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हम कुछ नया करेंगे

    हम कुछ नया करेंगे     ----------------------------- आशाओं की  नई  भोर  में, नूतन पंख  सजेंगे। सुर्ख गुलाबी पंखुड़ियों के,फिर से दिन बहुरेंगे। हम कुछ नया करेंगे।  चिड़ियों के कलरव से सूना,आँगन  नहीं सुहाता। और सवेरे कागा भी कब, अपना वचन निभाता। उम्मीदों पर मिठ्ठू  कायम, स्वागत कर  हरसेंगे।  हम कुछ नया करेंगे।  बिना कथानक के  सो जाते, दादी माँ के सपने। सन्ध्या वन्दन का सुर धीमा,अधर लगे हैं कंपने।  बूढ़ी काकी की लाठी में, फिर से पर निकलेंगें। हम कुछ नया करेंगे। भोर  सुहानी  रोती  देखी,  रातें  लें  अंगड़ाई। पुरवा के यौवन पर रीझी,पछुवा की तरूणाई। नयी तूलिका के आँगन में ,नव अरमान भरेंगे। हम कुछ नया करेंगे। मुस्काती कैक्टस की मूँछे,घर की बालकनी में। तुलसी के गमलों से  आयें,  सांसे नागफनी में। रेगिस्तानी  वातायन  में,  गन्धित पुष्प खिलेंगें। हम कुछ नया करेंगे। चौपालों   पर  सन्नाटों  ने, अपना  डेरा  डाला। अगियानों ने दम तोड़ा है,पीक...

मुक्तक संग्रह

 हर बात को सत्य कहना ये भी मुश्किल है। जिंदगी से दम तोड़ लेना ये भी मुश्किलहै। मुश्किल है जीना पल पल अब आदमी का, हर जुल्म सहते रहना ये भी मुश्किल है। संकटोंके हिमालय के कोई घर नहीं होता। प्रात की उम्मीद को रात का डर नहीं होता। अब तक आंधियों से ही सम्बन्ध है जिनका, झंझावातों से लड़खड़ाता स्वर नहीं होता। कंटकों में पुष्प से खिलखिलाना सीख लो। झंझटों में दर्द से स्वर मिलाना सीख लो। खुशियां ही खुशियां मिलेंगी तुम्हारे सदन, संकटों में गर्व से मुस्कराना सीख लो। दूसरों  पर ही  उंगली  उठाते रहे। ढेरों कमियां सदा ही गिनाते  रहे। जो गिरेबाँ में खुद झांक पाये नहीं, प्रभु  से दूरी स्वयं की बढ़ाते  रहे। अक्षर  अक्षर  में है  साधना। गीत  में कवि की  आराधना। अक्षरों की परिधि में मुश्किल, अक्षरीय साधना को बाँधना। गिरना सीख पाये नहीं वे देखे कब संभलते हैं। गुलाबों को देखा हमेशा, कंटकों में खिलते हैं। प्रार्थना और गिड़गिड़ाना कहाँ समय अब दोस्तो,  संघर्ष के बिना  नहीं कभी अधिकार मिलते हैं नासूर  मिटाया  है  फिर भी, प्रश्न अधूरा...