बन्धन से आज़ाद(कहानी)


कभी कभी आइना भी हमारे अंदर की जिज्ञासा को पंख प्रदान कर देता है।चेहरे की लालिमा, निखरा हुआ रूप, कुछ लटकटी हुई लटें और अधरों की मुस्कराहट चट्टानों के सीने में हलचल पैदा करने के लिये पर्याप्त होते हैं।पैरों की पाजेब में  तो तपस्वियों के ईमान भंग करने की क्षमता भला फिर आम आदमी की क्या औकात।

ऐसे ही रूप लावण्य की स्वामिनी अनुभूति आईने के सम्मुख खड़ी  अपने अतीत में चली जाती है और वह पृष्ठ पढ़ने लगती है जो उसके शोध कार्य के समय का है।

प्रोफेसर डॉ व्यथित अपनी लेखनी  के लिए जग मशहूर  थे  अपना ईमान डिगने से नहीं रोक पा रहे थे जब उनकी ऑफिस में एक सुंदरी अर्थात शोध की छात्रा ने उनके कमरे में आने की अनुमति माँगी।

"अरे तुमसे हजार बार कहा है कि मेरे आफिस में आने के लिए अनुमति की आवश्यकता नहीं है तुम मेरी प्रिय विद्यार्थियों में से एक हो।"

डॉ व्यथित ने अनुभूति के  रूप लावण्य को एकटक निहारते हुए कहा।

यद्यपि इस प्रकार की टिप्पणी अनुभूति के लिए पहली बार थी फिर भी इसका बुरा नहीं माना गुरुदेव का आशीर्वाद समझकर खुश हो ली।

जब कोई लड़की पहली बार किसी की टिप्पणी सहन करले तो निश्चित रूप से  सामने वाले की हिम्मत बढ़ जाती है।

"जी गुरुदेव जैसी आज्ञा आपकी।" इतना कहकर अंदर दाखिल हो गयी उनके घर के आवास में बने उनके ऑफिस में।

"अरे अरे खड़ी क्यों हों बैठो न।"

"जी।" कहते हुए कुर्सी खींचकर बैठ गयी ।

अपने शोध पर किये गए कार्य की फाइल आगे बढाते हुए-

"सर सारा काम पूरा ही चुका है एक बार आप देख लीजिए कुछ कमी हो तो बता दीजिए नहीं तो टाइप करा के सबमिट करने के लिये तैयार करालूँ।"

"अरे तुमने किया है अच्छा ही किया होगा तुम प्रतिभाशाली हो सर्वगुण सम्पन्न हो। तुम्हारे कार्य से हम हमेशा खुश रहते हैं।"

इस प्रकार का अतिरिक्त स्नेह आज गुरुदेव क्यों उड़ेल रहे थे। समझ से परे था अनुभूति के।

अपनी कुर्सी से उठते हुए उसके निकट आकर उसके कंधो पर दोनों हाथ रखते हुए-

"आज अपनी फाइल को यहीं छोड़ दो कल आकर ले जाना कुछ होगा तो मैं करेक्शन कर दूँगा।"

इतना ही कह पाये थे डॉ व्यथित ,अनुभूति अपनी कुर्सी से खड़ी हो गयी उसे अपने कंधों पर रखे हाथ  और उनकी हरकत कुछ अजीब सी लगी। लेकिन अपने अंदर के भय को छिपाती हुए

"सर आज मैं चलती हूँ। कल आकर फाइल ले लूँगी।"

हाथ नीचे सरकते हुए कमर तक आ गए थे। अनुभूति एक दम अलग हो गयी । उसे अटपटा से लगा।

गुरुदेव की आज्ञा लेकर अपने घर को चल दी।

विस्तर पर निमग्न पड़ी सोच रही थी जिन्हें मैं अपना आदर्श गुरुदेव  मानती है  आखिर  वो ऐसी हरकत कैसे कर सकते हैं। रात भर आँखों से नींद गायब रही।

शहर में किराए पर एक कमरा ले  रखा था केवल पी एच डी की पढ़ाई करने के लिये।

 कुछ महीनों पहले उसका पति राहुल अपनी दोनों बेटियों को भी छोड़ गया था यह कहकर अब इन्हें अपने पास ही रखो मुझे आज से तुम्हारा हमसे  कोई वास्ता नहीं। तुम्हारी पी एच डी तुम्हें मुबारक। और ये रहे तलाक नामे के कागज । अब तुम बन्धन से मुक्त हो जो चाहे सो करो।"

अनुभूति ने कुछ नहीं कहा था यह सोचकर कि कुछ दिनों में थीसिस सबमिट हो जाएगी तब मना लेगी। राहुल को और उसके परिवार को। यद्यपि यह बहुत कठिन भी था क्योंकि उनका पूरा घर उसकी पी एच डी करने के खिलाफ जो था। लेकिन अनुभूति का जुनून ही था आगे पढ़ाई करने का ।

उसके अपने सपने थे उन्हें पूरा करने की जिद थी तभी अपना गाँव छोड़कर शहर में आकर पी एच डी कर रही थी।

डॉ व्यथित का इकलौता बेटा प्रबोध बहुत होशियार था उसकी भी एम बी ए कम्प्लीट हो चुकी थी  । नोयडा में किसी विदेशी कम्पनी में अच्छी जॉब भी कर रहा था। आज रविवार होने के कारण घर पर ही था। अपने पिता की आँखों  का तारा था। वह बहुत आज्ञाकारी था। माँ कुछ अस्वस्थ रहती थीं इसलिए घर के कार्य अक्सर छुट्टी वाले दिन संभाल लिया करता था।

डॉ व्यथित अपने कमरे में चहल कदमी कर रहे थे, अपने नाम के अनुरूप कुछ व्यथित भी थे। कभी हाथों को रगड़ते कभी सिर खुजलाते।

बाहर से आवाज आई 

"क्या मैं अन्दर आ सकती हूँ।"

यह चिर परिचित आवाज थी जिसका जिसकी प्रतीक्षा में कमरे में चहल कदमी हो रही थी। 

"अरे अनुभूति तुम!  तुम्हारा ही इंतजार कर रहा था। तुम्हारे बिना आज मन नहीं लग रहा था। आ गयी, आओ बैठो आज हमारे पास बैठो।" उसकी कुर्सी को अपनी तरफ खीचते हुए।

अनुभूति को समझते हुए देर नहीं लगी आखिर गुरुदेव के मन में क्या चल रहा है। उसने सुन रखा था अक्सर गाइड शोषण करते हैं। लेकिन डॉ व्यथित के बारे में बहुत जानकारी ली थी। सभी ने अच्छे चरित्र के बारे में ही बताया था। आज ये भी ऐसे ही निकले।

थोड़ी सावधान हो गयी किसी आभासी खतरे के लिये।

डॉ व्यथित आज बड़े रसिक मिजाज हो रहे थे

"देखो अनुभूति तुम बहुत सुंदर हो तुम्हारा रूप लावण्य किसी को भी डिगा सकता है आखिर हम तो इंसान ही ठहरे। आज क्यों न गुरुदक्षिणा में भ्रमर बनकर तुम जैसी कली का रास्वादन कर लिया जाए।"

"गुरुदेव मैं आपका बहुत आदर करती हूँ। आपके लिये मेरे मन मे श्रद्धा है। उसे मत डिगने दीजिये।"

गुरुदेव पर तो आज कुछ अलग ही भूत सवार था।जबरदस्ती हाथ पकड़ते हुए 

"क्या बचपना है, समझ से काम लो तुम्हें थीसिस सबमिट नहीं करनी है क्या?"

गुरूदेव ने अपना ब्रह्मास्त्र फेंक दिया।

हाथ झटकते हुए अनुभूति ने कहा

 "गुरुदेव मैं भूल जाऊंगी आप मेरे गाइड हैं। अपनी पी एच डी छोड़ सकती हूँ पर ये कभी नहीं।" कहते हुए कमरे से बाहर निकली। कमरे के बाहर प्रबोध ट्रे में चाय लेकर खड़ा था इसलिए आज सन्डे में पापा से कोई मिलने आया है। तो चाय पिला दी जाये।लेकिन अंदर के वार्तालाप ने उसे हिलाकर रख दिया जिसे अपने पापा पर बहुत गर्व था आज उनकी सारी बातें सुनकर उसका भी सिर शर्म से झुक गया था।

गेट से बाहर निकलते हुए अनुभूति की नजरें एक बार प्रबोध से टकरायीं और यह जानकर इसने सब सुना है इसी शर्म में बिना कुछ कहे सिर नीचा किये हुए अपने कमरे पर चलती बनी। यद्यपि कई बार मिल चुकी थी उससे अच्छी दोस्ती भी हो चुकी थी लेकिन आज बिना कुछ कहे निकल चुकी थी।

इधर प्रबोध को कुछ हमदर्दी होने लगी अनुभूति से।

वह अपना स्कूटर  लेकर चल दिया उसके  ऑटो का पीछा करते हुए। अनुभूति अनभिज्ञ थी। जब वह अपने कमरे पर पहुँची तो अंदर कमरा बन्द करके चरपाई पर लेट गई और सुबकने लगी। 

बाहर से कमरा खटखटाया प्रबोध ने ।

अपने आँसू पौंछते हुए। कमरा खोला तो द्वार पर खड़े प्रबोध को देखकर 

"बाप घर पर किसी लड़की के साथ जबरदस्ती करता है उसका बेटा उसके घर तक पीछा करे यही है चरित्र तुम दोनों का।"

गुस्से में आग बबूला होते हुए और भी भड़ास निकाल ली प्रबोध पर। 

प्रबोध ने बिल्कुल बुरा नहीं माना क्योंकि उससे मित्रता जो थी। 

"क्या अंदर आने को नहीं बोलेगी आज?नाराज अपने गुरुदेव से हो मुझसे तो नहीं।"

आओ आओ अन्दर बैठने का संकेत करते हुए कुर्सी की तरफ

"बताओ क्या कहना चाहते हो प्रबोध? पिताजी के  बारे में कुछ सफाई देने की आवश्यकता नही है।"

"नहीं उनकी तरफ से कोई सफाई  नहीं दूँगा उसे देखकर तो मैं भी हैरान हूँ मेरा मन भी विचलित  हो रहा है और शर्मिन्दा हूँ उनके कृत्य पर।"

" फिर क्या कहना चाहते हो?"

पिछले तीन साल से हम एक दूसरे को जानते हैं । एक दूसरे को समझते भी हैं। क्यों न इस समझदारी को आगे बढ़ाया जाए।"

"क्या मतलब मैं समझी नहीं ?"

"देखो अन्नू मैं बहुत दिन से एक बात कहना चाह रहा था आज हिम्मत जुटा कर कह रहा हूँ। मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ और तुमसे शादी करना चाहता हूँ।" हिम्मत बटोरकर कह ही  दी  आखिर अपने दिल की बात। कुछ दिनों में अपने पापा से ये बात करने वाला था लेकिन परिस्थितियों ने आज कहने को मजबूर कर दिया।

अनुभूति निशब्द थी। वह भी उसे बहुत चाहती थी लेकिन कुछ सामाजिक बेड़ियाँ उसके पांवों में पड़ीं थी इसलिए इतना ही उत्तर दे पायी।

"देखो प्रबोध पागल मत बनो तुम्हें कोई न कोई न लड़की मिल जाएगी। मैं नहीं कर सकती मेरी भी कुछ मजबूरियां है। मैं तुम्हारे योग्य नहीं हूँ। " कहकर शांत हो गयी।

"आखिर ऐसी कौन सी मजबूरियां हैं मैं भी तो सुनूँ?" प्रबोध ने उसका हाथ पकड़ते हुए कहा।

अनुभूति ने लाख समझाया लेकिन प्रबोध मानने को तैयार नहीं था। थककर इतना ही कहा चलो अपनी आँखों से देख लो मेरी मजबूरी उसका हाथ पकड़ते हुए उसे अंदर कमरे में ले गयी। चारपाई पर सोते हुए दोनों बेटियों की तरफ इशारा करते हुए 

"मैं दो बच्चों की माँ हूँ।मेरी यह मजबूरी है और उनके प्रति जिम्मेदारी भी। इसलिए मैं यह शादी नहीं कर सकती। "

सुनकर बिल्कुल भी कोई अंतर नहीं पड़ा।

"तो क्या हुआ अब भी मैं तुम्हें उतना ही प्यार करता हूँ जितना पहले करता था। रही बात इन बच्चों की तो यह मुझे पहले से ही मालूम है पिछले सप्ताह तुम्हारी डायरी में सब पढ़ लिया था। मैंने तुम्हारी आत्मा से प्यार किया है।"

"इन बच्चों को अपना सकोगे?"

"जी बिल्कुल आज से इन्हें  मैं अपना नाम दूँगा। और भविष्य में कोई दूसरा बच्चा भी पैदा नहीं करूँगा ये मेरी प्रतिज्ञा है।"

दोनों एक दूसरे के गले लग गए जैसे कई जन्मों के  बिछुड़े अब मिले हो।

एक दूसरे से अलग होते हुए। अनुभूति ने अलमारी में रखे कुछ पेपर निकाले और उन पर हस्ताक्षर करने लगी।

"यह क्या हैअन्नू?"

यह हमारा बन्धन है जो मेरे पैरों को जकड़े  हैं।"

"मतलब।" आश्चर्यचकित होते हुए पूछा।

अपनी तलाकनामे पर हस्ताक्षर ! जो पिछले महीने मेरा आदमी मुझे सौंप गया था और हो जाती हूँ बन्धन से आज़ाद।


डॉ राजीव पाण्डेय 

मोबाइल-9990650570

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