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गणेश जी का प्राकट्य दिवस

स्थल वन्दित   हो गया, शिखर बड़ा कैलाश। पार्वती शिव   के हुए,  पूर्ण सभी  अभिलाष।  मास आश्विन शुक्ल पक्ष, तिथी चतुर्थी योग। प्रथम पूज्य का आगमन,सुफल सुखद संयोग।  पौराणिक  सन्दर्भ में, कह   रहे  वेद व्यास।  गौरी सुत से याचना,   लेखक बनिये खास। एक।  शर्त पर हो गए,  प्रभु गणेश तैयार। लिक्खूँगा  निर्बाध मैं,  रहना है होशियार। वेदव्यास जी कह रहे,ज्ञान बहुत अत्यल्प । प्रभु जी लिखना शुद्ध तुम,टूटे नहीं प्रकल्प। ठीक चतुर्थी के दिवस, बोलें ऋषिवर श्लोक। दस दिवसों का घोर तप,  कोई सका न रोक। इक ही आसन पर जमे,गए दिवस दस बीत। जड़बत  मिट्टी  धूल में,  नहीं हुए   भयभीत। कार्य समापन बाद ही, जमकर किया नहान।  उसी सरस्वति का मिले, हमको बड़ा बखान। संयम पूजा  पाठ के,  दस दिवसीय महत्व। आराधक ही जानता, होता   क्या है  तत्व। करें विसर्जित वासना,  दस दिन के पश्चात। होती निर्मल आत्मा ,  कटती दुख की रात। विघ्न हरण से कर रहे,    सामूहिक अनुरोध। हम...

गुरूजी वन्दन बारम्बार

 दिव्य ज्ञान के अनुपम ज्ञाता,जगत निर्माता कुम्भकार। सुप्त ह्रदय की वीणा के भी ,  कर देते है झंकृत तार । गुरूजी वन्दन बारम्बार। पाषाणों के अधर प्रफुल्लित। सघन वनों के पथ आलोकित। पाकर शुष्क सुमन भी सौरभ भ्रमरों को करते आकर्षित। दिव्य अलौकिक अनुकम्पा से, मिट्टी को देते आकार। गुरूजी  वन्दन बारम्बार। डगमग  कदमों में है स्थिरता। कोमल मन की दूर विकलता। प्रश्न शेष ना   रहा  उत्तरित। पाते चक्षु सदा   ही  दृढ़ता। नाप रहे अपने क़दमों से,चंदा मामा का आकार। गुरूजी  वन्दन बारम्बार। विपुल सिंधु में सीप खोजते। चट्टानों पर  फसल रोपते । हमसे जो टकराये अवयव, अपने सिर को रहे नोचते। लघुता में गुरुता को भरकर,रचते एक नया संसार। गुरूजी वन्दन बारम्बार। नीरवता भी मानव  मन की। तमस निशा भू के आंगन की। पीडाओं को  हरकर    देते, निशिदिन शीतलता चन्दन की। शांति पाठ के साथ पढ़ी है,क्रांति मन्त्र की इक हुँकार।  गुरूजी वन्दन बारम्बार। सिंधु सुखाते रीते घट में। शक्ति बहुत अपने केवट में नहीं डूबती कहीं किश्तियाँ वापिस आती अपने तट में। आस्...

डॉ राजीव पाण्डेय के मुक्तक

  हर बात को सत्य कहना ये भी मुश्किल है। जिंदगी से दम तोड़ लेना ये भी मुश्किलहै। मुश्किल है जीना पल पल अब आदमी का, हर जुल्म सहते रहना ये भी मुश्किल है। संकटोंके हिमालय के कोई घर नहीं होता। प्रात की उम्मीद को रात का डर नहीं होता। अब तक आंधियों से ही सम्बन्ध है जिनका, झंझावातों से लड़खड़ाता स्वर नहीं होता। कंटकों में पुष्प से खिलखिलाना सीख लो। झंझटों में दर्द से स्वर मिलाना सीख लो। खुशियां ही खुशियां मिलेंगी तुम्हारे सदन, संकटों में गर्व से मुस्कराना सीख लो। दूसरों पर ही उंगली उठाते रहे। ढेरों कमियां सदा ही गिनाते रहे। जो गिरेबाँ में खुद झांक पाये नहीं, प्रभु से दूरी स्वयं की बढ़ाते रहे। अक्षर अक्षर में है साधना। गीत में कवि की आराधना। अक्षरों की परिधि में मुश्किल, अक्षरीय साधना को बाँधना। गिरना सीख पाये नहीं वे देखे कब संभलते हैं। गुलाबों को देखा हमेशा, कंटकों में खिलते हैं। प्रार्थना और गिड़गिड़ाना कहाँ समय अब दोस्तो, संघर्ष के बिना नहीं कभी अधिकार मिलते हैं नासूर मिटाया है फिर भी, प्रश्न अधूरा लगता है। झंडा शासन अपने पर भी, जश्न अधूरा लगता है। जब से हटी तीन सौ सत्तर,अन...

वन्दन बारम्बार

मात शारदा के चरणों में ,वंदन बारम्बार। अल्पबुद्धि से कारक बनकुछ,कर पाऊं उद्धार। मेरा नमन हजारों बार। बुद्धि शून्य है रिक्त पटल है। लिखने को ये मन विव्हल है।  तेरे दर पर ढूँढ़ रहा माँ , अब याचक बन इसका हल है। सुप्त ह्रदय के तारों में कुछ,भरदो अब झनकार। अवरुद्ध कंठ है शुष्क अधर। घोर तमस के जंगल में घर। आशा का मृग रहा खोजता पर कस्तूरी मिले किधर। ममता के आँचल से खोलो,कुंडलियों के द्वार। सकल विश्व ढूँढे सुख भौतिक। उसमें अदृश्य प्रेम अलौकिक। नैराश्य भाव के सघन तिमिर में प्रकट करो मुरलीधर यौगिक। भोग विलासी मन में भर दो,करुणा का संसार। स्वार्थ सिद्ध से युक्तआचरण। उसमें खोया प्रेम व्याकरण। नयनों की कह रही पुतलियां, इनका कैसे हटे आवरण। विकृतियों के घोर तिमिर में,दो रसमय संसार।