गणेश जी का प्राकट्य दिवस
स्थल वन्दित हो गया, शिखर बड़ा कैलाश।
पार्वती शिव के हुए, पूर्ण सभी अभिलाष।
मास आश्विन शुक्ल पक्ष, तिथी चतुर्थी योग।
प्रथम पूज्य का आगमन,सुफल सुखद संयोग।
पौराणिक सन्दर्भ में, कह रहे वेद व्यास।
गौरी सुत से याचना, लेखक बनिये खास।
एक। शर्त पर हो गए, प्रभु गणेश तैयार।
लिक्खूँगा निर्बाध मैं, रहना है होशियार।
वेदव्यास जी कह रहे,ज्ञान बहुत अत्यल्प ।
प्रभु जी लिखना शुद्ध तुम,टूटे नहीं प्रकल्प।
ठीक चतुर्थी के दिवस, बोलें ऋषिवर श्लोक।
दस दिवसों का घोर तप, कोई सका न रोक।
इक ही आसन पर जमे,गए दिवस दस बीत।
जड़बत मिट्टी धूल में, नहीं हुए भयभीत।
कार्य समापन बाद ही, जमकर किया नहान।
उसी सरस्वति का मिले, हमको बड़ा बखान।
संयम पूजा पाठ के, दस दिवसीय महत्व।
आराधक ही जानता, होता क्या है तत्व।
करें विसर्जित वासना, दस दिन के पश्चात।
होती निर्मल आत्मा , कटती दुख की रात।
विघ्न हरण से कर रहे, सामूहिक अनुरोध।
हमको आशिष दीजिये,दिव्य ज्ञान का बोध।
बहुत सुन्दर वंदना। गणेश चतुर्थी की हार्दिक शुभकामनाएँ
जवाब देंहटाएंहमेशा आपकी लेखनी से ऐसे ही भाव विभोर करने वाली रचनाएं निकलती रहे। आपको कोटि-कोटि शुभकामनए।
जवाब देंहटाएंवाह शानदार सृजन
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर व भक्तिमय प्रस्तुति💐💐🙏🏼🙏🏼
जवाब देंहटाएंसुंदर, अलंकृत दोहे
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