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आओ भजें राम का नाम

जिनकी दृष्टि मात्र से होता, इस जग का कल्याण। उनका त्याग तपोबल करता, युग युग का निर्माण। आओ भजे राम का नाम। वानर रीछ जटायु पक्षी,सब उनके  ही  मित्र। समतामूलक दृष्टिकोण से ,गढ़ते सदा चरित्र। शबरी के झूठे बेरों में ,धर्म नीति  के प्राण। आओ भजे राम का नाम। साधु संत के यज्ञ सफ़लकर,ऋषियों का उद्धार। बन्धु बांधवों संग केवट भी, भवसागर से पार। केवल भृकुटि तनी देखकर,उदधि हुआ निष्प्राण। आओ भजे राम का नाम। हुए विष्णु के रूप स्वयं जो,रहे मनुज के रूप। मर्यादा में युग को बांधा, बनकर जिसने भूप। दीन दुखी को गले लगाया, थे दुष्टों को बाण। आओ भजे राम का नाम। मिथिला के गौरव पर संकट, डूब रहा दिनमान। शीश झुकाये बैठ गया था,भूपों का अभिमान। धनुष भंग कर हर लेते हैं,जनकसुता का त्राण। आओ भजे राम का नाम। देवराज की करतूतों का ,भार्या को अभिशाप। नहीं युगों तक सुनने वाला, प्रस्तर का  सन्ताप। सदियों की अभिशप्त अहल्या,पा जाती है प्राण। आओ भजे राम का नाम।

जमा न कोई खेल

अपने प्रिय जन के सम्मुख है,कानों खिंची गुलेल। भरसक कोशिश करके देखी , जमा न कोई खेल। सुर से लेकर तान अलग है,  फिर भी गाते गाना। कोरस से कहाँ देखा जाता,  नायक का सटियाना। वाद्य यंत्र भी मिला न पाये, पदचापों से मेल। अपने प्रिय जन के सम्मुख है,कानों खिंची गुलेल। भरसक कोशिश करके देखी , जमा न कोई खेल देख देख हैरान मदारी, बिगड़ा हुआ जमूड़ा। मुद्रा के थैले में रखता, अहंकार का कूड़ा। बूढ़ी अम्मा के हाथों से, ढीली हुई नकेल।  अपने प्रिय जन के सम्मुख है,कानों खिंची गुलेल। भरसक कोशिश करके देखी , जमा न कोई खेल उदित भानु के हाथ जोड़कर,  खिलती सूर्यमुखी। पर सन्ध्या के अवसानों में, होती बड़ी दुःखी। सूखे अंडूके ना देते, उम्मीदों का तेल। अपने प्रिय जन के सम्मुख है,कानों खिंची गुलेल। भरसक कोशिश करके देखी , जमा न कोई खेल परीक्षा की कॉपी में रखे, जिसने पन्ने कोरे। खिसियानी बिल्ली सा देखो,  अपने दाँत निपोरे। शेरों की मांदों के आगे ,गीदड़ दिए धकेल। अपने प्रिय जन के सम्मुख है,कानों खिंची गुलेल। भरसक कोशिश करके देखी , जमा न कोई खेल अभी नर्सरी दांव पेंच की, फिर भी कसा लँगोट। प्रतिद्वंद्वी से जीत...