अब कदम अपने बढ़े हैं।

 लक्ष्य का सन्धान करने,अब कदम अपने बढ़े हैं।

किंतु जीवटता लिए ही, अंगदों के सम खड़े  हैं।


मन अशंकित कर न पाई,संकटों की चोटियां भी।

भांपने में हैं निपुण हम,पथ बिछी जो गोटियाँ भी।

सत्य  सम्मुख हारते  हैं,जो शकुनि  पासे पड़े  हैं।


विस्वास में डूबे   कदम, ना कभी भी डगमगाये।

तम निशा का चीरकर भी, प्रात वेला मुस्कराए।

कर्म के सिद्धांत वादी , हस्तरेखा  कब  पढ़े हैं।


स्वाभिमानी सिर लिये हैं  ,टोपियों की लाज रखते।

 हर परिस्थिति में ढले है,सम विषम का स्वाद चखते।

तरकशों में तीर लेकर, चक्षु  भेदन  को  अड़े   हैं।


अनुगमन को दृष्टि   देगें, पथ गढ़े प्रस्तर हमारे।

नैराश्य को सम्बल मिले,जो उसे अपलक निहारे।

गतिशीलता के मर्म से,चोटियों पर ध्वज गढ़े हैं।


रोकना मुश्किल बहुत है,यहां किसी अवरोध को।

ज्वार मन मे उठ रहे हैं, अब नित्य नूतन शोध को।

जीत का आधार रखने,स्वांस अंतिम तक लड़े हैं।


मंजिलों तक पहुंचने के, स्वयं सृजित पथ हमारे।

बैशाखियों ने कब दिए,आज तक हमको सहारे।

सर्वस्व अर्पण कर गए  ,फ्रेम में आकर मढ़े हैं


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