राम की महिमा
द्वेष भाव से कमी न आई,कभी हमारी निष्ठा में।
अन्तर्मन में अलख जगाये,चिर युगीन धर्मिष्ठा में।
अक्षत रोली चंदन लेकर,मर्यादा के दर्शन में,
आज सनातन एक हुआ है,प्रभु की प्राण प्रतिष्ठा में।
कितने शबरी केवट अबतक,अपलक राह निहारे हैं।
पीड़ाओं को झेल जटायू , अपने पंख पसारे हैं।
पलक पाँवड़े बिछा बिछा कर,दर्शन कीअभिलाषा में,
अगवानी में सभी गिलहरी, बैठीं सेतु किनारे हैं।
राम का वन को गमन होना जरूरी था।
मंथरा का नाटकीय रोना जरूरी था।
राक्षसों से राष्ट्र को मुक्त करने के लिये,
कैकेयी का कोप में सोना जरूरी था।
काम क्रोध की लंका भी जल जायें।
खुली सड़क पर सीतायें चल पायें।
इस बार अंत हो मन के रावण का,
दशरथ नन्दन ऐसा बाण चलायें।
जो आँखों में अभिलाषा थी, उसको पंख मिलेंगे अब।
मंदिर राम विराजित होंगें,मन के पुष्प खिलेंगे अब।
वसुधा स्वागत को तत्पर है,ईंट नींव को पाने को।
बाँध पैजनियां नर्तन करके, प्रभु को खूब रिझाने को।
अन्तस् तक है लहर खुशी की,मंगल गायन करने को।
अपने आँचल में प्रभुभक्ति,पूर्ण रूप से भरने को।
जन जन के चरणों की रज ही,उसका रोली चंदन है।
दीपक थाली लिए सुशोभित, मर्यादा का वंदन है।
पुण्य धरा का स्वागत करने,इंद्रदेव बरसेंगे अब।
लाख करोडों उम्मीदों का,ये स्थल अभिनन्दित है।
अनुनायियो की रक्त बूँद से ,पूजन स्थल वन्दित है।
मुक्ति पंथ में आराधन के,स्वप्न सँजोये चले गये।
वर्ण शंकरो की सन्तति से,कितने केवट छले गए।
जीवन कितने दफन हो गये, लिखने मुक्ति कहानी में
उनकी स्मृति शेष अभी है,सरयू तट के पानी में।
कारसेवकों की अभिलाषा,प्रभु जी तृप्त करेंगे अब।
सरयू तट बसी अयोध्या,है प्रभु की अगवानी में।
मनोभाव का मंगल होगा,श्रद्धा की राजधानी में।
चार धाम अरु सप्तपुरी की,मिट्टी होगी ज्ञान की।
उस मिट्टी में आस्था होगी,पूरे हिंदुस्थान की।
अंजनि पुत्र के सत्कर्मों की,मिली आज सौगात है।
घर में वन्दनवार सजाएँ,दीपों की जगमग रात है।
उस मंदिर के शिखर शिखर पर,भगवा ध्वज फहरेंगे अब।
आओ भजें राम का नाम
जिनकी दृष्टि मात्र से होता, इस जग का कल्याण।
उनका त्याग तपोबल करता, युग युग का निर्माण।
आओ भजे राम का नाम।
वानर रीछ जटायु पक्षी,सब उनके ही मित्र।
समतामूलक दृष्टिकोण से ,गढ़ते सदा चरित्र।
शबरी के झूठे बेरों में ,धर्म नीति के प्राण।
आओ भजे राम का नाम।
साधु संत के यज्ञ सफ़लकर,ऋषियों का उद्धार।
बन्धु बांधवों संग केवट भी, भवसागर से पार।
केवल भृकुटि तनी देखकर,उदधि हुआ निष्प्राण।
आओ भजे राम का नाम।
हुए विष्णु के रूप स्वयं जो,रहे मनुज के रूप।
मर्यादा में युग को बांधा, बनकर जिसने भूप।
दीन दुखी को गले लगाया, थे दुष्टों को बाण।
आओ भजे राम का नाम।
मिथिला के गौरव पर संकट, डूब रहा दिनमान।
शीश झुकाये बैठ गया था,भूपों का अभिमान।
धनुष भंग कर हर लेते हैं,जनकसुता का त्राण।
आओ भजे राम का नाम।
देवराज की करतूतों का ,भार्या को अभिशाप।
नहीं युगों तक सुनने वाला, प्रस्तर का सन्ताप।
सदियों की अभिशप्त अहल्या,पा जाती है प्राण।
आओ भजे राम का नाम।
*कर रहें हैं वन्दना*
अभिशप्त प्रस्तर में किया था,
प्राण का नव संचरण।
उन पदों के आचरण से,
उग उठा नव अंकुरण।
आदर्श के प्रतिमान की हम ,कर रहे हैं वन्दना।
कर रहें हैं वन्दना।
सहस्र अरि होते प्रकम्पित ,
अवलोक भुजदंड बल।
चख मधुर फल हार जाते,
शबरी का प्रेम निश्चल।
भीलनी के इस ज्ञान की हम, कर रहें हैं वन्दना।
कर रहें हैं वन्दना।
सलिल था बृहद पात्र में ,
विस्वास उस गांव का।
था धरा के मनुज हित में,
प्राकट्य उस नाव का।
केवटों के सम्मान में हम ,कर रहे हैं वन्दना।
कर रहें हैं वन्दना।
ज्ञान था हैं पंख निर्बल,
गर्जना दस शीश को।
प्राण अंतिम प्रभु गोद में,
पा गया आशीष को।
वीर जटायु जान की हम, कर रहें है वन्दना।
कर रहें हैं वन्दना।
बहुत सुंदर
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