ऑनलाइन क्रिया (कहानी)


बाबू जी कैसे हैं आप? अपना ध्यान रखना दवाई टाइम से लेते रहना, किसी भी प्रकार की आवश्यकता हो हमें बताये, बेटे ने व्हाट्सऐप वीडियो कॉल करके कहा ।

"हाँ बेटा तू अपना ध्यान रखना तो बिल्कुल अकेला है।" वहाँ इतना कहते हुए फोन रख दिया।

दीनानाथ जी बहुत खुश थे अपने इकलौते बेटे अनमोल से। हों भी क्यों न अमेरिका में रहते हुए भी प्रतिदिन कॉल करके पूछ लेता था। कितना संस्कारी बेटा था।

अपने कुर्ते पर हाथ फेरते हुए देखो कितने अच्छे कपड़े मंगवाता है,हाथ पर बंधी घड़ी, मोबाईल दीवार पर चलचित्र देखने के लिये स्मार्ट टीवी और न जाने कितनी चीजें ऑनलाइन मंगाता रहता था अपने बाबूजी के लिए। पास पड़ौस वाले जलते थे उसके बेटे की तरक्की से। बाबूजी भी सब समझते थे।लेकिन कुछ नहीं कहते थे किसी से। पड़ौस के कुछ लोग रोजाना आकर उनके पास आकर बैठते थे। दीनानाथ जी कुछ न कुछ उन्हें जलपान अवश्य कराते क्योंकि बेटा ऑनलाइन सारी चीजें मंगा दिया करते थे। चलते चलते पड़ौसी पूछ लिया करते कोई चीज की जरूरत हो तो मंगा लेना हम आखिर आपके पड़ौसी हैं । यदि आपका बेटा नहीं है तो क्या हुआ हम सब हैं।

बाबूजी जी की आज आँख नहीं लग रही थी। कुछ बैचेनी महसूस हो रही थी तभी पास में रखा पानी पिया तो राहत महसूस हुई।

पत्नी उदयरानी की बहुत याद आ रही थी। जब बैचेनी होती तो हाथ पाँव पर हाथ फिराया करती थी। और सिर को सहलाती थी। लेकिन आज अकेले थे उसे इस संसार से गये हुए तीन साल बीत चुके थे। बेटी सौम्या की भी चार साल पहले शादी हो थी। वह भी अपने पति के साथ पूना में सेटिल्ड हो चुकी थी। लेकिन जब भी उसका पति विशाल अपनी मीटिंग के लिये दिल्ली आता  तो उसके साथ आ जाती अपने बाबूजी से मिलने गाजियाबाद अवश्य आती। लेकिन हर बार उसे बताकर बाबूजी अपनी बेटी को परेशान नहीं करना चाहते थे।

पी डब्ल्यू डी से सेवानिवृत्त हुए आठ साल ही हुए थे । उनकी पहचान एक ईमानदार अधिकारी के रूप में थी आज भी उनके आफिस के लोग उनका उदाहरण देकर याद करते रहते हैं। स्वाभिमान उनके रक्त में बस चुका था इसलिए अपने पड़ोसियों को भी ज्यादा तंग नहीं किया करते थे। बहुत ज्यादा होने पर एक मित्र गयाप्रसाद को फोन कर लिया करते थे। लेकिन पिछले एक साल से वो भी रिटायरमेंट के बाद अपने बेटे के साथ गुडगांव में जाकर बस चुके थे।

किसी प्रकार दीनानाथ जी को थोड़ी राहत मिली पानी के साथ एक टेबलेट लेकर। बी पी सुगर ने उन्हें न घेरा होता तो बड़े कर्मठ थे । आज तो बस छड़ी लेकर सामने पार्क तक ही पहुँच सके थे।

पार्क की निर्धारित सीट पर बैठ गए। वह सीट भी जीवंत हो उठी अपने प्रिय को पाकर । आज कई दिनों के बाद दीनानाथ जी को देखकर आस पास के पुष्प भी मुस्करा उठे।क्योंकि उनकी प्रशंसा रोज मित्रों से किया करते थे। किन्तु सीट और पुष्पों के आँखों की चमक बहुत देर टिक न सकी क्योंकि उनका प्रसंशक के चेहरे पर उदासी तैर रही थी।

इसी मध्य उनके  प्राणायामी मित्र आत्माराम आकर कुछ गप शप की मुद्रा में बगल में विराजित हो गए यह जानने के लिये कि आज प्राणायाम क्यों नहीं किया।

इतना कह ही पाये थे कि इस कोरोना के युग में हम बुड्ढों का यही एक सहारा है।

"हाँ यार।" इतना ही उच्चरित हुआ आज दीनानाथ के मुख मुद्रा से।

आत्माराम जी ने जब गौर से देखा कि आज मुख मण्डल कुछ मलिन है आत्माराम जी का। तो पूछ बैठे,"क्या हुआ मित्र आज उदास क्यों हो?"

"कुछ नहीं यार कुछ बैचेनी हो रही है कुछ समझ में नहीं आ रहा है क्या करूँ?" रुँधे स्वर में बोले दीनानाथ।

आत्माराम जी ने उनके सिर पर हाथ रखा कुछ महसूस नहीं हुआ,पल्स चेक किया जो कुछ ज्यादा लग रही थी।

"कहीं आपका बी पी तो नहीं बढ़ा? कोई दवा नहीं ली क्या?"

ली तो है कुछ फायदा नहीं लग रहा। ऐसा करो आत्मा राम!मेरे बेटे को जरा व्हाट्सऐप पर मैसेज छोड़ दो वो कॉल कर लेगा। अभी   जग रहा होगा  नहीं तो फिर सो जायेगा।"

उसे मेसेज करते हुए ",उसे क्यों कष्ट दे रहे हो मैं हूँ न? किसी डॉक्टर को बुला रहा हूँ।"

नहीं  मित्र वो कुछ इंतजाम कर देगा।" 

इतना कह ही पाए थे कि इतने में कॉल आ गयी।"हाँ बाबूजी क्या बात हुई।

बेटा कुछ नहीं आज तबियत खराब लग रही है लेकिन तू चिंता मत कर ठीक हो जाऊंगा।"

अरे नहीं बाबूजी आप घर पहुँचो अंकल जी के साथ में मैं कुछ करता हूँ। इतना कहकर फोन रख दिया।

आत्मा राम जी ने जैसे तैसे पहुंचाया तब तब तक अनमोल ने कार्डियो लॉजिस्ट को ऑनलाइन अपॉइंटमेंट ले ली अर्जेंट में घर आने की।

पैसे की कोई कमी नहीं थी अच्छा खासा कमा रहा था और बाबूजी की भी पेंशन ठीक ठाक आ रही थी । कष्ट एक ही था कि आज आवश्यकता पर पास नहीं था और वहाँ से आ भी नहीं सकता था। 

साँसे तेज तेज फूलने लगी दर्द भी बढ़ने लगा। आत्माराम जी को घबराहट हुई इधर उधर फोन करने लगे । कोई आ जाये तो इन्हें कहीं ले जायें

इतने में सायरन बजाती हुई एम्बुलेन्स आ गयी डॉ पूरी टीम के साथ दीनानाथ के कमरे में दाखिल हुए।

आत्माराम भी एम्बुलेंस की आवाज सुनकर बाहर आ गए थे वो भी उनके साथ अंदर आये।

परीक्षण करके एकदम खड़े रह गये।

"क्या हुआ डॉक्टर साहब?" आत्माराम जी ने पूछा।

डॉक्टर मुँह लटकाए हुए धीरे से बोले' 

"ओह  दीनानाथ इज नो मोर। सीवियर हार्ट अटैक " इतना कहकर वापस चले।गए। उनके बेटे को सूचित किया गया। 

बेटा फूट फूट कर रोने लगा। विवश था आने का कोई साधन नहीं । फ्लाइट भी नहीं चल रही थी। बहिन को सूचित किया।

आस पड़ौस वाले सोचने लगे कि इनका क्रिया कर्म कैसे होगा कौन करेगा अनमोल तो आ ही नही पायेगा।

अनमोल लगातार आत्मा राम जी के सम्पर्क में था उसने अंतिम संस्कार का सभी सामान दाह संस्कार तक समस्त क्रिया को  ऑनलाइन बुक कर दिया था।

शाम तक उसकी बहिन भी चुकी थी।

लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न था दाह संस्कार का कि मुखग्नि कौन देगा।

बेटा अनमोल लगातार ऑनलाइन था अपने बाबूजी जी को आज मुखाग्नि कैसे दी जाये।

तभी पंडित जी ने युक्ति निकाली कि बेटे से ऑनलाइन ही इस क्रिया को कराया जाये।

और अंतिम क्रिया भी ऑनलाइन सम्पन्न हो गयी।

सभी की आँखे नम थीं इस ऑनलाइन क्रिया को देखकर।



टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

आत्म परिचय

ऋतुराज बसन्त

जय जय माँ अम्बे