राणा प्रताप के भाले की


महाराणा प्रताप के शौर्य को नमन।


सौंगन्ध आज हम लेते हैं,  राणा  प्रताप के भाले की।

बनी घास के तिनकों से थी,उस रोटी और निवाले की।


इतिहासों के पृष्ठों में भी, बस मुग़ल कथा को गाया है।

सच्चाई को जनमानस से,अब तक ही गया छिपाया है।

दबे हुए हैं  स्वाभिमान के, किस्से   इस पावन माटी में,

उस शौर्य कथा को लिखने का,अब फिर से अवसर आया है।

आज जरूरत उन पन्नो को, है सचमुच सही उजाले की।

सौंगन्ध आज हम लेते हैं,  राणा  प्रताप के भाले की।

बनी घास के तिनकों से थी,उस रोटी और निवाले की।


भारी सेना के सम्मुख भी, वह चेतक लेकर अड़ा रहा।

युद्ध क्षेत्र में घमासान था, दोनों सेना का रुधिर बहा।

तलवारों ने रक्त चढ़ाया, युद्ध भूमि में रणचण्डी को ,

फिर भी  घाटी में राणा को ,क्योंनहीं  विजेता गया कहा।

रोम रोम रोमांचित करती, वो अमर कहानी नाले की।

सौंगन्ध आज हम लेते हैं,  राणा  प्रताप के भाले की।

बनी घास के तिनकों से थी,उस रोटी और निवाले की।


चाटुकारिता में अकबर की, जिस जिस ने कलम चलाई थी।

महिमा मण्डित करने को भी, कलमों ने  रिश्वत पायीं थी।

वही कसीन्दे शिलालेख पर, फिर खूब शान से लिखवाकर,।

जानबूझकर अपनी सन्तति , फिर कायर खूब बनाई थी।

एन सी आर टी ने समझी , अब वहीं जरूरत ताले की।

सौंगन्ध आज हम लेते हैं,  राणा  प्रताप के भाले की।

बनी घास के तिनकों से थी,उस रोटी और निवाले की।


हल्दी घाटी की माटी का ,  जिसका पावन कण पीला था

रक्त पिपासु तलवारों ने, अरि  नरमुंडों को लीला था।

खमनोर बलीचा ग्राम मध्य , मैदान हुआ इक रक्त तलाई , 

देशभक्ति का सिर पर धारण, वह बाना बड़ा रंगीला था।

जिसमे लिक्खीं अमर कथाएं , है भाले और दुनाले की।

सौंगन्ध आज हम लेते हैं,  राणा  प्रताप के भाले की।

बनी घास के तिनकों से थी,उस रोटी और निवाले की।


उस माटी का दर्शन करना,हर देश भक्त का सपना है।

करने को निर्माण पीढियां,उस क्रांति मन्त्र को जपना है।

शीश चढाना मातृभूमि पर, राष्ट्र धर्म की जिम्मेदारी,

अर्घ्य चढाने की परिपाटी, हमको भट्टी में तपना है।

धर्म  निभाकर भामाशा ने, सब  पूंजी तभी हवाले की।

सौंगन्ध आज हम लेते हैं,  राणा  प्रताप के भाले की।

बनी घास के तिनकों से थी,उस रोटी और निवाले की।




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