साइकिल का भूत(कहानी)


लक्ज़री कार में सवार युवक प्रसन्नचित होकर यही सोचता है कि हवा में विचरण कर रहा हूँ, मोटर ट्रक वाले भी यही सोचकर मुदित होते हैं कि मेरे उपयोग के लिये ही इस सड़क का निर्माण कराया गया है।

वायुयान वाले तो साक्षात सातवें आसमान में होते ही हैं। उड़ान भरते समय उनके मन में यही कल्पना होती है कि संसार में दूसरा व्यक्ति  मेरे समान नहीं है।

ठीक मेरी भी मनःस्थिति एक बार हुई जब मैंने किसी प्रकार से मित्रों के सहयोग से खरीदी एक पुरानी साइकिल पूरे बारह सौ पचास की। मित्रों का सहयोग इसलिए क्योंकि तब कोई ई एम आई का सिस्टम नहीं था।

 साइकिल के पहिये चलने के बाद रुकने का नाम न लेते थे और गद्दी की हालत ऐसी चरमरा रही थी पता नहीं कितने लोग इसका आनन्द ले चुके हैं। साइकिल की तारीफ में और क्या कसींदे कसूं?  मेरे लिये तो आठवाँ अजूबा थी, जिसने मेरे  पंख लगा दिए थे।

मैं ख्यालों में खोया हुआ गद्दी पर अवस्थित होकर तरह-तरह के रंगीन सपने मन में सँजो रहा था। अनुभूति दिव्य थी कि सातवें आसमान पर विचरण करने का अधिकार पत्र मिल गया है।आनन्द की अनुभूति अपने चरम पर थी। मन कल्पनाओं के सिन्धु में गोते लगा रहा था। ऐसा सुखद नसीब शायद ही किसी को पूर्व में मिला हो? साइकिल हवा को चीरती हुई पथ पर अग्रसर हो रही थी। ठीक मेरे समान ही मेरी साइकिल भी सपनों की दुनिया में खो चुकी थी।

"अरे ओ रामू, अरे ओ रामू,सुन भइया!" जोर जोर से आती हई आवाज मेरे कानों से टकरा रही थी।

मैं अपनी सपनों की दुनिया में जो मस्त था इसलिए ध्यान ही नहीं दिया आज। अपने आनंद के चरम को डिस्टर्ब नहीं करना चाह रहा था। एक दूसरा कारण गिरने का भय भी क्योंकि मैं ठहरा नौसिखिया।

"अरे!भाई रामू," और उच्च स्वर में हाथ का संकेत करते हुए ;

"अरे रामू ! रुक तो यार।"

मैं साइकिल को रौंदे चला जा रहा था । साइकिल में इतना मग्न था जैसे  किसी नवविवाहित जोड़े का प्रथम दिवस हो।

मैंने उसकी बात को अनसुना किया और आगे बढ़ता ही गया। आज  आनन्द के एक एक पल को आत्मसात करना चाहता था। इसलिए किसी का व्यवधान पसन्द नहीं था।

मेरा दिवास्वप्न एकाएक भंग हो गया  जब सामने देखा कि कोई  आगे आकर मुझे रोकने की कोशिश कर रहा है।अगले पहिये पर लात लगाकर पूरी शक्ति से साइकिल को रोकने का भरसक प्रयास किया फिर भी सन्तुलन डगमगा ही रहा था। लेकिन शनैः शनैः रफ्तार धीमी हो चुकी थी  और पैर भी जमीन पर टिक चुके थे। ख़ैर अटकी हुई साँस को राहत मिली।।

आगे से साइकिल का हैंडिल पकड़ते हुए भवानी बोला-

"तू क्यों सुनेगा अब?"

नहीं-नहीं ऐसी कोई बात नहीं यार, हाँ......." मैंने हाँफते हुए कहा।

बीच में ही टोकते हुए व्यंग्यात्मक लहज़े में लम्बी साँस लेते हुए  ,"अरे वाह अब तो साइकिल वाला हो गया है । हम जैसे सड़क छाप की कौन सुनेगा।"

मुझे लगा कि मैं वास्तव में बडे आदमियों की फेहरिस्त में आ गया हूँ। लगता है कि साइकिल से मेरा मान बढ़ गया है। फिर भी सामने वाले का मन रखने के लिये जो कहा जाता है वही मैंने भी कह दिया-

"नहीं- नहीं, ऐसी कोई बात नहीं यार!यह सब आप लोगों की दुआओं का असर है।"

"खैर छोड़ भी यार आज बड़े दिन में बाद मिला है। मुझे तो तेरी बड़ी याद आती थी कोई मौका ही नहीं मिलता कि गाँव भी जा सकूँ। घर गृहस्थी में ऐसा फंस गया हूँ, खैर ! ये बता अपने डमरू, सोना,बेंचा कैसे हैं  ठीक तो हैं सब  लोग   खूब मौज से गुजर रही होगी।" 

और कुछ पूछता उससे पहले ही भवानी ने टोकते हुए कहा," रामू तू सुनेगा भी कि अपनी ही हांकता चला जायेगा। हम गाँव वालों की क्या? न सावन सूखे न भादों हरे। वही सब खेती बाड़ी,मजदूरी और क्या? खैर तेरे तो हल्ले हैं यहाँ आकर। सब छोड़ ये बता रामू  तूने ये साइकिल कब खरीदी?"

अब मन में सन्तोष हुआ कम से कम किसी ने  साइकिल के बारे में तो पूछा।

"बस थोड़ी ही देर पहले खरीदी है, ला ही रहा हूँ , और घर जा रहा हूँ। तेरी भौजी देखेगी तो कितनी खुश होगी।"

"हाँ यार वी तो है।" धीरे स्वर में भवानी बोला।

मैंने सोचा शायद इसे मेरी साइकिल से कहीं  ईर्ष्या हो रही है। इसीलिए बात को समाप्त करने की मुद्रा में अच्छा भैया राम राम ,फिर मिलेंगे।"

मैंने धक्का देकर साइकिल को जैसे तैसे आगे बढ़ाया और धीरे- धीरे पैडल मारते हुए बीच बाजार में आ पहुंचा। मैं इधर उधर मुड़- मुड़कर  देखता हुआ चला जा रहा था । मन मे विभिन्न प्रकार के प्रश्न हलचल कर रहे थे। मैं मन ही मन यही सोच रहा था कि कोई तो पूछे कब खरीदी साइकिल, कितने की खरीदी बग़ैरह बग़ैरह --"

पूछा तो किसी ने नहीं , एक मोटर साइकिल वाले ने जरूर मुझसे कहा-" साइड में नहीं चल पाते हो, लिए घूम रहे हो हवाई जहाज।"

"हाँ - हाँ चलाता हूँ।" इतना ही संक्षिप्त जबाब निकला मुँह से।

मैं मन ही मन मुस्करा रहा था कि मेरी साइकिल नहीं वास्तव में हवाई जहाज है। वास्तविकता भी आज यही थी जिंदगी में आज पहली बार साइकिल नसीब हुई थी सो मेरे लिये किसी हवाई जहाज से कम नहीं थी।

शहर के पूरे दो चक्कर मार दिए लेकिन किसी ने पूछा तक नहीं। मैं जिधर घूम जाता उधर ही लोग मेरी साइकिल की हालत देखकर ठहाका मारकर हँस जरूर लेते थे। मुझे लगता था किए लोग कम से कम मुझे देखकर प्रसन्न तो हो रहे हैं।

टन -टन की आवाज लगाई घण्टी की मैंने घर पर आकर, किंतु किसी ने सुना ही नहीं। दो तीन बार फिर घण्टी बजाई, किंतु जब नहीं सुना तो -

"अरी सुनती हो मुनुआ की अम्मा, अरे सुनते हो भागवान, किवार तो खोलो। कितनी देर से घण्टी बजा रहा हूँ। "इसी प्रकार कई प्रश्न दाग दिए, मन में अपार  खुशी जो हो रही थी। सोच रहा था आज तो मेरी भागवान खुश अवश्य हो जाएगी, मेरी साइकिल को देखकर।

जैसे ही उसने गेट खोला, मैं कुछ कह पाता उससे पहले ही आग बबूला होते हुए-

"कहिये साब आ गये,और कहाँ से उठा लाये इसे, किसकी मिल गयी चढ़ने के लिये।" एक ही साँस में कह डाला पत्नी ने।

पहली ही दृष्टि में बीबी का इतना पारा मेरी तो सिट्टी पिट्टी गुम।"शायद सभी की हालत यही होती होगी अपनी घरवाली के सामने। लेकिन उसे खुश करने लिये कहा-

"खरीदी है भागवान! हम लोग इस पर बैठकर सैर किया करेंगे कभी कभार ।" सगर्व उत्तर दिया गद्दी पर जोर से हाथ मारकर। इतना इसलिए बोला शायद खुश हो जाये।

"खरीदी है?"

"हाँ खरीदी है।"

"बड़ा तीर मारा है तुमने।" इतना कहते हुए धम्म से चौखट पर सिर पकड़ कर बैठ गयी।

एकाएक पुनः आवेश में -"इसे खरीदने के लिये तुम्हारे पास पैसे कहाँ से आये।"

मेरा स्वर धीमा पड़  चुका था। धीरे से बुदबुदाया-

"पिछले महीने धनीराम के यहाँ काम जो किया था उससे मिल गए थे साढ़े आठ सौ और चार सौ रुपये कलुआ से ले लिये हैं अगले महीने पूरा चुका दूँगा।"

मेरी बीबी का गुस्सा चरम पर था-" पिछले महीने जो कमाए वो दे आये श्रीमान और अगले महीने फिर मजदूरी करोगे तब कर्जा चुकाओगे।"

"हाँ।" मैं धीरे से बोला।

"इन चुनुआ, मुनुआ , तनुआ, धनुआ को ले जाओ और फेंक दो भाड़ में,ऊपर से मुझे भी धकिया दो।"

उसकी आँखों से खून बरस रहा था। गला भी रुंध गया था,लेकिन बोले जा रही थी।

" घर में पाव भर आटा नहीं है, छटाँक भर दाल नहीं है चूल्हे के लिये लकड़ी नहीं है, मुनुआ भूख से दूध के लिये तड़फ रहा है।तनुआ पिछले हफ्ते से बीमार पड़ी है और चारपाई पर मौत से जूझ रही है। दवाई को घर में एक टका नहीं है। औलाद ठंड से सिकुड़ रही है जिन पर एक लत्ता तक नहीं है । लो साब ले आये साइकिल सैर करने लिये। जब अपने लिये कमा नही पाते हो फिर क्यों लाइन लगाई थी औलाद की ? अब क्या ये हमारी हड्डियों को चूसेंगे या फिर तुम्हारी साइकिल का चूरन बनाकर चाटेंगे।"

स्वर यद्यपि मन्द पड़ चुका था किंतु वेदना निकल रही थी उसके अंदर से-

"फेंक दो साइकिल को  भाड़ में ऊपर से औलाद को और हम दोनों भी  मुँह बांधकर कूद पड़ेंगे। और पाँचवा जो मेरे पेट में है वो तो कम से कम भूख से नहीं मरेगा, सारे क्लेश कट जाएंगे।" इतना कहकर फूट-फूट कर रोने लगी।

मैं सपनों  के संसार से बाहर निकलकर वास्तविक धरातल पर आ गया था। अब बच्चों की भूख , बीबी की हालत मेरे दिल को कचोट रही थी। पश्चाताप की अग्नि मुझे  झुलसाये  जा रही  थी, परिस्थितियों ने  अब  मेरे सिर से साइकिल का भूत उतार दिया था।

डॉ राजीव कुमार पाण्डेय

मोबाइल-9990650570

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