ऋतुराज बसन्त
कामदेव के सुत आएं हैं,पतझड का दुख हरने।
बांध पैंजनी बसुधा मचली, उनका स्वागत करने।
सिर पर भावों की कलसी ले,अलसी नर्तन करती।
पीत वस्त्र में सजकर बैठी,सरसों आँहें भरती।
मदनदेव जी हुए अवतरित, तरुणी लगी सँवरने।
वातायन को गन्धित करते,सुर्ख गुलाबी पल्लव।
आम्रमंजरी पर मुग्धित है,धरती का हर अवयव।
बौराई अरहर की कलियां ,यौवन लगा निखरने।
पेड़ों की शाखायें गुंजित ,खगकुल के रागों से।
भृमरों के गुंजन में आती, अब सांसें बागों से।
गजराजों की उठी सूड़ लखि,कमल लगे हैं झरने।
कामशास्त्र में चर्चा वर्णित,सुवसन्तक उत्सव की।
प्रेम शास्त्र को पढ़ी गोपियां, सुनती कब उद्धव की।
पँचसरों के अभिसारण से,रति का आंगन भरने।
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