आ गयो फागुन है

 रँगन के मौसम में अब तो ,चले न कऊ को जोर।

सारे गामन के हुय गए हैं,छोरे नन्दकिशोर।

आ गयो फागुन है।


बिना बात बलखाबै टांगे, देख देख पैजनियां ।

मस्ती में गरियाबै धरिके, सिर पे रखीं मटकियां।

माखन मिश्री धरी एक लंग,भयो भंग को जोर ।

आ गया फागुन है। (1)


सुघड़ सलोनी कोयलिया लखि, कागा सुर में गावै।

सुबह सांझ नैनन दे काजर,दो चक्कर करि आबै।

मुँह में पान दबायो मीठो,चन्दन को  तकें चकोर ।

आ गया फागुन है।  (2)


पिचके गालन तेल लगो के,सुरमा वारी आँखे।

प्रेम को मौसम खोले अपनी, नई पुरानी पाँखें।

घूँघट वारी कली देखकर, हैं बुड्ढे भाव विभोर।

आ गया फागुन है। (3)


रंग में  भींगी सभी  गोरियां, बस राधा हीं दीखें।

मौको पाकर मरजादा भी अपनी आँखें मीचें।

गारिन में भी रस टपके है, मनवा भाव विभोर 

आ गया फागुन है। (4)

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