पंडित अटल बिहारी हैं
पीड़ाओं के अभिनन्दन में, जिसने बांह पसारी हैं। हिन्द देश का वे जननायक,पंडित अटल बिहारी हैं। विचलन अंदर अंदर जीते,और न मुख चिंतन रेखा। राष्ट्र धर्म ही सर्वोपरि था,एक दृष्टि से सबको देखा। भारत माता के चरणों की,आरति भव्य उतारी हैं। मॉन बिंदुओं की रक्षा कर,स्वाभिमान को जिंदा रखा। नीलकंठ बन सेवा करते,स्वाद सदा ही कड़वा चक्खा। अधिकारी का भाव न सीखा,सेवक और दरवारी हैं। गौरवदीप ग्वालियर के थे,भारत के थे रत्न अमोल। ओजस्वी वाणी के नायक,सुनें विरोधी करें किलोल। सत्यम शिवम सुंदरम के वे, रहते सदा पुजारी हैं। विध्यांचल से शिखर भले है,पर ममत्व का भाव लिए। फलदार वृक्ष की छाया जैसा,जीवन में अनुभाव जिये। दिव्य आत्मा को पाकर के ,हम सब भी आभारी हैं। भारत माता के आराधक , शब्दों के भी साधक हैं। मर्यादा के दिव्य पुंज है, संस्कृति के संवाहक है अपनी भाषा अपनी भूषा, सूरत खूब सँवारी हैं। मात्र अटलजी शब्द नहीं थे,बहु विषयों के शोधित ग्रन्थ। उनकी वाणी से मुखरित स्वर, रचते मानवता का पंथ। भारत माता के अनुरागी, मनुज नहीं अवतारी हैं।। शाखा में की सिद्ध साधना,सीखा राष्ट्रवाद का पाठ। मन में विश्व गु...