जय हो राजनीति की(व्यंग्य)
*जय हो राजनीति की*
"जीतेगा भई जीतेगा डमरू वाला जीतेगा।" के नारे गली में गूँज रहे थे । ढोल मृदंग की आवाज में नए नए नारे जन्म ले थे जिज्ञासा बढ़ी , मैं भी बाहर गया था ताकि ये भीड़ कहीं आकर मेरा गेट न पीटने लगे।
गेट बेचारा कई दिन से पिट रहा था, दीवारें पोस्टरों से पटी हुईं थी। ये भी था बादर आने का कारण कि कहीं दीवार और न लगा दें।
अनौखा प्रचार था जहाँ सभी समर्थकों के गले में माला थी, केवल एक व्यक्ति को छोड़कर, पहचानना कठिन हो रहा था आखिर इसमें प्रत्याशी कौन सा है? कोई परिचित भी नहीं दिख रहा था खूब ध्यान लगाकर देखा तो एक व्यक्ति कुछ परिचित सा लगा।
मैंने उसे रोकने की कोशिश की तो वह नज़रें चुराने लगा उसके सिर पर पार्टी की टोपी ,बगबगा कुर्ता पायजामा ,गले में उसी पार्टी का पटका , हाथ मे झंडा उठाये अपने प्रत्याशी की जय हो के गगनभेदी नारे।
मैंने उसे रोकने की कोशिश की किन्तु वह आगे बढ़ने लगा भीड़ में। इसलिए कहीं पोल न खुल जाये।
मैन पास जाकर रोका
"भाई बताओ तो सही आखिर आपके प्रत्याशी कौन से हैं?"
"यही जो सबसे आगे बिना माला वाले है।"
"सब के गले मे माला इनके गले में क्यों नहीं।"
" ये आम आदमी हैं जनता को सम्मान देते हैं स्वयं सादा ही रहते हैं।"
इतना कहते कहते आगे बढ़ने लगा।
मैंने उसका कुर्ता पकड़कर रोकने की कोशिश की क्योंकि वह कुछ दिखा दिखाया सा लग रहा था।
मरता क्या न करता ,अन्ततः वह ठिठक ही गया और दोनों हाथ जोड़कर -
"बाबू जी किसी को बताइये मत इधर उधर देखते हुए।"
"क्या न बताऊँ?"आवाज कुछ सुनी सुनाई सी लगी।
"यही की आप मुझे जानते हो!"
इस बार गौर से देखा यह वही अपना वंशी है जो मजदूरी करने आता था अब समझ में आया आखिर यह काम पर क्यों नहीं आ रहा।
"अरे वंशी तू कल तो टैक्टर चुनाव निशान वालों के साथ था परसों कार वालों के साथ आज डमरू वालों के साथ आखिर माजरा क्या है। और काम पर क्यों नहीं आ रहा है तू नेता बना घूम रहा है।"
भीड़ कुछ आगे निकल चुकी थी निश्चिंत होते हुए की अब कोई देख नहीं रहा , दोनो हाथ जोड़कर
"बाबूजी पापी पेट का सवाल है।"
"अरे वो तो मजदूरी करके भी भर जाता था।"
"अरे बाबूजी आप नहीं समझोगे आजकल सीजन चल रहा है
आपका काम तो चुनाव के बाद करना ही है।" बड़े भोलेपन से कहा वंशी ने।
"सीजन मतलब?" मैंने जिज्ञासु भाव से पूछा
"अरे बाबूजी आपसे क्या छिपाना तीन चार घण्टे के प्रचार में 500 रुपये मिल जाते हैं दोपहर का खाना भी फ्री।
शाम को किसी दूसरे रात को किसी तीसरे कहीं और। रात को दो घूँट मिल जाती है, सारी थकान उतर जाती है।"
"यानी प्रत्याशी से कोई मतलब नहीं।"मेरी जिज्ञासा और धन लगी।
"अरे बाबूजी, हमें प्रतयाशी से क्या लेना देना, कोई हमारा सगा थोड़े ही है।"
"मतलब सबको धोखा।"
"नहीं बाबूजी सबका ईमानदारी से प्रचार करता हूँ और जोर जोर से नारे लगाता हूँ, पर्चा बाँटता हूँ, यही तो काम है मेरा।"
आगे जोड़ते हुए-" मेरा तो यही नियम है बूढ़ा मरे या जवान मुझे बस रुपयों से काम।"
"वाह भई मान गए तुझे।"उसकी पीठ ठोंकते हुए।
"मेरे हिसाब से दो चार हजार कमा लेगा इस चुनाव में।"
"अरे छोड़ो भी बाबूजी आप भी बड़े भोले हो!"
पूरे शहर में 100 वार्ड हैं मैं एक दिन में तीन शिफ्ट करता हूँ। 15 दिन प्रचार के हैं लगभग 50 प्रत्याशी कवर हो जाते हैं
ईमानदारी से एक दिन में डेढ़ से दो हजार की पत्ती सीधी कुछ और गिड़गिड़ा लिये बच्चों के नाम पर तो ज्यादा भी , दोनों बार खाना और रात को दो घूँट और क्या चाहिए?"
"मतलब 15 दिन में 40 पैतालीस हजार।"
"हाँ बाबूजी ऊपर से पहनने को नए नए कुर्ते पायजामे साल भर का इंतजाम पूरा।"
"अरे वाह !"
"अरे बाबूजी आप नहीं जानते मैं हर चुनाव में यही करता हूँ। ये सब चोर हैं जीतने के बाद किसी के काम नहीं आएंगे अभी हम इनसे लूटते हैं बाद में पाँच साल ये हम सबको।"
"बाबूजी अभी हमें जाने दो अन्यथा पैसे नहीं मिलेंगे अभी हमारे धंधे का टाइम है।"
"अरे हाँ ये तो मैं जानता ही नहीं, अच्छा जा अपना धंधा देख।"
हाथ हिलते हुए
" बाबूजी आज तो वोट डमरू पर ही । कल क्या होगा वो कल के रेट बताएंगे ,जो ज्यादा देगा उसी को जिताएंगे।"
मैं खड़ा- खड़ा सोचता ही रहा आखिर पढ़ लिखकर क्या कर पाया मुझसे तो ज्यादा आज की राजनीति का ज्ञान वंशी को है।
जय हो राजनीति की।
डॉ राजीव पाण्डेय
9990650570
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