व्हाट्सएप जीवी(व्यंग्य)
व्हाट्सएप जीवी अलख सवेरे से अपना मोबाईल खोलकर बैठे ही थे। देखा कुछ नोटिफिकेशन ने स्क्रीन पर दस्तक दी है। बेचारे व्हाट्सएप जीवी को कहाँ तसल्ली तुरंत खोलकर पढ़ने का मन बना लिया । दो चार लाइनों को ही पढा और लगा ये तो मार्केट बिल्कुल नया है सो अन्य ग्रुपों में सरकाने के लिये बाँहे समेट ली ताकि और कोई न मैदान मार ले उनसे पहले। भोर की राम राम इसी प्रकार के मैसेज से होती थी व्हाट्सएप जीवी की और मन ही मन खुश होते थे कि सबसे पहले ज्ञान बाँटने का पुण्य लाभ और कोई न लूट ले। जबसे व्हाट्सएप इंस्टॉल किया उनकी घरवाली परेशान होने लगी थी । बार बार झल्लाती "कहाँ से मेरी सौतन को ले आये हो न खाने का ध्यान है न पीने का । इससे बढ़िया तो की पेड वाला ही सही था। कम से कम उसे व्हाट्सएप सौतन तो नहीं थी।" बीबी ने आज रौद्र रूप धारण कर लिया मोबाईल छीन कर बोली- " आज से तुमने इसे छुआ तो फिर खैर नहीं।" आज व्हाट्सअप जीवी सायलेंट मुद्रा में थे वैसे सभी दुनिया के सभी शेर सिंह अपनी बीबी के सामने ऐसे ही होते हैं । व्हाट्सएप जीवी अपने गुस्से को गले के नीचे सटक गए निवेदन की मुद्रा में गिड़गिड़ाने लगे ...