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कन्हैया आने वाला है

माया मोह जकड़ के बैठे,  टूटेगें  बन्धन । शेषनाग के फन पर आकर, अब होगा नर्तन। कन्हैया आने वाला है। मन की सारी दुविधाओं का,  निश्चित हल होगा। तमस निशा के बाद स्वयं ही, प्रमुदित कल होगा। मद की बेड़ी तोड़ जाएगा, मेघों का गर्जन। कन्हैया आने वाला है। कर्ण श्रवण को बाट जोहते, मुरली अधरों की। गोपी ग्वालिन को कब चिंता, घर के पहरों की। प्रेम सरोबर डूब नहाने, आतुर नन्दन वन। कन्हैया आने वाला है। समरसता का पाठ पढ़ाये, दधि माखन रोटी। मिले पूतना स्वार्थ सिद्धि में, कांप उठे बोटी। रणछोड़ भले ही कहलाएं, हारें कालयवन। कन्हैया आने वाला है। स्वर्ण भाव के दाम बिके ना, पर्त चढ़े कांसे चौसर पर अब चल न सकेंगे, शकुनी के पांसे। बेबस अबला का ना होगा, जग में चीर हरण।  कन्हैया आने वाला है। अखिल विश्व को मिलने वालीं योग की मुद्राएं। शांति पाठ के साथ  चक्र की, नूतन  शिक्षाएं। शंखनाद संग गीता सुनने, व्याकुल हैं अर्जुन।  कन्हैया आने वाला है।  

रिश्तों की अनमोल कहानी,गढ़ते हैं धागे

 रिश्तों की अनमोल कहानी, गढ़ते हैं धागे। हर धड़कन की अनुपम भाषा,पढ़ते हैं धागे। दम्भी लम्पट अत्याचारी, खींच न पाते हैं। साड़ी के उस टुकड़े का भी,मान निभाते हैं। मौन सभा पर मुखर तमाचे, जड़ते हैं धागे। रसाताल में जाकर के  भी , बाली जीत गया। तीन लोक को जीते जी भी,कड़वा घूँट पिया। लक्ष्मी जी को प्रभु मिलते जब, बंधते हैं धागे। विपद काल को सम्मुख देखे,चितौडी रानी। संकट के बादल  दूर हटें, हारे  अभिमानी। स्वाभिमान की रक्षा करने, अड़ते हैं धागे। मेघ गर्जना करके निकले, वे मगरूर हुए। विश्व विजेता के सपने भी,यहां पर चूर हुए। पुरु के घर उसकी भार्या के ,बढ़ते हैं धागे। देशभक्ति का पाठ पढ़ाना, गुरुकुल परिपाटी। रहे सुरक्षित  सीमा रेखा,हर पर्वत घाटी। मातृ भूमि की बलिबेदी पर,चढ़ते हैं धागे।