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अपना ध्यान रखिये

खिड़कियों से  आने वाली प्रकाश की किरणें मोहन की आँखों पर पड़ रही थी, फिर भी आँखे नहीं खुल रही थी। रात भर के ताप से अकुलाया हुआ सोने की कोशिश कर रहा था, पंखे की गति पूरे यौवन पर थी फिर भी कोई आराम नहीं था। बार-बार करवट बदलते हुए समय बीत रहा था, अकेले कमरे में पड़े हुए केवल भगवान का ही सहारा था इस महामारी के काल में। अपना भी कोई नहीं जो एक गिलास पानी का भी दे दे। सुबह से तीन बार सिर के पास रखा हुआ मोबाइल बज चुका था,उठने की हिम्मत ही नहीं हुई थी। अचानक फिर मोबाइल की घण्टी बजी। बड़ी हिम्मत जुटाकर उठा लिया यही सोचकर कि कोई अपना हालचाल लेने वाला होगा। 'है है लो' इतना ही कह पाया मोहन। "अब कैसे हो?"  बड़ी मधुर  सी आवाज आई उधर से। " बस ठीक ही हैं।"  इतना ही बोलते ही खाँसने लगा। जब खाँसना बंद हुआ तो फिर वही मधुर ध्वनि गूंजने लगी- "मुझे बहुत चिंता लगी है आपकी। प्रभु से बार-बार यही निवेदन कर रही हूँ कि आप जल्दी से जल्दी ठीक हो जायें।" "जी प्रभु ने चाहा तो ठीक हो जाऊँगा।" इतना कहकर शांत हो गया मोहन लेकिन इस बार ये आवाज कुछ अजीब सी लगी।  मोहन के पास इस तरह ...

करवा चौथ के दोहे

एक  नगर में सेठ के, बेटे थे कुल सात। इकलौती बेटी मिली, बहुत बड़ी सौगात। सातों भाई बहिन से,करते अतुलित प्यार। उसकी चिंता में रहें, घड़ी घड़ी तैयार। उत्सव करवा चौथ का,घर भर में उल्लास। माता भाभी संग में, बेटी का  व्रत खास। खाना खाने  सायं को,  बैठे भाई सात। तभी बहिन का ख्यालकर,जाग उठे जज्बात। भूखी  बहिना देखकर  ,खाने का अनुरोध। किंतु बहिन के धर्म का ,था थोड़ा सा बोध। बिन बहिना के था नहीं,भोजन भी स्वीकार। इसी लिये वे खोजने, चले एक उपचार। छोटे भाई का सदा,चलता तेज दिमाग। पूरी करने योजना , लेता  हाथ चिराग। जलता दीपक रख दिया,किसी वृक्ष की ओट। यद्यपि मन में थी नहीं, कहीं किसी के खोट। दीपक छलनी ओट में, लगे चाँद साक्षात। आकर बहिना से कहें समझाकर यह बात। अर्घ्य चढ़ाने को हुई, जब बहिना तैयार। कहे भाभियों से ननद, आओ जल्दी द्वार। तब भाभी ने दी बता , भइयों की करतूत। चाँद निकलने का यहाँ, दिखता नहीं सबूत। भोली बहिना ने किया , भइयों  का विश्वास। अर्घ्य चढ़ाकर खुश दिखी,उत्सव बनता खास। अर्घ्य चढ़ाकर ज्यों लिया, एक निवाला खाय। अपसकुन के प्रभाव से,छींक छींक अकुलाय। अन्य निवाल...