मुक्तक संग्रह

 हर बात को सत्य कहना ये भी मुश्किल है।

जिंदगी से दम तोड़ लेना ये भी मुश्किलहै।

मुश्किल है जीना पल पल अब आदमी का,

हर जुल्म सहते रहना ये भी मुश्किल है।


संकटोंके हिमालय के कोई घर नहीं होता।

प्रात की उम्मीद को रात का डर नहीं होता।

अब तक आंधियों से ही सम्बन्ध है जिनका,

झंझावातों से लड़खड़ाता स्वर नहीं होता।



कंटकों में पुष्प से खिलखिलाना सीख लो।

झंझटों में दर्द से स्वर मिलाना सीख लो।

खुशियां ही खुशियां मिलेंगी तुम्हारे सदन,

संकटों में गर्व से मुस्कराना सीख लो।



दूसरों  पर ही  उंगली  उठाते रहे।

ढेरों कमियां सदा ही गिनाते  रहे।

जो गिरेबाँ में खुद झांक पाये नहीं,

प्रभु  से दूरी स्वयं की बढ़ाते  रहे।


अक्षर  अक्षर  में है  साधना।

गीत  में कवि की  आराधना।

अक्षरों की परिधि में मुश्किल,

अक्षरीय साधना को बाँधना।



गिरना सीख पाये नहीं वे देखे कब संभलते हैं।

गुलाबों को देखा हमेशा, कंटकों में खिलते हैं।

प्रार्थना और गिड़गिड़ाना कहाँ समय अब दोस्तो, 

संघर्ष के बिना  नहीं कभी अधिकार मिलते हैं


नासूर  मिटाया  है  फिर भी, प्रश्न अधूरा  लगता है।

झंडा  शासन अपने पर भी, जश्न अधूरा  लगता है।

जब से  हटी तीन सौ सत्तर,अन्तर्मन है खुश लेकिन,

पाक अधिकृत कश्मीर बिना,स्वप्न अधूरा लगता है।


प्राची से उगते दिनकर का, नित प्रति वन्दन होता है।

वीर  भोग्या वसुंधरा का , कण कण चन्दन होता है।

अर्घ्य चढाने  को तत्पर  है, अपनी रक्तिम बूँदों  का,

इस धरती पर युगों युगों तक,बस अभिनन्दन होता है।


हमारे शौर्य से वाकिफ,तभी तो आज डरते हैं।

घुसने की नही हिम्मत,यहां पर आज करते हैं,

लिखी है चोटियों पर भी,गाथायें शहादत की,

उनकी कहानियां सुनकर,दुश्मन आज मरते  हैं।

 

भक्त को भक्ति से प्रभु मिलना सरल हैं।

जिसको मिले भक्ति वो जीवन सफल हैं।

आज तक पुजते वही हैं इस धरा पर

लोक  मंगल के  लिये पीते  गरल हैं।


राहु केतु से पिंड छुटाने, की मजबूरी थी।

घर आँगन में उगनी तुलसी,बहुत जरूरी थी।

कितने भी गढ़ तुमने जीते, लेकिन फिर भी तो,

 हिंदुस्तानी जीत अमेठी बिना अधूरी थी।


बंगभूमि की क्रांति धरा का, फिर रंग लाल हुआ।

क्यों वीर भोग्या वसुंधरा का,जनजन बेहाल हुआ।

दीदी की दादागीरी  सुन,  विद्यासागर  जी बोले,

मोदी जी का इस चुनाव में,पूरा बंगाल हुआ।


वोटों की गणना से पहले, गुलदस्ते दे आये।

पी एम पद की उम्मीदों के,सपने खूब सजाये।

जगन रेडडी ने घर में घुसकर,ऐसी धूल चटाई,

इसीलिये अब चन्द्रबाबु जी, बैठे मुंह लटकाये।


यू पी में भी भगवा ने फिर से झंडे गाड़े।

दूर दूर को भाग गए राजा  राजबाड़े।

और बुआ के चरणों में,आशा किरण दिखी थी

हाथी ने साइकिल के सब अरमान बिगाड़े।


राम का वन को गमन होना जरूरी था।

मंथरा  का नाटकीय रोना जरूरी था।

राक्षसों से राष्ट्र को मुक्त करने के लिये,

कैकेयी का कोप में सोना जरूरी था।


काम क्रोध की लंका भी जल जायें।

खुली सड़क पर सीतायें चल पायें।

इस बार अंत हो मन के रावण का,

दशरथ नन्दन  ऐसा बाण  चलायें।


मात पिता का नित हम सबको कर्ज चुकाना पड़ता है।

सहस्रबाहु का मर्दन करने दर्प मिटाना पड़ता है।

अहंकार की क्षत्रियता जब सीमाओं से पार चले,

तब तब परसुराम को अपना परशु उठाना पड़ता है।


जज्बातों से खेलना कोई उनसे सीखे।

टाँग बीच मे पेलना कोई उनसे सीखे।

हम तो खुश थे लेकिन उन्हें मंजूर कहाँ,

मुसीबतों में ठेलना कोई  उनसे सीखे।


सारा जमाना पूछता किस हाल में हैं।

परिवर्तन कितने हड्डी और खाल में है।

मुस्कराते हुए अवधपति कुछ यों बोले,

कल भी थे और आज भी तिरपाल में है।


जितने कसूरवार थे सब एक हो गये।

कालिख पुते चेहरे भीआज नेक हो गये।

शेर को गरियाने का ठेका सा ले लिया, ,

ओढ़ कर दुशाले  अनेक हो गए


सूखी डालियों पर कुछ कोपलें खिलीं।

कांग्रेस में जबसे हई प्रियंका एण्ट्री।

जैसे किसी निर्जीव को संजीवनी मिली।


बिल्ली खड़ी है दंग पर चूहा निहाल है

जंगलों में मच रहा खासा बबाल है।

कौए मोती खाके हंसों से कह रहे, 

भेड़ियों ने पहन ली शेरों की खाल है।


विकास के स्थापित हम मील कर रहे।

आप ही बतायें अब कैसा फील कर रहे।

जन धन खुलाये धारकों ने इस तरह कहा,

खुले आम आप राफेल डील कर रहे।


वादे के जमाने।

हैं बहुत पुराने।

स्मृति आते ही,

ये नयन लजाने।


सपने  आँखों  में सजाये रखना।

मंजिल पर  नजरें जमाये  रखना

ऊँचा कितना भी उठ जाओ मित्रो,

पैर को जमीं पर टिकाये रखना।


भक्त को भक्ति से प्रभु मिलना सरल हैं।

जिसको मिले भक्ति वो जीवन सफल हैं।

आज तक पुजते वही हैं इस धरा पर

लोक  मंगल के  लिये पीते  गरल हैं।


मेरे मन मन्दिर में शब्दों का ,सागर भर देता है।

कोना कोना सुप्त ह्रदय का, पावन कर देता है।

जब से देखा मैंने तुमको,नयनों को तृप्ति मिली,

उड़ने को  नाजुक पँखों को, तू अम्बर  देता है।


मुसीबत में सदा से ही धीरज काम आता है।

अधर पर राम जी का ही मंगल नाम आता है।

हलक में आ ही जाते है कभी तो प्राण अपनेभी,

सपने में कभी जब याद, शहरी जाम आता है ।



सुबह से शाम तक भज ले,प्रभु का नाम गोविंदा।

डटकर   काम कर लेना , लेकर नाम  गोविंदा।

कमी होती  कहाँ देखी ,कभी उसके खजाने में,

हैं आशिर्वाद  मुद्रा में , खड़े   अभिराम गोविंदा।


हुस्न का गुरूर।

जानते हुजूर।

छेड़ने को हम

होते  मजबूर।


वादे के जमाने।

हैं बहुत पुराने।

स्मृति आते ही,

ये नयन लजाने।


सपने  आँखों  में सजाये रखना।

मंजिल पर  नजरें जमाये  रखना

ऊँचा कितना भी उठ जाओ मित्रो,

पैर को जमीं पर टिकाये रखना।


वृत्तियों से  छूट कर हम शुद्ध हो जायें।

वश हमारे जब सभी अनिरुद्ध हो जायें।

बन्धनों से छोड़कर  ही यशोधरा राहुल,

त्याग की प्रतिमूर्ति वाले  बुद्ध हो जायें।


जिनके हाथों में कुछ अधिकार क्या मिले, 

खुद को शहंशाह समझ बैठे।

चन्द पग  ही बढ़ाये हैं  डगर में अभी,

मंजिलों की राह समझ बैठे।

इंसान से भगवान तक बनने के रास्ते,

जमीं पर ही तय हुए हैं सदा,

दुनिया में मूर्तिबत पुजते वहीं हैं जो,

 दूसरों की चाह समझ बैठे।


आजीवन मालिक की सुनते,

                       खूब खरी खोटी।

बिल्कुल माफ नहीं होती है ,

                      भूल कभी छोटी।

पैरों से चोटी तक देखो ,

                        श्वेद बहाकर ही,

दो जून की ही मिल पाती,

                      तब जाकर रोटी।


मानवता के मूल्यों का ना,कोई भी अब  मोल रहा।

पोल यहाँ पर इक दूजे की, हर  कोई है खोल रहा।

राजनीति का स्तर इतना,घटिया  भी हो सकता है,

बात नहीं अब महापुरुषों की,माँ बहिनो की बोल रहा।



शिव सैनिक वो ही होते,जहां कोई चढ़े रंग ना।

भयंकर भूल होती है, किसी का तोड़ना अंगना।

अनेकों ज्वार उठते हैं,और  भूचाल आते हैं,

खनकता है यहाँ जब से,खुली आवाज में कंगना।


पीड़ा देख विकल होता है।

समस्याओं का हल होता है।

विरह वेदना जिसकी साथी,

उसका नाम अटल होता है।


वास हमारा निशिदिन होगा,खुशियों के परिवार में।

नाव किनारे   सदा मिलेगी, ना  डूबें  मंझधार में।

भक्तिभाव से अर्पण करना, जिसने सीख लिया है

खाली हाथ कभी ना  रहता,  माता के दरबार में।



सदवृत्तियों के राम के जब अवतरण होंगे।

जगतजननी के नहीं फिर अपहरण होंगें।

कुवृत्तियों के फन जगत में कहीं मिले फैले,

उन रावणों के इस धरा पर तब मरण होंगें।


ज्ञान का प्रकाश दे,जिंदगी में आस दे।

हर खुशी खास दे,प्यार की तलाश दे।

माँ शारदे से प्रार्थना,देश हित कर रहा,

हास दे परिहास दे,वंशीवट का रास दे।


आशाओं के दीप जलाकर,यह त्यौहार मनायें।

खुशिया डूबी अभिलाषा में,वन्दनवार सजायें।

अंधकार  को हरने  वाले ,अटल इरादे लेकर,

वसुंधरा को दिव्यज्योति से,आलोकित कर जायें।


खगकुल की पाँखें खुल जायें।

मास्क सभी मुख से हट पायें।

घर की कैद से  निकलें बच्चे,

विद्यालय  अध्ययन को आयें।


वास हमारा निशिदिन होगा खुशियों के परिवार में।

नाव किनारे सदा मिलेगी ना डूबें मझधार में।

भक्ति भाव से अर्पण करना जिसने सीख लिया है।

खाली हाथ कभी ना रहता माता के दरबार में।



जाने कितने गंगा जी में, औ खेतों में दिये लगाय।

कहाँ हकीकत बतलाते है, सबको रहते हैं भरमाय।

इन्हें बादशाह कहते सब ,फर्जी आंकड़ेबाजी का,

अपनी आंखें वही देखती,जो टीवी में दें दिखलाय।



जंग जीतकर आये हैं जी, खुशियां  सबको हुई अपार।

इतना रगड़ा कोरोना को, धम्म गिरा पाले के पार।

धीरज ही दिखलाना पड़ता, नहीं व्यग्रता आती काम ,

कष्ट काल में अपनी साथी, होती है हिम्मत ही यार।


किसी से प्यार जब होता,कि निदिया भाग जाती हैं।

सपनों में बसे दुनिया,  कि आहें  कसमसाती   हैं।

बड़ी बेचैन हैं करवट,कसें बाहों में तकियों को,

सलवटें सेज पर पड़कर,हमेशा बुद बुदाती  हैं।


हर बात को सत्य कहना ये भी मुश्किल है।

जिंदगी से दम तोड़ लेना ये भी मुश्किलहै।

मुश्किल है जीना पल पल अब आदमी का,

हर जुल्म सहते रहना ये भी मुश्किल है।


संकटोंके हिमालय के कोई घर नहीं होता।

प्रात की उम्मीद को रात का डर नहीं होता।

अब तक आंधियों से ही सम्बन्ध है जिनका,

झंझावातों से लड़खड़ाता स्वर नहीं होता।


कंटकों में पुष्प से खिलखिलाना सीख लो।

झंझटों में दर्द से स्वर मिलाना सीख लो।

खुशियां ही खुशियां मिलेंगी तुम्हारे सदन,

संकटों में गर्व से मुस्कराना सीख लो।


दूसरों  पर ही  उंगली  उठाते रहे।

ढेरों कमियां सदा ही गिनाते  रहे।

जो गिरेबाँ में खुद झांक पाये नहीं,

प्रभु  से दूरी स्वयं की बढ़ाते  रहे।


अक्षर  अक्षर  में है  साधना।

गीत  में कवि की  आराधना।

अक्षरों की परिधि में मुश्किल,

अक्षरीय साधना को बाँधना।


गिरना सीख पाये नहीं वे देखे कब संभलते हैं।

गुलाबों को देखा हमेशा, कंटकों में खिलते हैं।

प्रार्थना और गिड़गिड़ाना कहाँ समय अब दोस्तो, 

संघर्ष के बिना  नहीं कभी अधिकार मिलते हैं


नासूर  मिटाया  है  फिर भी, प्रश्न अधूरा  लगता है।

झंडा  शासन अपने पर भी, जश्न अधूरा  लगता है।

जब से  हटी तीन सौ सत्तर,अन्तर्मन है खुश लेकिन,

पाक अधिकृत कश्मीर बिना,स्वप्न अधूरा लगता है।


प्राची से उगते दिनकर का, नित प्रति वन्दन होता है।

वीर  भोग्या वसुंधरा का , कण कण चन्दन होता है।

अर्घ्य चढाने  को तत्पर  है, अपनी रक्तिम बूँदों  का,

इस धरती पर युगों युगों तक,बस अभिनन्दन होता है।


हमारे शौर्य से वाकिफ,तभी तो आज डरते हैं।

घुसने की नही हिम्मत,यहां पर आज करते हैं,

लिखी है चोटियों पर भी,गाथायें शहादत की,

उनकी कहानियां सुनकर,दुश्मन आज मरते  हैं।

 

भक्त को भक्ति से प्रभु मिलना सरल हैं।

जिसको मिले भक्ति वो जीवन सफल हैं।

आज तक पुजते वही हैं इस धरा पर

लोक  मंगल के  लिये पीते  गरल हैं।


राहु केतु से पिंड छुटाने, की मजबूरी थी।

घर आँगन में उगनी तुलसी,बहुत जरूरी थी।

कितने भी गढ़ तुमने जीते, लेकिन फिर भी तो,

 हिंदुस्तानी जीत अमेठी बिना अधूरी थी।


बंगभूमि की क्रांति धरा का, फिर रंग लाल हुआ।

क्यों वीर भोग्या वसुंधरा का,जनजन बेहाल हुआ।

दीदी की दादागीरी  सुन,  विद्यासागर  जी बोले,

मोदी जी का इस चुनाव में,पूरा बंगाल हुआ।


वोटों की गणना से पहले, गुलदस्ते दे आये।

पी एम पद की उम्मीदों के,सपने खूब सजाये।

जगन रेडडी ने घर में घुसकर,ऐसी धूल चटाई,

इसीलिये अब चन्द्रबाबु जी, बैठे मुंह लटकाये।


यू पी में भी भगवा ने फिर से झंडे गाड़े।

दूर दूर को भाग गए राजा  राजबाड़े।

और बुआ के चरणों में,आशा किरण दिखी थी

हाथी ने साइकिल के सब अरमान बिगाड़े।


राम का वन को गमन होना जरूरी था।

मंथरा  का नाटकीय रोना जरूरी था।

राक्षसों से राष्ट्र को मुक्त करने के लिये,

कैकेयी का कोप में सोना जरूरी था।


काम क्रोध की लंका भी जल जायें।

खुली सड़क पर सीतायें चल पायें।

इस बार अंत हो मन के रावण का,

दशरथ नन्दन  ऐसा बाण  चलायें।


मात पिता का नित हम सबको कर्ज चुकाना पड़ता है।

सहस्रबाहु का मर्दन करने दर्प मिटाना पड़ता है।

अहंकार की क्षत्रियता जब सीमाओं से पार चले,

तब तब परशुराम को अपना परशु उठाना पड़ता है।


जज्बातों से खेलना कोई उनसे सीखे।

टाँग बीच मे पेलना कोई उनसे सीखे।

हम तो खुश थे लेकिन उन्हें मंजूर कहाँ,

मुसीबतों में ठेलना कोई  उनसे सीखे।


सारा जमाना पूछता किस हाल में हैं।

परिवर्तन कितने हड्डी और खाल में है।

मुस्कराते हुए अवधपति कुछ यों बोले,

कल भी थे और आज भी तिरपाल में है।


जितने कसूरवार थे सब एक हो गये।

कालिख पुते चेहरे भीआज नेक हो गये।

शेर को गरियाने का ठेका सा ले लिया, ,

ओढ़ कर दुशाले  अनेक हो गए


सूखी डालियों पर कुछ कोपलें खिलीं।

कांग्रेस में जबसे हई प्रियंका एण्ट्री।

जैसे किसी निर्जीव को संजीवनी मिली।


बिल्ली खड़ी है दंग पर चूहा निहाल है

जंगलों में मच रहा खासा बबाल है।

कौए मोती खाके हंसों से कह रहे, 

भेड़ियों ने पहन ली शेरों की खाल है।


विकास के स्थापित हम मील कर रहे।

आप ही बतायें अब कैसा फील कर रहे।

जन धन खुलाये धारकों ने इस तरह कहा,

खुले आम आप राफेल डील कर रहे।


वादे के जमाने।

हैं बहुत पुराने।

स्मृति आते ही,

ये नयन लजाने।


सपने  आँखों  में सजाये रखना।

मंजिल पर  नजरें जमाये  रखना

ऊँचा कितना भी उठ जाओ मित्रो,

पैर को जमीं पर टिकाये रखना।


भक्त को भक्ति से प्रभु मिलना सरल हैं।

जिसको मिले भक्ति वो जीवन सफल हैं।

आज तक पुजते वही हैं इस धरा पर

लोक  मंगल के  लिये पीते  गरल हैं।


मन  के मन्दिर में शब्दों का ,सागर भर देता है।

कोना कोना सुप्त ह्रदय का, पावन कर देता है।

जब से देखा मैंने तुमको,नयनों को तृप्ति मिली,

उड़ने को  नाजुक पँखों को, तू अम्बर  देता है।


मुसीबत में सदा से ही धीरज काम आता है।

अधर पर राम जी का ही मंगल नाम आता है।

हलक में आ ही जाते है कभी तो प्राण अपनेभी,

सपने में कभी जब याद, शहरी जाम आता है ।


सुबह से शाम तक भज ले,प्रभु का नाम गोविंदा।

डटकर   काम कर लेना , लेकर नाम  गोविंदा।

कमी होती  कहाँ देखी ,कभी उसके खजाने में,

हैं आशिर्वाद  मुद्रा में , खड़े   अभिराम गोविंदा।


हुस्न का गुरूर।

जानते हुजूर।

छेड़ने को हम

होते  मजबूर।


वादे के जमाने।

हैं बहुत पुराने।

स्मृति आते ही,

ये नयन लजाने।


सपने  आँखों  में सजाये रखना।

मंजिल पर  नजरें जमाये  रखना

ऊँचा कितना भी उठ जाओ मित्रो,

पैर को जमीं पर टिकाये रखना।


वृत्तियों से  छूट कर हम शुद्ध हो जायें।

वश हमारे जब सभी अनिरुद्ध हो जायें।

बन्धनों से छोड़कर  ही यशोधरा राहुल,

त्याग की प्रतिमूर्ति वाले  बुद्ध हो जायें।


जिनके हाथों में कुछ अधिकार क्या मिले,खुद को शहंशाह समझ बैठे।

चन्द पग  ही बढ़ाये हैं  डगर में अभी,मंजिलों की राह समझ बैठे।

इंसान से भगवान तक बनने के रास्ते,जमीं पर ही तय हुए हैं सदा,

दुनिया में मूर्तिबत पुजते वहीं हैं जो,दूसरों की चाह समझ बैठे।


आजीवन मालिक की सुनते,खूब खरी खोटी।

बिल्कुल माफ नहीं होती है ,भूल कभी छोटी।

पैरों से चोटी तक देखो , श्वेद बहाकर ही,

दो जून की ही मिल पाती,तब जाकर रोटी।


मानवता के मूल्यों का ना,कोई भी अब  मोल रहा।

पोल यहाँ पर इक दूजे की, हर  कोई है खोल रहा।

राजनीति का स्तर इतना,घटिया  भी हो सकता है,

बात नहीं अब महापुरुषों की,माँ बहिनो की बोल रहा।


शिव सैनिक वो ही होते,जहां कोई चढ़े रंग ना।

भयंकर भूल होती है, किसी का तोड़ना अंगना।

अनेकों ज्वार उठते हैं,और  भूचाल आते हैं,

खनकता है यहाँ जब से,खुली आवाज में कंगना।


पीड़ा देख विकल होता है।

समस्याओं का हल होता है।

विरह वेदना जिसकी साथी,

उसका नाम अटल होता है।


वास हमारा निशिदिन होगा,खुशियों के परिवार में।

नाव किनारे   सदा मिलेगी, ना  डूबें  मंझधार में।

भक्तिभाव से अर्पण करना, जिसने सीख लिया है

खाली हाथ कभी ना  रहता,  माता के दरबार में।


सदवृत्तियों के राम के जब अवतरण होंगे।

जगतजननी के नहीं फिर अपहरण होंगें।

कुवृत्तियों के फन जगत में कहीं मिले फैले,

उन रावणों के इस धरा पर तब मरण होंगें।


ज्ञान का प्रकाश दे,जिंदगी में आस दे।

हर खुशी खास दे,प्यार की तलाश दे।

माँ शारदे से प्रार्थना,देश हित कर रहा,

हास दे परिहास दे,वंशीवट का रास दे।


आशाओं के दीप जलाकर,यह त्यौहार मनायें।

खुशिया डूबी अभिलाषा में,वन्दनवार सजायें।

अंधकार  को हरने  वाले ,अटल इरादे लेकर,

वसुंधरा को दिव्यज्योति से,आलोकित कर जायें।


खगकुल की पाँखें खुल जायें।

मास्क सभी मुख से हट पायें।

घर की कैद से  निकलें बच्चे,

विद्यालय  अध्ययन को आयें।


वास हमारा निशिदिन होगा खुशियों के परिवार में।

नाव किनारे सदा मिलेगी ना डूबें मझधार में।

भक्ति भाव से अर्पण करना जिसने सीख लिया है।

खाली हाथ कभी ना रहता माता के दरबार में।


जाने कितने गंगा जी में, औ खेतों में दिये लगाय।

कहाँ हकीकत बतलाते है, सबको रहते हैं भरमाय।

इन्हें बादशाह कहते सब ,फर्जी आंकड़ेबाजी का,

अपनी आंखें वही देखती,जो टीवी में दें दिखलाय।


जंग जीतकर आये हैं जी, खुशियां  सबको हुई अपार।

इतना रगड़ा कोरोना को, धम्म गिरा पाले के पार।

धीरज ही दिखलाना पड़ता, नहीं व्यग्रता आती काम ,

कष्ट काल में अपनी साथी, होती है हिम्मत ही यार।


किसी से प्यार जब होता,कि निदिया भाग जाती हैं।

सपनों में बसे दुनिया,  कि आहें  कसमसाती   हैं।

बड़ी बेचैन हैं करवट,कसें बाहों में तकियों को,

सलवटें सेज पर पड़कर,हमेशा बुद बुदाती  हैं।


बंजर  धरती   में   बोया था, कंटक  में अनुराग।

हरियाली  की लिये  कल्पना ,मुस्काई थी आग।  

जिन पँखो को जान मिली थी,व्योम में उड़ने को,

उनके ही पर कुतर कुतर कर, गाये संध्या फाग।


भोर  हुई सूरज  उग आया।

किरणों ने भी वचन निभाया।

वीणा के झंकृत तारों ने,

नए राग को नहीं सुनाया।


ज्ञान का प्रकाश दे,जिंदगी में आस दे।

हर खुशी खास दे,प्यार की तलाश दे।

प्रभु श्रीनाथ जी से,बस यही है प्रार्थना, 

कलम को तराश दें,वृंदावन का रास दें।


टूटते नभ के सितारे,क्या लकीरें जोड़ पायीं

काट रस्ते बिल्लियां क्या, किस्मत कभी फोड़ पायीं।

हम मनुज सब जानते हैं,सच यही है इस धरा का,

जुगनुओं के हौसलों को,क्या निशा भी तोड़ पायीं।


आग हमारे अंदर है।

सबसे बड़ा समंदर है।

डुबकी जिसने मारी है,

बनता वही सिंकन्दर है


सागर में भाव अपरिमित है।

गागर में क्या वो  सीमित है।

कितने भी अनजान बने  वो,

बात हकीकत से परिचित हैं।


हमको  दर्पण  झूठा  दिखा रहे।

फिर किस्मत का फूटा बता रहे।

मंजिल तक कसमें बेकार हुईं,

हमको सिर्फ अंगूठा दिखा रहे।


कसमें वादे प्यार  वफ़ा सब धोखे हैं।

अपने हिस्से पतझड़ और  झरोखे हैं।

अन्तस की रजधानी जिनकी सौंपी है,

उनके,  दुनिया में अंदाज  अनोखे  हैं।


पोषित करने प्रतिमानों को,हमने भी कुछ कर्ज़ लिया है।

मिली विरासत वैभवशाली,इस जीवन में फ़र्ज़ जिया है।

मंथन करने उतर गए हैं, हम अटल सिंधु  गहराई में,

उसी सिंधु से मोती चुनकर, सम्मुख सबके अर्ज़ किया है।


अन्तर्मन की अभिलाषा को शब्द मिले।

शब्दों से मधुरिम यादों के कुसुम खिले।

उत्सुकता में कुसुम खड़े मझधारो में

सोच रहे  ये उन भृमरो से कहाँ मिले।


अन्तस् में कोने में हलचल,विचार पुंज की रैली का।

आजीवन की पूंजी पाएं,सम्बोधन की थैली का।

जीवन के खालीपन में, रिक्त तूलिका भरने,

भावों से आबद्ध हुआ है, आलेखन में शैली का।


सूरज के घर में आज कुंहासा है।

निश्चित ही पीड़ा की परिभाषा है।

सायं काल की किरणों में उम्मीदे,

बंजर में फसलों की अभिलाषा है।


आज गुलशन की  मातम में हरेक डाली है।

हुक्मरानों के ह्रदय की दया से कोर खाली है।

ये सब्र का प्याला छलकता क्यों नहीं आखिर,

देशभक्ति दिखावे की नकली और जाली है।


उदित भानु की प्रथम किरण ने,वसुधा मुख के अधर छुए।

अलसायी पलकों के सपने,डूब नहाते किसी कुए।

प्रथम मिलन की अगवानी में,गन्धित उपवन विकल खड़े,

नई चेतना के पग घुंघरू, नर्तन करके मुदित हुए।


एक दिवस में कैसे बाँधे ,जीवन भर का प्यार।

सुमन गुलाबी क्या कह सकता, अंतस के उद्गार।

प्रेम समर्पण पछुआ सीखे,पुरवाई का ज्ञान,

सत्य सनातन वाले रखते, सात जनम अधिकार।


प्रेम दिवस पर ले दे करके, एक कॉल ही आया।

और दिवस की वैल्यू कितनी,जी भरकर बतलाया।

घण्टे भर में हिम्मत करके, जैसे ही यह बोला,

मैं करता हूँ प्यार तुम्ही से,कहने पर धमकाया।


प्रेम दिवस पर हिम्मत करके,हमने निर्णय एक लिया।

पाँच फुटी का टेडी बीयर,हमने उसको गिफ्ट किया।

उसने मेरे अरमानों पर, कुछ ऐसा पानी फेरा,

जो भी कॉटन उसमें निकला,वो तकियों में ठूँस दिया।


इस धरती से अम्बर तक।

ऊँचे महलो से छ्प्पर तक।

 देश भक्ति में  डूबा देखो,

 सीने में जज्बा अन्दर तक।


वीर भोग्या वसुंधरा के ,गीत अधर पर लाता हूँ।

सुप्त चेतना के अन्तस में ,निशिदिन अलख जगाता हूँ।

तेरा वैभव अमर रहे माँ ,इसी भाव को अपनाकर, 

भारतमाता के चरणों में,अपना शीश नवाता हूँ।


बंजर  धरती   में   बोया था, कंटक  में अनुराग।

हरियाली  की लिये  कल्पना ,मुस्काई थी आग।  

जिन पँखो को जान मिली थी,व्योम में उड़ने को,

उनके ही पर कुतर कुतर कर, गाये संध्या फाग।


सूर्य किरण की आभा से,प्रमुदित सभी दिशायें।
तरुओं की शाखाओं पर,खगकुल स्वर में गायें।
प्रात मिलन की अगवानी में,विकल खड़ीं हैं कलियां।
भृमरों के आलिंगन को,षोडस कला दिखायें।

भीषण ताप देखकर भू पर, अनुनय मनुज करें।
तप्त धरा के आंगन में अब, खगकुल ना विचरें।
अनुकूलन में दोहन निशिदन,करते सभी मिले,
बोते पेड़ बबूलों के फिर, हालत क्यों सुधरें।


स्वयं प्रस्फुटित भावों को जब , मधुरिम स्वर मिल जाएं।
शुष्क मरुस्थल के कण कण में,नव पल्लव खिल जाएं।
त्याग समर्पण मनोभाव की,मन में प्रीत जगाकर,
सच्ची श्रद्धा से हर युग में,प्रस्तर भी हिल जाएं।




 


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