वन्दन बारम्बार


मात शारदा के चरणों में ,वंदन बारम्बार।

अल्पबुद्धि से कारक बनकुछ,कर पाऊं उद्धार।

मेरा नमन हजारों बार।

बुद्धि शून्य है रिक्त पटल है।

लिखने को ये मन विव्हल है।

 तेरे दर पर ढूँढ़ रहा माँ ,

अब याचक बन इसका हल है।

सुप्त ह्रदय के तारों में कुछ,भरदो अब झनकार।

अवरुद्ध कंठ है शुष्क अधर।

घोर तमस के जंगल में घर।

आशा का मृग रहा खोजता

पर कस्तूरी मिले किधर।

ममता के आँचल से खोलो,कुंडलियों के द्वार।

सकल विश्व ढूँढे सुख भौतिक।

उसमें अदृश्य प्रेम अलौकिक।

नैराश्य भाव के सघन तिमिर में

प्रकट करो मुरलीधर यौगिक।

भोग विलासी मन में भर दो,करुणा का संसार।

स्वार्थ सिद्ध से युक्तआचरण।

उसमें खोया प्रेम व्याकरण।

नयनों की कह रही पुतलियां,

इनका कैसे हटे आवरण।

विकृतियों के घोर तिमिर में,दो रसमय संसार।

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