करवा चौथ के दोहे
एक नगर में सेठ के, बेटे थे कुल सात।
इकलौती बेटी मिली, बहुत बड़ी सौगात।
सातों भाई बहिन से,करते अतुलित प्यार।
उसकी चिंता में रहें, घड़ी घड़ी तैयार।
उत्सव करवा चौथ का,घर भर में उल्लास।
माता भाभी संग में, बेटी का व्रत खास।
खाना खाने सायं को, बैठे भाई सात।
तभी बहिन का ख्यालकर,जाग उठे जज्बात।
भूखी बहिना देखकर ,खाने का अनुरोध।
किंतु बहिन के धर्म का ,था थोड़ा सा बोध।
बिन बहिना के था नहीं,भोजन भी स्वीकार।
इसी लिये वे खोजने, चले एक उपचार।
छोटे भाई का सदा,चलता तेज दिमाग।
पूरी करने योजना , लेता हाथ चिराग।
जलता दीपक रख दिया,किसी वृक्ष की ओट।
यद्यपि मन में थी नहीं, कहीं किसी के खोट।
दीपक छलनी ओट में, लगे चाँद साक्षात।
आकर बहिना से कहें समझाकर यह बात।
अर्घ्य चढ़ाने को हुई, जब बहिना तैयार।
कहे भाभियों से ननद, आओ जल्दी द्वार।
तब भाभी ने दी बता , भइयों की करतूत।
चाँद निकलने का यहाँ, दिखता नहीं सबूत।
भोली बहिना ने किया , भइयों का विश्वास।
अर्घ्य चढ़ाकर खुश दिखी,उत्सव बनता खास।
अर्घ्य चढ़ाकर ज्यों लिया, एक निवाला खाय।
अपसकुन के प्रभाव से,छींक छींक अकुलाय।
अन्य निवाले का असर,गया कंठ में बाल।
तभी तीसरे कौर से, आया पति का काल।
रो रो कर के हो गया, उसका खस्ता हाल।
बता भाभियाँ सच रहीं, क्यों आया यह काल।
भ्रात प्रेम में हो गया,व्रत का गलत विधान।
कुपित देवता ने लिए, तेरे पति के प्राण।
अब करवा ने ले लिया, निर्णय बड़ा कठोर।
पति के जीवनदान को,लगना पूरा जोर।
एक वर्ष तक ना किया,तब अंतिम संस्कार।
सभी चतुर्थी व्रत रही, करने पति उद्धार।
पति के शव पर थी उगी,एक साल तक घास।
घोर आपदा भी नहीं, डिगा सकी विश्वास।
कार्तिक कृष्ण चौथ को , होता पूरा साल।
विधि विधान से वृत किया,नहीं हुई बेहाल।
उसके तप से खुश हुए, करवा और गणेश।
उसके पति को दे दिया,आशिष बड़ा विशेष।
पति को जीवित देखकर, प्रकट किया आभार।
कठिन तपस्या से मिला, उसको वापिस प्यार।
उसी दिवस से आज तक,मनता है यह पर्व।
सौ वर्षों तक पति जिये, जो है उसका गर्व।
महिला के सौभाग्य का,कितना पावन कथ्य।
शब्दों में आबद्ध कर , राजीव चले नेपथ्य।
डॉ राजीव कुमार पाण्डेय
वेवसिटी, गाजियाबाद(उत्तर प्रदेश)
मोबाइल-9990650570
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