जमा न कोई खेल
अपने प्रिय जन के सम्मुख है,कानों खिंची गुलेल।
भरसक कोशिश करके देखी , जमा न कोई खेल।
सुर से लेकर तान अलग है,
फिर भी गाते गाना।
कोरस से कहाँ देखा जाता,
नायक का सटियाना।
वाद्य यंत्र भी मिला न पाये, पदचापों से मेल।
देख देख हैरान मदारी,
बिगड़ा हुआ जमूड़ा।
मुद्रा के थैले में रखता,
अहंकार का कूड़ा।
बूढ़ी अम्मा के हाथों से, ढीली हुई नकेल।
उदित भानु के हाथ जोड़कर,
खिलती सूर्यमुखी।
पर सन्ध्या के अवसानों में,
होती बड़ी दुःखी।
सूखे अंडूके ना देते, उम्मीदों का तेल।
परीक्षा की कॉपी में रखे,
जिसने पन्ने कोरे।
खिसियानी बिल्ली सा देखो,
अपने दाँत निपोरे।
शेरों की मांदों के आगे ,गीदड़ दिए धकेल।
अभी नर्सरी दांव पेंच की,
फिर भी कसा लँगोट।
प्रतिद्वंद्वी से जीत मांगते,
दिखा दिखाकर नोट।
चढ़ी हुई कुर्ते की बाँहें, टक्कर सकीं न झेल।
लिए तराजू घूम रहे हैं ,
बिके न कोई मोल।
लोक लुभावन ऑफर के भी,
काम न आएं बोल।
थोक दुकानों के आगे ये, लेकर चले ढकेल।
अजमा कर तो देख चके हैं
सब तरकश के तीर।
सिर्फ ख्वाबो तक सीमित है,
सत्ता की तश्वीर।
पाले तक भी खेल न पाए,गुड्डा गुड़िया मेल।
डॉ राजीव कुमार पाण्डेय
1323/भूतल,सेक्टर-2
वेवसिटी, गाजियाबाद
मोबाइल-(+91)9990650570
बहुत सुंदर रचना। बधाई बन्धुवर।
जवाब देंहटाएंवाह वाह वाह, बिना विशेष संबोधन के भी विशेष लोगों को जो आईना दिखाया है बहुत अच्छा लगा ।
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