राम की महिमा
द्वेष भाव से कमी न आई,कभी हमारी निष्ठा में। अन्तर्मन में अलख जगाये,चिर युगीन धर्मिष्ठा में। अक्षत रोली चंदन लेकर,मर्यादा के दर्शन में, आज सनातन एक हुआ है,प्रभु की प्राण प्रतिष्ठा में। कितने शबरी केवट अबतक,अपलक राह निहारे हैं। पीड़ाओं को झेल जटायू , अपने पंख पसारे हैं। पलक पाँवड़े बिछा बिछा कर,दर्शन कीअभिलाषा में, अगवानी में सभी गिलहरी, बैठीं सेतु किनारे हैं। राम का वन को गमन होना जरूरी था। मंथरा का नाटकीय रोना जरूरी था। राक्षसों से राष्ट्र को मुक्त करने के लिये, कैकेयी का कोप में सोना जरूरी था। काम क्रोध की लंका भी जल जायें। खुली सड़क पर सीतायें चल पायें। इस बार अंत हो मन के रावण का, दशरथ नन्दन ऐसा बाण चलायें। जो आँखों में अभिलाषा थी, उसको पंख मिलेंगे अब। मंदिर राम विराजित होंगें,मन के पुष्प खिलेंगे अब। वसुधा स्वागत को तत्पर है,ईंट नींव को पाने को। बाँध पैजनियां नर्तन करके, प्रभु को खूब रिझाने को। अन्तस् तक है लहर खुशी की,मंगल गायन करने को। अपने आँचल में प्रभुभक्ति,पूर्ण रूप से भरने ...