प्रदूषण के संकट को हम अब ,घर से दूर भगाएं। हम एक दीप जलायें। छप्पन भोग हमारे घर में, और पड़ौसी भूखा। अधरों पर मुस्कान नहीं है,  व्यवहार हमारा रूखा। जिम्मेदारी यही हमारी,उसके घर भिजवाएं। हम एक दीप जलायें। दीपमालिका की गरिमा को, सदा उच्च रखना है।। डॉलर के कॉलर को नीचा, हम सबको करना है। राष्ट्रभक्ति का पाठ पढ़ें हम, टैरिफ माल न लायें। हम एक दीप जलायें

ऑपरेशन सिन्दूर

  भारतीय सैनिकों ने, कहानी लिख जोरदार। आतंकी वारदात को , धूल में मिला दिया। देश की धमनियों का ,रक्त जब खौल गया शरारती शरीफ की,चूलों को हिला दिया। पानीदार आदमी से, मोल जब पंगा लिया, पाक को रगड़ पानी, जूतों में  पिला दिया। नारी के  सुहाग पर,बात जब बन आयी, सिन्दूरी बारूद ने तो,हूरों से मिला दिया। *जो भारत के स्वाभिमान पर,तिरछी नज़र उठाएगा।* *कसम भारती की खाता हूँ,मिट्टी में मिल जाएगा।* सत्रह बार माफ करने की परिपाटी को छोड़ा है। परिवर्तन की इस बेला में, कुछ नियमों को जोड़ा है। जो सम्मान सहित बोलेगा, उसको आदर देते हैं,  लेकिन भृकुटि तानी जिसने, गर्दन पकड़ मरोड़ा है। अब हमसे टकराने वाला, अपने मुँह की खायेगा। *कसम भारती की खाता हूँ,मिट्टी में मिल जाएगा।।* 1 ऋषि मुनियों की पावन भूमि,संस्कार की जननी है। वचन निभाने के परिपोषक,एक ही करनी कथनी है। राष्ट्र वंदना करने वाले, झुकते कब तलवारों से, दुष्कर्मी को इसी जन्म में,  अपनी कीमत भरनी है। दूध छठी का तुझको अब, भारत याद दिलाएगा। *कसम भारती की खाता हूँ,मिट्टी में मिल जाएगा।।* 2 बदले भारत की ताकत का, दुनिया लोहा मान रही। फौलादी ये वक...

आखिरी मुस्कान -समीक्षा

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प्रख्यात कवि, उपन्यासकार एवं अंतराष्ट्रीय शब्द सृजन मंच नई दिल्ली के राष्ट्रीय अध्यक्ष तथा मेरे अभिन्न मित्र साहित्यकार डा राजीव पाण्डेय जी के ऐतिहासिक उपन्यास "आखिरी मुस्कान " की भावपूर्ण समीक्षा....  "आखिरी मुस्कान " अंतस को झकझोरने वाली अद्वितीय कृति ****************************** *****************   हिंदी साहित्य की गहराई में जाकर शब्दों से खेलते हुए, लेखक ने मनु और मधुरेश के रिश्ते की शुरुआत अत्यंत ही आध्यात्मिक और साहित्यिक अंदाज में शुरू की l हिंदी के जटिल लेकिन सुघर शब्दों का आश्रय लेते हुए उपन्यासकार ने अपनी साहित्यिक परिपक्वता का बोध पाठकों कराते हुए लिखा कि..... " भावुकता अंतस का आभूषण है और आभूषणों की दमक से कोई भी अछूता नहीं रह सकता"मधुरेश बोला। उपन्यास के प्रथम भाग में पुरुष एवं स्त्रियों के अधिकारों और कर्तव्यों का मंथन करते हुए,मधुरेश और मनु के विचार, आपस में प्रश्नोत्तर करते हुए प्रतीत होते हैं l उपन्यास के प्रारंभ से ही लेखक ने उपमा, उपमेय और अलंकारों का आश्रय लेते हुए, प्रत्येक संवाद को साहित्य सजाने पर जोर दिया  है, जैसे... " पिछले...

आत्म परिचय

        *डॉ राजीव कुमार पाण्डेय* (WORLD RECORD HOLDER) गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज FIRST ONLINE POETRY SHOW ON THE THEME OF BHARAT RATNA इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में दर्ज (MAXIMUM POETS RECITED FOR ASHOK CHAKRA RECIPIENTS IN A VIRTUAL EVENT) लन्दन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड DWADASH JYOTIRLING MAHIMA-single hindi poetry anthology on sanatan culture माता का नाम- श्रीमती उमादेवी पाण्डेय पिता का नाम- स्व.श्री ब्रह्मानन्द पाण्डेय जन्म तिथि - 05-10-1970 जन्मस्थान- ग्राम व पोस्ट -दरवाह,जनपद-मैनपुरी शिक्षा- एम.ए. (अंग्रेजी,हिन्दी) बी.एड., पी-एच.डी. लेखन विधा- गीत, ग़ज़ल,मुक्तक,व्यंग्य,छंद,हाइकु, लेख,कहानी,उपन्यास,ब्लॉग,इंटरव्यू,समीक्षा आदि प्रकाशित कृतियां-              आखिरी मुस्कान (सामाजिक उपन्यास)2013              बाँहों में आकाश ( सामाजिक उपन्यास)2018             ...