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राणा प्रताप के भाले की

महाराणा प्रताप के शौर्य को नमन। सौंगन्ध आज हम लेते हैं,  राणा  प्रताप के भाले की। बनी घास के तिनकों से थी,उस रोटी और निवाले की। इतिहासों के पृष्ठों में भी, बस मुग़ल कथा को गाया है। सच्चाई को जनमानस से,अब तक ही गया छिपाया है। दबे हुए हैं  स्वाभिमान के, किस्से   इस पावन माटी में, उस शौर्य कथा को लिखने का,अब फिर से अवसर आया है। आज जरूरत उन पन्नो को, है सचमुच सही उजाले की। सौंगन्ध आज हम लेते हैं,  राणा  प्रताप के भाले की। बनी घास के तिनकों से थी,उस रोटी और निवाले की। भारी सेना के सम्मुख भी, वह चेतक लेकर अड़ा रहा। युद्ध क्षेत्र में घमासान था, दोनों सेना का रुधिर बहा। तलवारों ने रक्त चढ़ाया, युद्ध भूमि में रणचण्डी को , फिर भी  घाटी में राणा को ,क्योंनहीं  विजेता गया कहा। रोम रोम रोमांचित करती, वो अमर कहानी नाले की। सौंगन्ध आज हम लेते हैं,  राणा  प्रताप के भाले की। बनी घास के तिनकों से थी,उस रोटी और निवाले की। चाटुकारिता में अकबर की, जिस जिस ने कलम चलाई थी। महिमा मण्डित करने को भी, कलमों ने  रिश्वत पायीं थी। वही कसीन्दे शिलालेख पर, फिर ख...

आखिर ऊँट किस करवट बैठेगा?(व्यंग्य)

 "आखिर ऊँट किस करवट बैठेगा" यह कहावत जमाने से चली आ रही है। कोई सा भी चुनाव हो लोग कहने से नहीं मानते - "देखो ऊँट  किस करवट बैठे?" जब वंशी छोटा था सोचता था आखिर ये ऊँट चुनाव में ही क्यों बैठता है, बैठता है तो कहाँ बैठता है, क्यों बैठता है और दिखाई क्यों नहीं देता? पिछले विधान सभा चुनाव में जिस स्थान पर ऊँट बैठा था एक पार्टी ने तो  रात और दिन के लिये अपने कार्यकर्ता लगा दिए  थे इंस्पेक्शन करने के लिये जहाँ पर ऊँट बैठा था। ये सख्त हिदायत थी कि ये ऊँट अपनी साइड न बदल पाए जिस करवट बैठाया गया है उसी पोजिशन में रहना चाहिए ।  टकटकी लगाए देखते रहते कि सत्ताधारी पार्टी  कहीं ऊँट से छेड़छाड़ न करदें सो ऊँट की करवट ही बदल जाये। लेकिन पता नहीं क्यों जब निर्धारित तिथि वाले दिन वोट खुले तो विपक्ष ने पूरे देश मे हंगामा कर दिया कि "ई वी एम" नाम के जंतु ने जरूर ऊँट को काटा है इसलिए इसकी करवट बदली वरना कोई हरा नहीं सकता था। आजकल तो मीडिया भी रिसर्च करती है और वोट पड़ने के बाद ही एक्ज़िट पोल नाम का  आविष्कार हंगामा करना शुरू कर देता है इस बार ऊँट किसके फेवर में बैठेगा। फिर म...

जय हो राजनीति की(व्यंग्य)

 *जय हो राजनीति की* "जीतेगा भई जीतेगा डमरू वाला जीतेगा।" के  नारे गली में गूँज रहे थे । ढोल मृदंग की आवाज में नए नए नारे जन्म ले थे जिज्ञासा बढ़ी , मैं भी बाहर गया था ताकि ये भीड़ कहीं आकर मेरा गेट न पीटने लगे।  गेट बेचारा कई दिन से पिट रहा था, दीवारें पोस्टरों से पटी हुईं थी। ये भी था बादर आने का कारण कि कहीं दीवार और न लगा दें।   अनौखा प्रचार था जहाँ सभी समर्थकों के गले में माला थी, केवल एक व्यक्ति को छोड़कर, पहचानना कठिन हो रहा था आखिर इसमें प्रत्याशी कौन सा है? कोई परिचित भी नहीं दिख रहा था खूब ध्यान लगाकर देखा तो एक व्यक्ति कुछ परिचित सा लगा। मैंने उसे रोकने की कोशिश की तो वह नज़रें चुराने लगा उसके सिर पर पार्टी की टोपी ,बगबगा कुर्ता पायजामा ,गले में उसी पार्टी का पटका , हाथ मे झंडा उठाये अपने प्रत्याशी की जय हो के गगनभेदी नारे। मैंने उसे रोकने की कोशिश की किन्तु वह आगे  बढ़ने लगा भीड़ में। इसलिए कहीं पोल न खुल जाये। मैन पास जाकर रोका  "भाई बताओ तो सही आखिर आपके प्रत्याशी कौन से हैं?" "यही जो सबसे आगे बिना माला वाले है।" "सब के गले मे माला इनके गले में...