संदेश

फ़रवरी, 2022 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

आ गयो फागुन है

 रँगन के मौसम में अब तो ,चले न कऊ को जोर। सारे गामन के हुय गए हैं,छोरे नन्दकिशोर। आ गयो फागुन है। बिना बात बलखाबै टांगे, देख देख पैजनियां । मस्ती में गरियाबै धरिके, सिर पे रखीं मटकियां। माखन मिश्री धरी एक लंग,भयो भंग को जोर । आ गया फागुन है। (1) सुघड़ सलोनी कोयलिया लखि, कागा सुर में गावै। सुबह सांझ नैनन दे काजर,दो चक्कर करि आबै। मुँह में पान दबायो मीठो,चन्दन को  तकें चकोर । आ गया फागुन है।  (2) पिचके गालन तेल लगो के,सुरमा वारी आँखे। प्रेम को मौसम खोले अपनी, नई पुरानी पाँखें। घूँघट वारी कली देखकर, हैं बुड्ढे भाव विभोर। आ गया फागुन है। (3) रंग में  भींगी सभी  गोरियां, बस राधा हीं दीखें। मौको पाकर मरजादा भी अपनी आँखें मीचें। गारिन में भी रस टपके है, मनवा भाव विभोर  आ गया फागुन है। (4)

ऋतुराज बसन्त

 कामदेव के सुत आएं हैं,पतझड का दुख हरने। बांध पैंजनी बसुधा मचली, उनका स्वागत करने।  सिर पर भावों की कलसी ले,अलसी नर्तन करती। पीत वस्त्र में सजकर बैठी,सरसों आँहें भरती। मदनदेव जी हुए अवतरित, तरुणी लगी सँवरने। वातायन को गन्धित करते,सुर्ख गुलाबी पल्लव। आम्रमंजरी पर मुग्धित है,धरती का हर अवयव। बौराई अरहर की कलियां ,यौवन लगा निखरने। पेड़ों की शाखायें गुंजित ,खगकुल के रागों से। भृमरों के गुंजन में आती, अब सांसें बागों  से। गजराजों की उठी सूड़ लखि,कमल लगे हैं झरने। कामशास्त्र में चर्चा वर्णित,सुवसन्तक उत्सव की। प्रेम शास्त्र को पढ़ी गोपियां, सुनती कब उद्धव की।  पँचसरों  के अभिसारण से,रति का आंगन भरने।

अब कदम अपने बढ़े हैं।

 लक्ष्य का सन्धान करने,अब कदम अपने बढ़े हैं। किंतु जीवटता लिए ही, अंगदों के सम खड़े  हैं। मन अशंकित कर न पाई,संकटों की चोटियां भी। भांपने में हैं निपुण हम,पथ बिछी जो गोटियाँ भी। सत्य  सम्मुख हारते  हैं,जो शकुनि  पासे पड़े  हैं। विस्वास में डूबे   कदम, ना कभी भी डगमगाये। तम निशा का चीरकर भी, प्रात वेला मुस्कराए। कर्म के सिद्धांत वादी , हस्तरेखा  कब  पढ़े हैं। स्वाभिमानी सिर लिये हैं  ,टोपियों की लाज रखते।  हर परिस्थिति में ढले है,सम विषम का स्वाद चखते। तरकशों में तीर लेकर, चक्षु  भेदन  को  अड़े   हैं। अनुगमन को दृष्टि   देगें, पथ गढ़े प्रस्तर हमारे। नैराश्य को सम्बल मिले,जो उसे अपलक निहारे। गतिशीलता के मर्म से,चोटियों पर ध्वज गढ़े हैं। रोकना मुश्किल बहुत है,यहां किसी अवरोध को। ज्वार मन मे उठ रहे हैं, अब नित्य नूतन शोध को। जीत का आधार रखने,स्वांस अंतिम तक लड़े हैं। मंजिलों तक पहुंचने के, स्वयं सृजित पथ हमारे। बैशाखियों ने कब दिए,आज तक हमको सहारे। सर्वस्व अर्पण कर गए  ,फ्रेम में आकर मढ़े हैं