गीत संग्रह

 *गीत संग्रह* 


*वंदन बारम्बार* 

मात शारदा के चरणों में ,वंदन बारम्बार।

अल्प बुद्धि से कारक बनकुछ,कर पाऊं उद्धार।

मेरा नमन हजारों बार।

बुद्धि शून्य है  रिक्त पटल है।

लिखने को ये मन विव्हल है।

 तेरे दर पर ढूँढ़  रहा माँ ,

अब याचक बन इसका हल है।

सुप्त ह्रदय के तारों में कुछ,भरदो अब झनकार।

अवरुद्ध कंठ है शुष्क अधर।

घोर तमस के जंगल में घर।

आशा का मृग रहा खोजता

पर कस्तूरी मिले  किधर।

ममता के आँचल से खोलो,कुंडलियों के द्वार।

सकल विश्व ढूँढे सुख भौतिक।

उसमें अदृश्य प्रेम अलौकिक।

नैराश्य भाव के सघन तिमिर में

प्रकट करो मुरलीधर यौगिक।

भोग विलासी मन में भर दो,करुणा का संसार।

स्वार्थ सिद्ध से युक्तआचरण।

उसमें खोया प्रेम व्याकरण।

नयनों की कह रही पुतलियां,

इनका कैसे हटे आवरण।

विकृतियों के घोर तिमिर में,दो रसमय संसार।


देवतुल्य परिवार मिले


प्राणवंत हो सुप्त भावना,।

हो पूरण सब मनोकामना।

वाणी में अमृत घुलता हो।

बाँहो का हार मचलता हो।

अग्रज के सम्मुख हम नत हो।

आदर्शों में अध्ययनरत हों।

हो बीजारोपण ममता का।

जहाँ पाठ पढ़े सब समता का।

कर्मठता का मूल्यांकन हो।

हर योग यहाँ मणिकांचन हो।

घर घर मे तुलसी सेवा हो।

हर मूर्ति यहाँ सचदेवा हो।

जहाँ वेद ऋचाएं गुंजित हों।

आशीषों से अभिनन्दित हों।

घर प्रगतिशील कल्पना हो।

जीवन में नई अल्पना हो।

मुरली की तान बिखरती हो।

मंदिर घण्टा ध्वनि बजती हो।

जीवन का कोना कुसुमित,

रोज यहाँ त्योहार मिले।

संस्कृतियों के संरक्षण हित

देवतुल्य परिवार मिले।


सुरभित क्यारी सी गंध मिले।

उन सुमनों पर मकरन्द मिले।

उन पर भृमरों का गुंजन हो।

कली का अलि से अभिनन्दन हो।

जहाँ पक्षी करते होंकलरव। 

हो गन्ध गंध में हर अवयव।

खुशियां डूबी अभिलाषा हो।

समरसता की परिभाषा हो।

अतिथि भाव में सत्कार मिले।

सबको मुट्ठी भर प्यार मिले।

साधु संत सेवा में अर्पण।

दीन दुखी के लिए समर्पण।

स्वार्थ सिद्ध से मुक्त भावना।

प्रभु के प्रति आसक्त कामना।

मयूरा जैसा मन नृत्य करे।

खुशबू में डूबे कृत्य करें।

जहां प्रीत प्रेम की गागर हो।

वहाँ नेह स्नेह का सागर हो।

घर घर में प्रेम गंगा से,

अधरों पर रसधार मिले।

संस्कृतयों के संरक्षण हित

देवतुल्य परिवार मिले।


*क्या सम्भव जीवन* 


जब आँखों का पानी मरता,क्या सम्भव जीवन।

वसुधा पर प्राणों का संकट,रोता नील गगन।


एहसासों के अनल ताप कब,

 धड़कन बिन्दु छुएँ।

स्वांस स्वांस में प्राणवायु के,

होते बन्द कुँए।

नहीं मिल पाता पंचतत्व बिन, जीवन को ईंधन।


मृगतृष्णा के महानगर में,

मन के वृक्ष गिरें।

रिश्तों की पावन धरती पर,

तम के मेघ घिरें।

खंडहर नींव हुई इस तन की,शहर खड़े निर्जन।


गृहवाटिका के गमले में,

 उगती नागफनी।

सोच हमारी हुई कैक्टस, 

करती तनातनी।

रेगिस्तानी सम्बन्धों के,टूट रहे बन्धन।


नर्म गुलाबी पंखुड़ियों पर,

ओस नहीं मिलती।

कंटक के बंधन में उलझी,

कली नहीं खिलती।

घात लगाकर करते देखे,भँवरे भी दोहन।


 *कन्हैया आने वाला है* 

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माया मोह जकड़ के बैठा,

 टूटेंगा बन्धन

शेषनाग के फन पर आकर,

अब होगा नर्तन।

कन्हैया आने वाला है।


मन की सारी दुविधाओं का,

 निश्चित हल होगा।

तमस निशा के बाद स्वयं ही,

प्रमुदित कल होगा।

मद की बेड़ी तोड़ जाएगा,

मेघों का गर्जन।

कन्हैया आने वाला है।


कर्ण श्रवण को बाट जोहते,

मुरली अधरों की।

गोपी ग्वालिन को कब चिंता,

घर के पहरों की।

प्रेम सरोबर डूब नहाने,

आतुर नन्दन वन।

कन्हैया आने वाला है।


समरसता का पाठ पढ़ाये,

दधि माखन रोटी।

मिले पूतना स्वार्थ सिद्धि में,

कांप उठे बोटी।

रणछोड़ भले ही कहलाएं,

हारें कालयवन।

कन्हैया आने वाला है।


चौसर पर अब चल न सकेंगे,

शकुनी के पांसे।

स्वर्ण भाव के दाम बिके ना,

पर्त चढ़े कांसे।

बेबस अबला का ना होगा,

जग में चीर हरण। 

कन्हैया आने वाला है।


अखिल विश्व भी सीख सकेगा,

योग की मुद्राएं।

शांति पाठ के साथ  चक्र की,

सीखें सभी कलाएं।

शंख नाद संग गीता सुनने,

व्याकुल है अर्जुन।

 कन्हैया आने वाला है।

 

 *आजादी का विजय पर्व* 

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स्वालम्ब के कॉलर ऊँचे, जिस दिन हम कर पायें।

आजादी के विजय पर्व को, उस दिन खूब मनायें।

जनधन का ले खड़े कटोरा,

                  मनरेगा के होरी।

ललचायी आँखों से देखे,

               राशन बंटती बोरी।

कमल खिलें धनियां के मुख पर, किश्त सभी पट जायें।

आजादी के विजय पर्व को ------


मुस्काती सड़के जब पौंछे,

               फुटपाथों के आँसू।

छत के नीचे सम्बल पायें,

               जर्जर प्राण गिरासू।

उदित भास्कर झोपड़ियों में, किरणों को बिखरायें।

आजादी के विजय पर्व को-----


छाप अँगूठों के चंगुल में,

            आँसू रोती शिक्षा।

लिये कटोरा मेधा वृत्ति,

            मांग रही है भिक्षा।

आरक्षण के पृष्ठ ग्रन्थ से, जिस दिन भी फट जायें।

आजादी के विजय पर्व को------


जातिवाद और भाषा वाली,

            तंग बहुत है गलियां।

खिलने से पहले ही प्रतिदिन,        

                मुरझाती हैं कलियां।

देश धर्म की शाखों पर अब,समरस कुसुम खिलायें।

आजादी के विजय पर्व को------


तुष्टिकरण के शान्ति कबूतर,

                  वैमनस्य फैलाते।

जिस थाली में खाते रहते,

               छेद वहीं कर जाते।

इक समान ही सभी नागरिक, पंख यहां फैलायें।

आजादी के विजय पर्व को------


*कोरोना महामारी थी* 


धर्म कर्म का पाठ पढ़ाना,जिनकी जिम्मेदारी थी।

उस मरकज में पनप रही थी,करोना महामारी थी।

पूरा देशों घरों में  बैठा, 

                लाकडाउन के पालन में।

मरने को मौलाना को कहता,

                मस्जिद के ही आँगन में।

पूरा देश तबाह करने की, अजी विकट तैयारी थी।

उस मरकज़ में पनप रही थी,करोना महामारी थी।


जिन मुल्लों ने सेंध लगादी,

                       जीती हुई लड़ाई में।

उनको जिंदा तेल में फेकों,

                      भट्टी चढ़ी कढ़ाई में।

मुल्क हमेशा फँसा अधर में,जब जब की गद्दारी थी।

उस मरकज़ में पनप रही थी,करोना महामारी थी।


मौतों  के सौदागर  बैठे, 

                  इनके सभी मदरसों में।

कट्टरता की पौध उगाते,

                ये जमात  के जलसों में।

इनको अबतक क्यों नही ठोंका,ऐसी क्या लाचारी थी।

उस मरकज़ में पनप रही थी, करोना महामारी थी।


सौगात बाँटने वायरस की,

                मरकज के मुल्ले घूम रहे।

 कानूनों की उड़ा धज्जियाँ,

                     ये फतवों को चूम रहे।

चौराहों पर फाँसी दे दो,  जिनकी गलती भारी थी।

उस मरकज़ में पनप रही थी,करोना महामारी थी।


*आशा के दीप जलायें* 


घोर तिमिर के इस जंगल में,मंगल गीत सुनायें।

आशा के दीप जलायें।

शक्ति पुंज का उदघाटन है।

अपनी क्षमता का मापन है।

संयम धैर्य पराक्रम देता,

काल दूत को ये ज्ञापन है।

अंतर्निहित शक्तियों को हम, ये विस्वास दिलायें।

आशा के दीप जलायें।


क्रंदन वन में प्रेम जागरण।

सम्बल पाये यथा आचरण।

अकुलाहट को  भान कराये,

अनुभावों का मौन व्याकरण।

तीर्थधाम चौखट पर अपनी,नित अम्बर शीश झुकायें।

आशा के दीप जलायें।


प्रस्फुटन हो मौन शक्ति का।

नूतन जाग्रत नेह भक्ति का।

दूर क्षितिज तक खड़े शत्रु में

प्राकट्य हो उर आसक्ति का।

ज्योतिपुंज का देख प्रज्ज्वलन,रजनीकर भी सकुचायें।

आशा के दीप जलायें।


खड़गों  से सर्वत्र  विभाजन।

विवश भाव का है अनुपालन।

प्रेम अंकुरण  ही वसुधा  में,

प्रमुदित करते जीवन यापन।

दिव्य ज्योति के आल्हादन से,अन्तस का तमस मिटायें।

आशा के दीप जलायें।


*पुरानी यादें यार* 

आओ कुछ ताजा कर ले, पुरानी यादें यार।

कागज की फिर तैर उठें, पानी पर पतवार।


घर चौबारे धमा चौकड़ी,लुका छिपी के खेल।

और रबड़ की गेंद बनाकर,पीठ पे जाते झेल।

टुकुर टुकुर जब टेसू देखे, सकुचायी झेंझी,

प्रेम की बाती जल जाती थी,बिन बाती बिन तेल।

रोम रोम पुलकित हो जाता,जो खेले नदिया पार।


आँखे तो बस देख रहीं है,बौर लगी अमियाँ,

कुछ तो खुद हम खा जाते ,कुछ छीनें छमियाँ।

बालसखा तो अक्सर कुढ़कर, चुगली कर आता,

सिट्टी पिट्टी जब गुम होती, गरियाती धनियां।

कान पकड़कर हम दोनों जब,करते थे मनुहार।


बरफ चूसने  आ जाती थी,गलियों में टोली

चोरी चोरी अपने घर से, भर भर कर झोली।

कितनी बार पकड़ जाते थे,अक्सर दालानों में

जहाँ बैठकर चूस रही थी, मेरे संग भोली,

भूत प्रेम का भग जाता था,खा मम्मी की मार।

मम्मी की डंडी से भगता,चढ़ा प्रेम का ज्वार।


चढ़े टाँड़ पर खेत रखाने,मक्का की अड़ियां।

हाथों खिंची गुलेल देखकर,उड़ जाती चिडियाँ

उसी टांड़ पर जब रम जाता,कृष्ण राधिका रास,

कौए सूए देख खुश होते,मेरी गलबहियाँ।

बापू सोटा ले पिल जाते,सुनते नहीं पुकार।


पट्टी पर अंकित होते थे, सोने से अक्षर।

बारहखड़ी पहाड़ों में भी,थेअब्बल अक्सर।

लड़के और लड़कियोंके संग,इंटरवल में हम,

पीछे लगी नदी में कूदें,समझ तीर्थ पुष्कर।

लिए गुरुजी डंडाआयें,सुनकर चीख पुकार।


गीतिका


विपदाओं से कब हारे हैं।

मंजिल के बहुत किनारे हैं


दर्ज गवाही इतिहासों में,

रिपु के सम्मुख कब हारें हैं


जो  लहरों से  टकराते है,

उनको ही मिले किनारे हैं।


महाशक्ति ने विश्व गुरू के

अब देखो चरण पखारे हैं।


कोशिश लाख हजारों की हैं

जीते रवि से कब तारे हैं।


कारावास सो गया जाकर,

पृथ्वी पर कृष्ण पधारे हैं।


राजीव नयन में जो खटके

वे  निश्चित स्वर्ग सिधारे हैं।


*खोज रहीं हैं मेरी आँखें* 


तन मन  अपने रंग  रंग दे।

अधर सुधा रस  पिला भंग दे।  

वर्षों की इस अतृप्त धरा पर,

नयन नयन से मिटा जंग दे

इस होली पर ऐसा प्रियवर

खोज रही हैं मेरीआँखें।


अंग अंग पुलकित हो जाए।

छटा फागुनी प्रमुदित गाए।

बासन्ती परिधान पहनकर,

मौन तपस्वी जो  ललचाए।

इस होली पर ऐसा प्रियवर

खोज रहीं हैं मेरी आँखें।


देख देख उसके यौवन को।

विकसितकुसुमों के उपवन को।

गन्ध अलौकिक लेकर अपनी

महका  दे बसुधा आँगन को।

इस होली पर ऐसा प्रियवर

खोज रही हैं मेरी आँखें।


कलि का अलि से अभिनन्दन हो

मस्तक पर रोली चन्दन हो।

रोम रोम जो पुलकित करदे,

उस अभिलाषा का वंदन हो।

इस होली पर ऐसा प्रियवर

खोज रहीं हैं मेरी आँखें।


इस वसुंधरा  से अम्बर तक।

हिमचोटी उष्ण समंदर तक।

जिन हाथों का रंग रँग  दे ,

ईसा  कृष्ण  पैगम्बर  तक।

इस होली पर ऐसा प्रियवर

खोज रहीं हैं मेरी आँखें।


*यहीं भुलाकर चल* 


दुनिया के सब बैर भाव को,यहीं भुलाकर चल।

नफरत से कब देखा हमने,निकला कोई हल।


सूरज की किरणों से खुलती खगकुल की पाँखें।

चंदा और चकौरी की भी, चार हुई  आँखे।

नभमंडल की घटनाओं से,बनते पर्व अटल।


जल थल,नभ आकाश वायु का अद्भुत है ये मेल।

जिनसे सांसों का चलता है  ,जीवन भर  खेल।

अपने अपने कर्मो का ही,निश्चित मिलता फल।


काम क्रोध मद लोभ मोह में, फँसी हुई  दुनिया

मधुर थाप सुन थिरक रही है,सलमा और झुनिया।

अधरों पर मुस्कान खुशी में, दुःख में मिले विकल।


उपवन में कलियों पर देखों,भृमरों का गुंजन।

मधु पराग पर वक्र दृष्टि है,लगा आँख अंजन।

कस्तूरी को खोज न पाया, हिरन किसी जंगल।


*अपना गाँव अपना देश* 


स्मृतियों के पटल खोलकर ,खोज रहे हम वो परिवेश।

वो तो केवल स्वप्न बना है,अपना गांव अपना  देश।


हुड़दंग गली ,खलिहानों तक,दालानों  की कुछ  बातें।

प्रेम  सरोबर डूब नहाती, सभी पुरानी प्रतिघातें।

दादी माँ के कहानी किस्से,माँ की लोरी हरती क्लेश


गली गली में गुल्ली डंडा,उछल कूद कुछ पेडों पर।

चटनी के संग  रोटी वाला,करें कलेवा मेड़ों पर।

मिट्टी में सन जाते थे हम,मम्मी धोती मेरे केश।


जामुन की कुछ मीठी यादें, नदिया पार लगी अमिया।

सुरमा आंख लगाकर आई, बनी ठनी सलमा छमिया।

जलने वाला सखा हमारा ,दादा सम्मुख करता पेश।


हंसी खुशी थी संग संग में,मेल जोल त्योहारों पर।

मनमोर बना नर्तन करता, झूमे मस्त बहारों पर।

अगियाने पर कट जाते थे, ग्रामीणों के रंजिश द्वेष।


*कर रहें हैं वन्दना* 


अभिशप्त प्रस्तर में किया था,

                प्राण का नव संचरण।

उन पदों के आचरण से,

               उग उठा नव अंकुरण।

आदर्श के प्रतिमान की हम ,कर रहे हैं वन्दना।

कर रहें हैं वन्दना।


सहस्र अरि होते प्रकम्पित ,

           अवलोक भुजदंड बल।

         

चख मधुर फल हार जाते, 

              शबरी  का प्रेम निश्चल।

भीलनी के इस ज्ञान की हम, कर रहें हैं वन्दना।

कर रहें हैं वन्दना।


सलिल था बृहद पात्र में  ,

             विस्वास उस गांव का।

था धरा के मनुज हित में,

             प्राकट्य उस नाव का।

केवटों के सम्मान में हम ,कर रहे हैं वन्दना।

कर रहें हैं वन्दना।


ज्ञान था हैं पंख निर्बल,  

             गर्जना दस शीश को।

प्राण अंतिम प्रभु गोद में,

             पा गया आशीष  को।

वीर जटायु जान की हम, कर रहें है वन्दना।

कर रहें हैं वन्दना।


*फागुन की परिभाषा* 


गली -गली के कंकड़ बोले प्रेम परक परिभाषा।

साल के बारह महीने बोले फागुन की अभिलाषा।


झीलें पोखर गड्ढे खाली खुश है गाँव की नाली,

लाली लाली सों भई काली दे संग गाली ताली,

साली की तो हालत माली शांत हुई जिज्ञासा।

गली गली के---------------------- ----------।

         

सागर की रेती पर लहरें लिखे नाम को चूमें,

पाकर छुअन लिखे नाम की मस्त भरे झूमें,

तरह तरह के रंग बदन पर कैसे करें खुलासा।

गली गली के--–-–-------------------------------।


गाँव गाँव है नन्द गाँव और नगर नगर बरसाना,

नव दुल्हन को देख के बूढा मन ही मन हरषाना,

जाने अनजाने इसी बहाने रंग सों करें तमासा।

गली गली के---------------------------------------।


गालन गाल गुलाल देखकर है घायल पिचकारी,

पिचकारी से काजल गीला है पागल सिसकारी,

ये तन हो गया सरावोर पर मन रह गया प्यासा।

गली गली के-------------–-------------------------।


*हम उनको नमन करें* 


पंचतत्व  से  निर्मित  काया

सुन्दर तन मन जीवन पाया

रोम  रोम है  ऋणी  तुम्हारा

रग  रग में अस्तित्व समाया

वही सृजन के बीज आज तक, महक रहे हैं इस उपवन में।

हम उनको नमन करें।


जीवन की हर कला सिखायी,

दुनिया दारी  भी समझायी,

कदम हमारे बहक गये तो,

आगे बढ़ उंगली पकड़ायी।

कठिन परीक्षा के जीवन में, बड़ी  भूमिका संसोधन में।

हम उनको नमन करें।


कंधों  पर सब नगर  घुमाया,

मुश्किल पथ को सुगम बनाया

बालक मन ये रूठ न  जाये

घोडा बनकर तभी  खिलाया

डांट डपट के साथ साथ में,प्यार मिला था सम्बोधन में।

हम उनको नमन करें।


पीडाओं  को  हरने  वाले,

सब जिद पूरी करने वाले,

इस जीवन के आलेखन में

रंग  अनोखे  भरने वाले,

हमें सिखाया बात बात में,चूक न हो जीवन यापन में।

हम उनको  नमन करें।


*पी एम मोदी कहलाया* 


आस्तीन के साँपो को जब, दूध पिलाया जाता था

और बहत्तर सालो तक भी , माल खिलाया जाता था

सौर्य पराक्रम सेना का ,पद दलित कराया जाता था।

जन्नत वाली घाटी में बस,जहर उगाया जाता था।

केवल आतंकी भाषा का,जहाँ पाठ पढ़ाया जाता था।

भारत की पहचान तिरंगा,उसे जलाया जाता था।


गन्दी करतूतों का खेल ,जिसको रास नहीं आया ।

ऐसा क्रांतिवीर  भारत का, पीअम मोदी कहलाया।


सम्राट अशोक हुए भारत मे,ऐसा इतिहास पढा हमने।

पृथ्वीराज का चौड़ा सीना, और भाला खास पढ़ा हमने।

स्वामिभक्ति पर मिटने वाला, लक्ष्मण दास पढ़ा हमने।

अटल बिहारी बाजपेयी का, बस उल्लास पढा हमने।

शिखरों पर जो विजय पताका, करगिल द्रास पढा हमने।

और कालिया मर्दन के हित, फन पर रास पढ़ा हमने।


सरदार पटेल के सपनों को, जो पूरा कर दिखलाया।

ऐसा क्रांतिवीर भारत का, पी अम मोदी कहलाया।


केशर वाली घाटी में क्यों , नागफनी को उपजाये।

नौनिहाल  में पौधारोपण, जेहादी ही करवाये।

जिनके हित तैनात खड़े थे, उन पर पत्थर बरसाये।

उन्हीं विभाजक तत्वों को क्यों,बिरयानी को खिलवाये

राष्ट्रवाद से आँख मूदकर,  गद्दारों को पनपाये।

जिनको कब्रों में होना था, सिंघासन क्यों पकड़ाये।


चन्द्रगुप्त चाणक्य ने फिर सेआजादी को दिलवाया।

ऐसा क्रांतिवीर भारत का , पी अम मोदी कहलाया।


सोमवार था सावन का जब,तांडव नृत्य किया शिव ने।

सभी विपक्षी हमलों को भी,धारण कन्ठ किया शिव ने।

ज्वार देशभक्ति का उर में,अब तक मूक जिया शिव ने।

असुरों को उनके आसन पर,अब बैठाल दिया शिव ने।

काश्मीर की शपथ पूर्ण कर,तिरंगा थाम लिया शिव ने।

एक नपुंसक की भूलों  को,झटके में तार दिया शिव ने।


शीश मुकुट भारतमाता के, अपना झण्डा लहराया।

ऐसा क्रांतिवीर भारत का, पी अम मोदी कहलाया।।


*शीश चढ़ाने आया हूँ* 

मातृभूमि की बलिबेदी पर, शीश चढ़ाने आया हूँ

अरमानों की गठरी का, सर्वस्व लुटाने आया हूँ।


पाक तेरे नापाक इरादे ध्वस्त हमेशा हुए  यहाँ,

झूठे पाले सपने वो भी पस्त हमेशा हुए यहां,

गोली और बारूदी बम तो मेरे खेल खिलौनेहैं,

शेरोंकी शक्ति के सम्मुख गीदड़ बहुत ही बौने हैं,

धनुष बाण की टँकारें अभी बन्द हमारी नहीं हुई,

तलवारों की धार अभी तक कुंद हमारी नहीं हुई,

सुनते रोज धमाके जैसे मेरे कर्ण प्रिय संगीत,

हार हस्त रेखा से गायब मेरी यहाँसुनिश्चितजीत,


जिस भाषा को समझे वैसा पाठ पढ़ाने आया हूँ।

अरमानों की गठरी का सर्वस्व लुटाने आया हूँ। (1)


मैंने शत्रु नहीं समझा समझा माँ के दो बेटे,

मेरी बाँहो का खुला निमंत्रण फिर क्योंबाँहे समेटे,

दो नदियों के मिलन बिंदु से ही बनता है संगम,

शांति नहीं विनाश का कारण बन सकता है अणुबम

मेरे अन्तस् में तो केवल एक असहनीय पीड़ा है

लगता तूने अब तक केवल गलत उठाया वीणा है

गीता के उपदेशों में सौ गाली तक माफ किया

अगली गाली पर सिर को धड़ से साफ किया,


बड़े भाई की निभा भूमिका प्यार लुटाने आया हूँ।

अरमानों की गठरी का सर्वस्व लुटानेआया हूँ।(2)


सबक नहीं सीखा है तूने अब तक के इतिहास से

लगता गहन मित्रता हो गयी बेशर्मी परिहास से

टाइगर द्रास बर्फ चोटियां देती रोज गवाही है

विश्वासों का गला दबाकर मुँह की तूने खायीं है

नहीं उदाहरण अब तक ऐसा जिसको याद किया जाए

गन्दे कर्मी की गठरी को क्या पुरुस्कार दिया जाये

अनुजों की आंखों में अग्रज का सम्मान नही होगा

खुली चुनौती मानचित्र पर पाकिस्तान नहीं होगा


सोने की चिड़िया भारत को सिरमौर बनानेआया हूँ।

अरमानों की गठरी का सर्वस्व लुटाने आया हूँ।(3)

मातृभूमि की बलिबेदी पर शीश चढ़ाने आया हूँ।


*अद्भुत वह ध्रुवतारा था।* 

मुंशी प्रेम चन्द्र को समर्पित


जिसने   पीड़ा युग  लिक्खी, अद्भुत वह ध्रुवतारा था।

शोषित पीड़ित अभिलाषा का,अनुपम एक सहारा था।

अन्तर्मन से उसको दिखती,एड़ी फ़टी किसान की।

इसी लिए वे लिख पाये थे,पीड़ा सकल जहान की।

पद पैसा मर्यादा का भी,उसको तनिक न लोभ था।

गहरे मन तक दुख की गठरी, उसका भारी क्षोभ था।

चाटुकारिता शब्दों  में   कब , उसके हमने पायी है।

और सियासी चौखट पर कब, उसने कलम चलायी है।

विद्रोहों की भाषा केवल, उसके जेहन भायी थी।

सत्तासीनों  की गद्दी पर, जैसे आफ़त आयी थी।

मजदूर किसानों से हमदर्दी, और रियासत दुश्मन थी।

और न केवल बस इतनी सी,उनसे ऐसी अनबन थी।

गोदान गबन परिभाषा में,देश की हालत बोल गया।

अंग्रेजी प्रभुसत्ता का तो,  सिंघासन  ही डोल गया।

पीड़ाओं का कुशल चितेरा, शब्दों का बाजीगर था।

अंधकार में दिखलाने को, जीवन भर का दिनकर था।

साहित्य जगत का अटल सितारा,प्रातःकाल का उजियारा।

विषम परिस्थितियों में कब,   उसका लेखन था हारा।

साहित्य जगत के दिनकर का, हम सब पर अभी उधार है।

कलम   हमारी चुका रही है  ,करके  नमन हजार है।



 *अभिनन्दन होता है* 


मां के मस्तक पर जिनके रक्त से चन्दन होता है।

उनका युगों युगों तक यहाँ पर अभिनन्दन होता है

दशो दिशाएं मुस्कायीं

बागों की कलियां खिल आयीं

तितली के पंख खुले नभ में,

मधु पराग रस पी आयीं।

प्राची  से उगते दिनकर का नित प्रति वन्दन होता है।

हर सुमन खिला है घाटी का,

कण कण महका है माटी का,

स्वागत को उत्सुक वसुधा है

सिंह गर्जना  परिपाटी का

शेषनाग के फन पर आकर,जब जब नर्तन होता है


*दुश्मन को साफ करो* 

पुलवामा के शहीदों को समर्पित


रुधिर बहाया है शेरों का, केशर वाली माटी में।

चीख चीख मानवता रोयी,स्वर्ग सरीखी घाटी में।


जिनका यौवन को खिलना था उनकी कलियां मुरझाईं।

गहरे दुख में डूबा भारत , आंखे  आँसू भर लायीं।


 गणनायक दन्त शावकों के, मुख पर एक तमाचा है।

शेषनाग के फन पर आकर,आतंकी स्वर नाचा है।


अधरों से मुरली त्याग करो,उंगली चक्र चलानाहै।

वीर सपूतों की ललना को ,धीरज आज बंधाना है।


मातम के सागर में डूबा ,  उच्च स्वरों में गाता है।

पूजित वह जननायक होता ,काट शीश दस लाता है।


शंकर जी त्रिनेत्र खोलकर  तांडव सीमा पार करो।

दहशतगर्दी कमर तोड़ दो, भारत का उद्धार करो।


मांगों में सिंदूर नहीं है ,और धधकती ज्वाला है।

रक्षा सूत्रीय अरमानों को, बिल्कुल ही धो डाला है।


 आँसू छिपकर बैठ गए हैं ,नौनिहाल के बस्तों में ।

 बूढ़ों की लाठी टूट गयी , अंधकार के रस्तों में।


बहुत पतंगे उड़ा चुके हो ,और कबूतर छोड़ लिए।

नामर्दो ने घर में घुसकर , सारे बंकर तोड़ दिए।


बहुत लुटा ली है बिरियानी,आज तलक महमानो पर।

आज तलक ना जूँ रेंगा है, उनके बिल्कुल कानों पर।


ढांढस नहीं बंधा सकते हो,केवल कोरी बातों से।

भूत  हमेशा   ही माने हैं ,   लातों  वाले लातों से।


करोड़ सवा सौ की शक्ति है, आज आपके हाथों में।

बिल्कुल भी मत देर करो अब,करने को प्रतिघातों में।


सब्र का प्याला छलक चुका है,अब हमको तुम माफ करो।

या तो गद्दी  मोह छोड़  दो,या दुश्मन को साफ करो।


*सावन प्यासा रह जायेगा* 


गंगा उफनी उफनी यमुना

झीलों पर है यौवन दुगुना

उर का ज्वार चरम सीमापर

मेरे प्रियतम अब मत रुकना

नहीं मयूरा मन का नाचा,सावन प्यासा रह जायेगा।

वसुधा को कौन बचायेगा--------1


रिमझिम सावन की बौछार

यौवन बीच खड़ा मंझधार

अचरा तक सब भीग गये हैं

ऐसी अंसुवन  की है   धार

पीड़ा विकट मल्हारों की है,झूला को कौन झुलायेगा।

सावन प्यासा रह जायेगा------------2


रोज सवेरे कागा कहता

बिल्कुल भी ना नागा रहता

कर श्रृंगार खड़ी चौखटपर

फिर भी भाग्य अभागा रहता

अन्तस् भरा हिलोरों से है,तटबन्ध को बचायेगा।

सावन प्यासा रह जायेगा------------3


छायीं हैं घनघोर   घटायें

पिया मिलन की आस जगायें

कड़क कड़क कर कहें बिजलियां

सुप्त ह्र्दय में आग लगायें

बरस गयी चहुंओर बदरिया,बादल को कौनबुलायेगा।

सावन प्यासा रह जायेगा----------    4


तुम ही मक्का और मदीना

अब तेरे बिन क्या है जीना

शाकुन्तल ले खड़ी अंगूठी

भूल गया दुष्यंत नगीना

आमंत्रण है अंग अंग का,सौगन्ध को कौन निभायेगा

सावन प्यासा रह जाएगा-------5


गीतिका


भीड़ में रहते हुए अकेले हैं।

दिखते सब ही नये नवेले हैं।


किस से कहूँ अपने दर्द को,

समझे  वही जिसने झेले हैं।


खंजर भी उन्हीं के हाथों में,

जिनके साथ हमेशा खेले हैं।


गुरू बनने की सनक उनको,

जानती दुनिया,वे मेरे चेले हैं।


कब तक खुद्दारी से लड़ोगे,

हर तरफ बेईमानों के मेले हैं।


वो तो अखरोट निकले यार

मैंने समझा जिनको केले हैं।


हम खुद से नहीं कभी परेशां,

मेरे पीछे दुनिया के झमेले हैं।


*रोती गली गली* 


कुछ भँवरों की  शैतानी ने,मसली एक कली।

इसीलिए अब फूट फूट कर, रोती गली गली।


झीलें पोखर,नदियों तक के,आँसू सूख गए।

सहमे सहमे बाग बगीचे,  हँसना  भूल गए।

रो रोकर धरती अम्बर ने,अपनी आँख मली।


घर आँगन का एक खिलौना, सम्मुख टूट गया,

सहमे सहमे हर कोने का ,सपना  रूठ गया,

देखो कोयल भी कागा से,फिर से गयी छली।


चिड़ियों के कलरव में छाया, देखो सूनापन,

नन्ही परियों के  पँखों को , नोचें अपनापन,

घात लगी हो अंकुर पर जब,फूले नहीं फली।


झुकीं झुकीं तरुवर की डालें,करतीं रुदन मिलीं,

अंग भंग वालीं कलियां भी ,देखीं  कहाँ खिलीं,

मृतक कपोलों पर है अंकित, न बच पाये अली।


*हुए घर वाले परेशान* 


अलख सुबह से देर शाम तक,बस इंटरनेट पे ध्यान

हुए घर वाले परेशान....।

गुड़ मोर्निंग किस किसने भेजी,लिखा किसने सुप्रभात,

धन्यवाद सबको लिखना है,  पहुँचे नहीं कहीं आघात,

चाय का प्याला बड़ा दुखी है, हैं ठंडे उसके अरमान।

हुए घर वाले परेशान....।

लाइक कमेंटों से तय  होता  , है कितना ऊँचा  ग्राफ,

ज्यादा पाकर तनती देखी, जैसे गर्दन है जिर्राफ,

नहीं अपेक्षित जिस दिन मिलते, आजाते हैं हलक में प्राण।

हुए घर वाले परेशान...।

ट्विटर व्हाट्सएप और फेसबुक,आजमाया इंस्टाग्राम,

इसके चक्कर में छोड़ दिया, घी दूध काजू बादाम,

नाक चढ़ा चश्मा भी रूठा,आँख के नीचे पड़े निशान।

हुए घर वाले परेशान...।

कोई एकाउंट नहीं छोड़ा है,जहाँ नहीं पहुँचाया नाम,

मिला नहीं कहीं से धेला,छूट गये सबके सब काम,

कहीं अंगूठा आहा हा हा,लव वाला बस उसे निशान।

हुए घर वाले परेशान...।

आँख चुराकर घर वालों से , मैसेन्जर पर है चैटिंग,

खूबसूरत  पर  चौके छक्के , तारीफों की है  बैटिंग,

जो मनभावन प्यारा लगता,उसकी डी पी पर है ध्यान।

हुए घर वाले परेशान.....।


*प्रेम की फैले कैसे गन्ध।* 


पति पत्नी तक सिमट गए हैं रिश्ते और सम्बन्ध

प्रेम की फैले कैसे गन्ध।


हेलो हाय भी   मोबाइल   से     बापू बेटा कहते,

नहीं मिल पाते सप्ताह भर में एक ही घर में रहते,

भौतिकवादी चकाचौंध में , भूल गए अनुबंध।

प्रेम की फैले कैसे गन्ध।


अंग्रेजी संस्कृति ने जब से , घर में पैर पसारे,

मात्र शब्द दो अंकल आंटी खा गये रिश्ते सारे,

दादी माँ के कहानी किस्से,झेल रहे प्रतिबन्ध।

प्रेम की फैले कैसे गन्ध।


कभी पड़ौसी के घर में अब कहाँ पड़ते हैं पाँव,

हवा शहर की जब से लग गयी, रोते देखे गाँव,

प्रेम नदी में लगा लिये हैं नफरत के तटबंध।

प्रेम की फैले कैसे गन्ध।


*हम चंदा के गांव चलें* 


उपवन कुंज लताओं का , 

यौवन घिरी घटाओं का,

प्रेम राग से गूंज उठी,

कहना दसों दिशाओं का।

पाने पूनम की शीतलता ,हम चन्दा के गांव चले।

चाहे नन्गे पाँव चले।


मेहंदी महावर काजल का,

गजरा बेंदी पायल का,

घड़ियां तोड़ प्रतीक्षा की

एक निवेदन बादल का,

झीलों के उस पार कहीं हम घनी घनी सी छाँव चले।


अधरों नयनों के रण का

प्रेम पपीहों के गण का

क्रोंच मिलन की पीड़ा को

कहे पृष्ठ रामायण का

इंतजार की मुंडेरों पर ,हम बरसाती दाँव चले।


प्रेम दीवाने पनघट का 

प्यासा प्यासा हर मटका

बोले जमुना की डुबकी

महारास वंशीवट का

शांति संदेसे लिखने को हम वृन्दावन से ठाँव चले


*पाया हिंदी ने विस्तार।* 


अरुणोदय से अस्ताचल तक, झंकृत हैं वीणा के तार।

पाया हिंदी ने विस्तार।

साखी  सबद रमैनी सीखी,

 सूरदास के पद गाये।

जिव्हा पर मानस चौपाई, 

मीरा के भजन सुनाये।

कामायनि के अमर प्रणेता,आँखों मेआँसू की धार।

पाया हिन्दी ने विस्तार। 

रासो गाये चंदवर दायी,

नहीं चूकना तुम चौहान।

थाल सजाकरचला पूजने,

श्यामनारायण का आव्हान। 

खूब लड़ी मरदानीवाली,लक्ष्मीबाई  की तलवार।

पाया हिन्दी ने विस्तार।

नीर भरी दुख की बदली में,

 नीहार नीरजा  बातें।

तेज अलौकिक दिनकर से,

महकी उर्वशी की रातें।

जौहर के हित खड़ी हुई है,देखो पद्मावति तैयार।

पाया हिंदी ने विस्तार।

राम कीशक्ति कहेंनिराला,

इब्राहीम रसखान हुआ।

सतसई है गागर में सागर,

डुबकी मार सुजान हुआ।

देख दशा करुणाकर रोये,सुनी सुदामा करुण पुकार।

पाया हिंदी ने विस्तार।

मृग नयनी के नयन लजीले,

नगर वधू वैशाली से।

प्रिय प्रवास से राधा नाची,

दिए उलाहने आली से।

फ़टी पुरानी धोती में भी,धनिया के सोलह श्रृंगार।

पाया हिन्दी ने विस्तार।


*माँ मेरे आस पास* 


रोम रोम रोमांचित करता, साँसो का आभास।

माँ मेरे आस पास। माँ मेरे आस पास।


कृष्ण सरीखा रुप बनाकर, मस्तक काला टीका।

नजर टोटके सभी बचाती, सीखा कहाँ  सलीका

खुशियों में खेले लाल लड़ैता ,दूर रहें संत्रास।


रात शयन के समय लोरिया,प्रातः मंगल गाती।

रोज प्रार्थना शाम आरती, सब कुछही सिखलाती

उसकी शिक्षा के कारण ही, है संस्कार का वास।


फ़टी पेंट में बार बार ही, उसने पैबंद लगाये।

सारी अभिलाषा पूरण कर, नूतन पंख सजाये।

आँसू अंदर अंदर रोये,  चेहरा नहीं  उदास।


कलम बुदक्का और पट्टिका, सुबह सुबह चमकाती।

चटनी संग दो रोटी देकर, स्कूल छोड़ने जाती।

मन्दिर मांगे रोज मनौती, हो बेटा कुछ खास।


काला कौआ काट खायेगा, इससे भी समझाया

इसीलिये मैं आज तलक भी, झूठ बोल ना पाया।

उसके आचरणों को ही माना भजन आरती रास।


तुलसी नीम का काढ़ा पीकर, भागे सारे रोग

आटे वाले पुए आज तक, लगते छप्पन भोग।

ऐसी माँ के चरणों का मैं, सदा रहूँ मैं दास।



*भगवा ध्वज फहरेंगे अब* 


जो आँखों में अभिलाषा थी, उसको पंख मिलेंगे अब। 

 मंदिर राम विराजित होंगें,मन के पुष्प खिलेंगे अब।


वसुधा स्वागत को तत्पर है,ईंट नींव को पाने को।

बाँध पैजनियां नर्तन करके, प्रभु को खूब रिझाने को।

अन्तस् तक है लहर खुशी की,मंगल गायन करने को।

अपने आँचल में प्रभुभक्ति,पूर्ण रूप से भरने को।

जन जन के चरणों की रज ही,उसका रोली चंदन है।

दीपक थाली लिए सुशोभित, मर्यादा का वंदन है।

 पुण्य धरा का स्वागत करने,इंद्रदेव बरसेंगे अब।


लाख करोडों उम्मीदों का,ये स्थल अभिनन्दित है।

अनुनायियो की रक्त बूँद से ,पूजन स्थल वन्दित है।

मुक्ति पंथ में आराधन के,स्वप्न सँजोये चले गये।

वर्ण शंकरो की सन्तति से,कितने केवट छले गए।

जीवन कितने दफन हो गये, लिखने मुक्ति कहानी में

उनकी स्मृति शेष अभी है,सरयू तट के पानी में।

 कारसेवकों की अभिलाषा,प्रभु जी तृप्त करेंगे अब।


सरयू तट बसी अयोध्या,है प्रभु की अगवानी में।

मनोभाव का मंगल होगा,श्रद्धा की राजधानी में।

चार धाम अरु सप्तपुरी की,मिट्टी होगी ज्ञान की।

उस मिट्टी में आस्था होगी,पूरे हिंदुस्थान की। 

अंजनि पुत्र के सत्कर्मों की,मिली आज सौगात है।

घर में वन्दनवार सजाएँ,दीपों की जगमग रात है।

 उस मंदिर के शिखर शिखर पर,भगवा ध्वज फहरेंगे अब।


*हिंदुस्तान के आक्रोश की कविता*


विस्वासों का गला घोंटकर,

छुरा पीठ में भौंक दिया।

शांति वार्ता छोड़ अधर में,

देश समर में झौंक दिया।


घुप्प अंधेरे में घुस आना,

कायरता का परिचय है।

सोच समझकर चाल चली है

नही कोई ये अभिनय है


वार किया सोते सिंहों पर,

घोर घिनौनी चाल है।

किया निमन्त्रित खुद ही तुमने,

जगा दिया महाकाल है।


माँ  का दूध पिया होता तो,

ताल ठोंक कर आ जाते।

तो निश्चित अपनी कथनी का

पुरुस्कार को पा जाते।


बीस का बदला तैतालिस से,

ये तो ट्रेलर देखा है।

नरमुंडों से पट जाएगी, 

पूरी सीमा रेखा है।


 दूध छटी का  याद दिलाना

 ये तो अपनी फितरत है।

अभी तलक तो प्रेम दिखाया,

अब देखेगा नफरत है।


हम बासठ से बदल चुके हैं

इसको शायद भूल गया।

इसीलिये ये नादानी में,

मौत कुए में झूल गया।


विस्तारित सीमा करने को,

ड्रेगन ने इच्छा पाली।

और भयंकर भूलों से ही

मौत निमंत्रित कर डाली।


भरत वंश की मर्यादा के 

हिंदुस्तानी रक्षक हैं।

जिस के सिर पर काल विराजे

उसके हित हम तक्षक हैं।


शम्भू शिखर पर बैठ गए हैं

नेत्र तीसरा खोलकर।

जिनपिंग के पुरखे भी सुनलें

यहाँ करते हैं बोलकर।


सौ से ऊपर एक हुई तो

गाली सहन न करते हैं।

वंशी वाले हाथों में भी

 चक्र सुदर्शन रखते हैं।


*बाद में क्यों रोना*


जीवन के हर मोड़ पे देते,गुरुजन निशिदिन राय।

मिले सफलता निश्चित हमको,करलो सही उपाय।

बाद में क्यों रोना।

अनायास मत छुओ किसी को, मिले न वैरी हाथ।

सभी असम्भव सम्भव करलें, ना पकड़ें हम साथ।

मल मलकर हम हाथ रगड़ ले,

बाद में क्यों धोना।


जब दिखता हो सामने संकट,दो मीटर दूर रहें।

हैं दुर्गन्धों के घने कोहरे,उनको बाय कहें।

समय शेष रहते ही कर लें,बाद क्यों खोना।


खांसी खुल्लड और स्वास के, हैं जीवन के रोग।

घण्टे एक परिश्रम के संग, कुछ प्रणायामी योग।

उचित समय पर फसल ऊगालें, बाद में क्यों बोना।


विषम परिस्थिति पड़े न अपनी, कभी कुंद भी धार।

लोग हमारी बातें मानें, ज्यों ताज़ा अखबार।

शत प्रतिशत जीवन को जीलें, बाद में क्यों पोना।


*ये बिल्कुल नामुमकिन है* 


नभ के तारे टूट सकेंगे

ये बिल्कुल नामुमकिन है


प्रातःकाल से निशा काल तक,

गीतों में प्यार लिखेंगे।

स्नेह शून्य के इस मरुथल में,

नित नूतन पुष्प खिलेंगे।

आकांक्षा की झोली में हम,

चाँद सितारे भर देंगे।

ये बिल्कुल नामुमकिन है।


होठों पर मुस्कान सजाना,

धर्म रहेगा जीवन का।

बालों में गजरा महकेगा,

भाग्य जगेगा आँगन का।

झाड़ू पोंछा वर्तन सारे

सुबह शाम को चमकेंगे।  

ये बिल्कुल ना मुमकिन है।


आशाओं के स्वप्न पूर्ण कर,

          मैं सावन बरसा दूँगा

मन के तरुओं की हर डाली,

       कलियों से सरसा दूँगा

अटल सिन्धु की गहराई में,

हम घुसकर सीप चुनेंगे।

ये बिल्कुल नामुमकिन है।


मृगतृष्णा के बियाबान में,

 नहीं अकेला छोडूंगा।

वचन निभाने में जो बाधक,

उनके सिर भी फोडूंगा।

मुख मोड़कर प्रलय काल का

यमलोकी गति बदलेंगे।

ये बिल्कुल नामुमकिन है।



 *जब खंगाला हमने अपने,* 


जब खंगाला हमने अपने,       

         अनुबंधों के खातों को।

पृष्ठ पृष्ठ पर पाया केवल,

      घातों अरु प्रतिघातों को।


प्रथम पंक्ति में सदा खड़ा था,

          जीवन की हर मुश्किल में।

फिर भी फ़ांस नही निकली थी,

            फंसी हुई थी जो दिल में।

मेरा झुकना रास न आया,

       फिर भी पाया लातों को।- (1)


जहाँ जहाँ उनके कदम पड़े थे         

             खूब बिछाया फूलों को।

रिश्तों की खातिर तो हमने,

             छोड़ा सभी उसूलों को।

मात्र खिलौना ही समझा था,

           मेरे भी जज्बातों को। -(2)


पास फटकने नहीं दिया था,

             जीवन में अवरोधों को।

धारण कण्ठ किया था हमने,

          इस जग के प्रतिशोधों को।

नहीं धरातल दे पाये वो,

         मेरी कोमल बातों को। -(3)


जला दिया था सिय के कारण

         प्रतिबन्धों की लंका को।

भले पूँछ में आग लगी थी,

           निर्मूल किया शंका को।

अवध सो गई उनकी चिंता,

         निर्जन अपनी रातों को। - (4)


 *परमवीर आर्देशिर बुरजोर तारापोरे* 

एक कहानी बतलाता हूँ ,आर्देशिर बुरजोर की।।


तारा पोरे गांव  निवासी, वीर शिवाजी की धरती।

अरिमुंडों की रक्त पिपासा, तलवारें पूरण करती।

वीर शिवाजी की सेना में,उनके वंशज नायक थे।

शौर्य पराक्रम की भाषा के ,आजीवन ही गायक थे।

सौ गाँवो की मिली विरासत,सत्ता तारापोर की।


अगस्त अठारह उन्नीस तेईस,उनके आंगन पुष्प खिला।

मिली विरासत के कारण ही, तारा पोरे नाम मिला।

मैट्रिक तक पायी थी शिक्षा, महाराष्ट्र के पूना में,

साहस का परिचय था मिलता,उनके खेल नमूना में।

स्वर्णिम आभा रही दमकती, जैसे किरणें भोर की।

 

एक जनवरी वियालीस को,बन कमीशन्ड आफीसर।

हैदराबादी इन्फैंट्री में, वे आये थे पद पाकर।

मजबूत इरादों के स्वामी,मर मिटने का जज़्बा था।

बख्तरबंद रेजीमेण्ट पर,पाया जल्दी कब्जा था।

अरि दल में कंपन होता था,जब गर्जना घनघोर की।


वर्ष उन्नीस सौ पैंसठ में ,भीषण इक संग्राम हुआ।

फिल्लौरा पर हमला करके,चाविन्डा को तनिक छुआ।

तारा पोरे टुकड़ी लेकर,अग्र पंक्ति में खड़े हुए।

विजय श्री दिलवाने खातिर,सीना ताने अड़े हुए।

युद्ध क्षेत्र में भारी आहट,,गोली बारी शोर की।


आँखों की रक्तिम रेखा में ,रिपू  दलन संकेत है।

उसके सम्मुख जो भी आता,रहता वो ही खेत है।

घायल होने पर सिंह तो,खतरनाक हो जाता है।

तब उसके जबड़ों केवल ,अरि मुंड ही आता है।

तलवारें तो नर्तन करती,  जैसे हर्षित मोर की


खुद का रक्त बहा था लेकिन, मोर्चे पर वे डटेरहे।

उनके साहस के सम्मुख तो ,दुश्मन सारे बंटे रहे।

जब तक पहुंची नहीं टुकड़िया,अरि का हमला रोक दिया।

जिसने कोशिश की बढ़ने की,उसको सीधा ठोंक दिया।

साहस धैर्य चपलता संग,अरि शक्ति कमज़ोर की।


सुनियोजित षणयंत्र रचा था,हमला काफी भीषण था।

गोलीबारी मोर्टारों का,अरु तोपों का ये रण था।

आर्देशिर ने खुद साहस से,जब गोले बरसाए थे।

छक्के छुड़ा छुड़ाकर उसने,अरि तो मार भगाये थे।

नानी रण में याद दिलाई , पाकिस्तानी चोर की।


केवल नौ के बदले में,साठ टैंक तो ध्वस्त किये।

जस्सोरान पर कब्जा करके,सभी हौसले पस्त किये।

लेफ्टिनेंट कर्नल तो अपनी, जिम्मेदारी निभा  गए।

वीरगती से पहले अनुपम, नया इतिहास रचा गए।

सदियों तक गाथा गूँजेगी, ऐसे आत्मविभोर की।


वीर साहसी पौरुष की ये,अद्भुत अनुपम गाथा है।

उसी पराक्रम के कारण ही ,मां का ऊँचा माथा है।

परमवीरता के नायक पर ,हम सबको ही फख्र है।

उसी भारती शेर को मिलता,परमवीर भी चक्र है।

स्मृतियों में अंकित गाथा,ध्वज में बंधती डोर की।


बना रही है रील


जिम्मेदारी भाग भाग कर, बना रही है रील।

कालचक्र में उलझी दुनिया, होते रिश्ते सील।


गर्दन को लटकाएं देखें, बड़ा अजूबा यन्त्र।

जैसे इसमें मिल जाता है, जीवन का कुछ मन्त्र।

दांत निपोरे समझ रहे हैं, इसे बतासा खील।

कालचक्र-----


बलिबेदी पर संवेदन की,चढा रहें हैं भेंट।

अरमानों के फड़ पर आकर पत्ते रहें हैं फेंट।

लोकलाज के चौराहों पर, द्रोपदियों की डील।

कालचक्र-----


भजन आरती लगें उबाऊ,देख रहे अश्लील।

गोरी की आंखों में खोजे, मानसरोवर झील।

चौपाई में कब मिलती है,    डी जे  वाली फील।।

कालचक्र----


मोबाइल पर सुपरफास्ट है अंगुलियों के नर्तन।

नई रील हित पीट रहीं है, ग्रहदेवी जी वर्तन।

ब्रेकफास्ट का पता नहीं है, उपवासों पर मील।

कालचक्र----


देर रात तक चले जागरण, अलसाती है भोर।

सपनों में है मादक नर्तन,कहीं पपीहा मोर।

तुलसी के गमलों पर कब्जा, करते रोज करील।।

 कालचक्र--










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