क्या कहतीं दो अखियां।

अभिव्यक्ति में मौन खड़ी है,शोध ग्रन्थ की भाषा।

जाने कब तक पढ़ पाएंगे,हम इनकी  अभिलाषा।

क्या कहती दो अँखियाँ।


कभी गिरातीं कभी उठातीं,कभी शिखर पहुँचातीं।

कभी  प्रेम का मान सरोवर,इठलातीं उतरातीं।

गहराई  में उतर  सके  तो, पूरित   प्रेम  पिपासा।

क्या कहती दो अँखियाँ।


अन्यायों को सहन न करतीं,करतीं हैं प्रतिशोध।

हर्षित  मुद्रा  में  स्वीकारें,  निर्बल का  अनुरोध।

हाँ में  झपके ना  में अटके, देतीं कभी न झांसा।

क्या कहतीं दो अँखियाँ।


तिरस्कार के प्रति उत्तर में, उगल  रहीं   हैं आग।

नेह वर्षण  में  प्रायः देखीं, मिलकर गातीं फाग।

इंतजार में  ऐसे   लगता,  बरस  रहा  चौमासा।

क्या कहतीं दो अँखिया।


महारास  में पायीं जातीं, खुलकर नर्तन करतीं।

लज्जा पर जब होता हमला,कुरुक्षेत्रों को रचतीं।

आदि काल में रासो गाती, रीति काल में  आशा।

क्या कहतीं दो अँखियाँ।


चन्द्रमुखी से मृगनयनी तक,उपमा इनके कारण।

रसातल में कहीं पहुंचायें , कर दें कहीं निवारण।

और चकोरों की चितवन को, चन्दा देत दिलाशा।

क्या कहतीं दो अँखियाँ।




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