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क्या कहतीं दो अखियां।

अभिव्यक्ति में मौन खड़ी है,शोध ग्रन्थ की भाषा। जाने कब तक पढ़ पाएंगे,हम इनकी  अभिलाषा। क्या कहती दो अँखियाँ। कभी गिरातीं कभी उठातीं,कभी शिखर पहुँचातीं। कभी  प्रेम का मान सरोवर,इठलातीं उतरातीं। गहराई  में उतर  सके  तो, पूरित   प्रेम  पिपासा। क्या कहती दो अँखियाँ। अन्यायों को सहन न करतीं,करतीं हैं प्रतिशोध। हर्षित  मुद्रा  में  स्वीकारें,  निर्बल का  अनुरोध। हाँ में  झपके ना  में अटके, देतीं कभी न झांसा। क्या कहतीं दो अँखियाँ। तिरस्कार के प्रति उत्तर में, उगल  रहीं   हैं आग। नेह वर्षण  में  प्रायः देखीं, मिलकर गातीं फाग। इंतजार में  ऐसे   लगता,  बरस  रहा  चौमासा। क्या कहतीं दो अँखिया। महारास  में पायीं जातीं, खुलकर नर्तन करतीं। लज्जा पर जब होता हमला,कुरुक्षेत्रों को रचतीं। आदि काल में रासो गाती, रीति काल में  आशा। क्या कहतीं दो अँखियाँ। चन्द्रमुखी से मृगनयनी तक,उपमा इनके कारण। रसातल में कहीं पहुंचायें , कर दें कहीं निवारण। और चकोरों की चितवन को, चन्दा द...

भूली बिसरी यादें

 *भूली बिसरी यादें* स्मृतियों के सघन वनों में,प्रियजन से मिलवादें। अधरों पर मधुरिम शब्दों की, मुस्कानें बिखरादें।  *भूली बिसरी यादें।*  कण कण में बिखरी यादों की,पावन कलाकृतियां। शुष्क मरुस्थल में मुस्काती, उपवन की कलियां। उस उपवन की सौंधी खुशबू,माटी में बिखरादें।  *भूली बिसरी यादें।*  घुँघरू  बाँधे निशा सुंदरी, पदचापों की आहट। बालकनी से विस्मित झांके,तन्द्रा की अकुलाहट। मन के आँगन में कुसुमों की,लड़ियाँ खूब सजादें।  *भूली बिसरी यादें।*  कलियों के यौवन पर भँवरे, करते हैं मनमानी। नादानी में प्रेम कहानी,लिखते हैं बचकानी। उन बचकानी बातों के कुछ, शिलालेख खुदवादें।  *भूली बिसरी यादें*  बीती बातों से सन्दर्भित, किस्से   कथा कहानी। संग्रहालय की चित्रावलि में,रख दी कहीं जवानी। उन जर्जर उजड़े भवनों को, ताजमहल बनवादें।  *भूली बिसरी यादें।*  नयन कोर में कहीं विराजित,है आभा पूनम की। गोविन्दम को अर्घ्य चढ़ाती, ये बूँदे शबनम की। पलकों रूपी मखमल चादर ,पथ में आज बिछादें।  *भूली बिसरी यादें।*  प्रेम सरोवर में उतराते, नित रातों क...

जय जय माँ अम्बे

*जय जय माँ अम्बे* श्रद्धा से घट स्थापना,अपनी करुण पुकार। वरदहस्त सिर पर रखो,हमको करो दुलार। जय जय माँ अम्बे । वृषभ पर  आरूढ़ हैं, ले 'कर' में त्रिशूल। शैल पुत्री धारण  करें, दूजे 'कर'  में फूल। योगीजन विकसित करें,चक्रीय मूलाधार। जय जय माँ अम्बे। जिनके वृत से फल मिले,तप त्याग वैराग्य। ब्रह्म चारिणी पूजकर , मिलता है सौभाग्य। दूजे दिन  की  साधना, करें सुखी   संसार। जय जय माँ अम्बे । सिंह सवारी  स्वर्ण रंग, अर्द्ध चंद्र है  माथ। तृतीय शक्ति आराधना,  दें जीवन में साथ। परम पदों के हित  रहे, आराधन  अधिकार।  जय जय माँ अम्बे। मन्द हंसी अधरों रखें, कूष्माण्डा का रूप। श्रद्धा से  चौथे दिवस, अर्चन वन्दन  धूप। सुख समृद्धि देकर करें,भवसागर से पार। जय जय माँ अम्बे। शुभ्र वर्ण कमलासिनी,जननी भगवन स्कंद। चित्तवृत्ति   रहती नहीं,  आराधन  से  मन्द। पंचम दिन की शुद्धि भी,  देती जग से तार। जय जय माँ अम्बे। कात्यायनि फलदायिनी,करें अलौकिक तेज। छठवें दिन आशीष को, अन्तस रखें सहेज। सर्वस्व  न्योछावर  ...