अपना ध्यान रखिये
खिड़कियों से आने वाली प्रकाश की किरणें मोहन की आँखों पर पड़ रही थी, फिर भी आँखे नहीं खुल रही थी। रात भर के ताप से अकुलाया हुआ सोने की कोशिश कर रहा था, पंखे की गति पूरे यौवन पर थी फिर भी कोई आराम नहीं था। बार-बार करवट बदलते हुए समय बीत रहा था, अकेले कमरे में पड़े हुए केवल भगवान का ही सहारा था इस महामारी के काल में। अपना भी कोई नहीं जो एक गिलास पानी का भी दे दे। सुबह से तीन बार सिर के पास रखा हुआ मोबाइल बज चुका था,उठने की हिम्मत ही नहीं हुई थी। अचानक फिर मोबाइल की घण्टी बजी। बड़ी हिम्मत जुटाकर उठा लिया यही सोचकर कि कोई अपना हालचाल लेने वाला होगा। 'है है लो' इतना ही कह पाया मोहन। "अब कैसे हो?" बड़ी मधुर सी आवाज आई उधर से। " बस ठीक ही हैं।" इतना ही बोलते ही खाँसने लगा। जब खाँसना बंद हुआ तो फिर वही मधुर ध्वनि गूंजने लगी- "मुझे बहुत चिंता लगी है आपकी। प्रभु से बार-बार यही निवेदन कर रही हूँ कि आप जल्दी से जल्दी ठीक हो जायें।" "जी प्रभु ने चाहा तो ठीक हो जाऊँगा।" इतना कहकर शांत हो गया मोहन लेकिन इस बार ये आवाज कुछ अजीब सी लगी। मोहन के पास इस तरह ...