एक सिलेण्डर ऑक्सीजन (कहानी)



आजकल सेठ धनीराम की तिजोरी घुँघरू बाँधकर नर्तन कर रही है अपने चारों तरफ के भरे हुए कोने सुखानुभूति दे रहें हैं। ऊपर से लगातार ठूँसे जा रहे अनगिनत नोट रखने की जगह नहीं बची है। दिन में दो बार बैंक भेजा जा रहा है कैश। 

तिजोरी की चकाचौंध में सब कुछ भूल चके हैं सेठ जी केवल मशीन बने पैसे गिनने में लगे हैं ग्राहक से सीधे मुख बात ही नहीं कर रहें है।

एक ग्राहक काफी देर से गिड़गिड़ा रहा था

"'बाबूजी आपकी आपकी दुकान पर ऑक्सीमीटर और नेबुलाइजर मिल जाएगा क्या ? "

थोड़ी देर सिर खुजलाते हुए क्या माँगा आपने?

"बाबूजी एक नेबुलाइजर और एक ऑक्सीमीटर  बहुत जरूरी है मिल जाये तो बहुत मेहरबानी होगी। आपका जिंदगी भर एहसान नहीं भूलूँगा।"

"अरे भाई थोड़ी देर पहले आये होते तो अवश्य दे देता। अभी -अभी एक ग्राहक फोन आ चुका है उसे देना है माफ करना भाई, वो भी  मजबूर है।"

"अरे बाबूजी कैसे भी करिए हमें दे दीजिए जो मांगो सो ले लो पर मुझे  दे दो। जब वो आ जाए तो कहीं से भी और व्यवस्था कर लीजिए।"

"अरे ऐसे थोड़े ही होता है एक ही बचा है हमारे पास जिसका फोन आया है वी भी अपना ही आदमी है। उसका केस भी सीरियस है।"

"बाबूजी आपके आगे हाथ जोड़ता हूँ पांव पड़ता हूँ। कैसे भी करके मुझे दे दीजिए पूरे बाजार में घूम चुका हूँ कहीं नहीं मिला। अब आपसे ही सहारा है आपके पास जो है उसे दे दीजिए मेरी माँ बच जायेगी।"

"आप इतना कह रहे हो तो दे दूंगा पर समस्या है। मैं उस ग्राहक से वादा कर चुका हूँ मुझे उसे भी दूसरे शहर से मंगाकर उसे आज ही देना पड़ेगा।"

"कुछ भी करो बाबूजी ये मुझे दे दीजिए।"  गिड़गिड़ाते हुए ग्राहक बोला।

"हाँ ठीक है पर दोनों ही चीजों के 5000 देने पड़ेंगे। "

यद्यपि ग्राहक मोहन लाल समझ रहा था कि ये दोनों ही 2000 से अधिक नहीं है फिर भी अपनी जेब से ए टी एम कार्ड निकाला और आगे बढ़ाते काट लीजिये बाबूजी।"

"अरे भई कैश में दीजिए ।"

"बाबूजी पूरा नहीं है कुछ कम था तो आप इसी से ले लीजिए।"

"नहीं-नहीं जो भी कैश है उसे पहले दो जो शेष बचेगा उसे ए टी एम से काट लेंगें।"

बेचारा मरता क्या न करता नकद 3000 थे दे दिए यह कहते हुए शेष कार्ड से ले लीजिए।

सेठ जी मन ही मन खुश हो रहे थे अच्छा धंधा चल रहा है आजकल 2000 की चीज 5000 हज़ार में।

"बाबूजी जरा जल्दी कीजिए।"

"हाँ कर रहा हूँ।"

 जैसे ही मशीन पर कार्ड लगाया  घर से फोन आ गया।

"अरे क्या हुआ सोनू को ?" जोर जोर से चिल्ला रहे थे।

"अरे ! कुछ बताओ तो सही क्या हुआ।"

सेठ धनीराम की पत्नी का रोना बंद ही नहीं हो रहा था। बस एक ही बात आप जल्दी आ जाओ सोनू को बचा लीजिए?

सोनू  सेठ जी का इकलौता बेटा था बड़ा होनहार और सेवाभावी था। पिछले वर्ष ही उसकी शादी बड़ी धूम धाम से की थी। शहर का कोई बड़ा आदमी छूटा नहीं था जो न आया हो । आज सुबह ही दुकान से गया है। बस यह कहकर पापा थोड़ी तबियत ढीली है।घर जाकर आराम करता हूँ।

धनीराम समझ जाते थे जब उसका मन न हो तो ऐसे बहाने अक्सर बना लेता था। 

लेकिन आज अपनी पत्नी का रुदन सुनकर उनका दिल बैठा जा रहा था। 

"बताओ तो कुछ क्या हुआ सोनू को?"

"सोनू हांफ रहा है सांस लेने में दिक्कत आ रही है और उसे बुखार भी है।"

"तुम चिंता मत करो मैं अभी डाक्टर को फोन लगाता हूँ ।"

सेठ धनीराम जी को  बड़ा घमंड था अपने रसूखों पर डॉक्टर साहब को तुरन्त फोन घुमाया और बताया अपने बेटे के बारे में? डॉ साहब समझ गए कोरोना हुआ है इसी लिए सांस लेने में तकलीफ आ रही है। 

डॉ साहब बोले   "कहीं से भी बहुत जल्दी एक ऑक्सीजन सिलेंडर की व्यवस्था कीजिए ।"

इधर ग्राहक दुकान पर खड़ा अपना कार्ड लौटने की प्रतीक्षा कर रहा था  दो बार सेठ जी को याद भी दिला चुका था लेकिन अब सेठ जी को केवल सोनू ही दिख रहा था।

झल्ला पड़े ग्राहक पर थोड़ा देर रुक नहीं सकते हो देख नहीं रहे हो मेरा बेटा बीमार है।

सेठ जी दनादन फोन घुमाए जा रहे थे सारे जान पहचान वाले हॉस्पिटल में कहीं कोई ऑक्सीजन वाला बेड मिल जाये। हर जगह से  एक ही उत्तर कोई बेड खाली नहीं है।

और न ही ऑक्सीजन का सिलेंडर है।

सेठ जी माथा पकड़ कर बैठ गए। और नोटों से भरी तिजोरी को तरफ टकटकी लगाए देखने लगे यह सब बेकार पैसा भी कुछ नहीं कर रहा।

आखिर सेठ जी ने किसी मंत्री को फोन किया,

" मन्त्री जी आज तक हमने आपको हर इलेक्शन में चन्दा दिया है। आज हमारी मदद करो ।"

"बोलो धनीराम जी क्या आवश्यकता है।"

"हमें एक सिलेंडर ऑक्सीजन चाहिए।"

"अरे सेठ जी कैसी बात करते हो? आप शहर के जाने माने  मेडिकल स्टोर वाले हो मुझसे सिलेंडर मंग रहे हो। 

कल ही मेरी रिश्ते की बुआ ने ऑक्सीजन की कमी से दम तोड़ दिया आजकल कोई जुगाड़ काम नहीं आ रही इसके अलावा कुछ चाहिए तो बताओ।"

इतना कहकर मन्त्री जी ने फोन रख दिया।

इधर ग्राहक आधे घण्टे से अपने कार्ड के इंतजार में  सेठ जी से कई बार मिन्नतें भी कर चुका कि हमारा कार्ड वापस दे दो हम चले अपनी माँ का इलाज कराना है।

इस बार सेठ जी झल्ला पड़े तुम्हे आने कार्ड की पड़ी है इधर मेरा बेटा ? कहकर रोने लगे सेठ जी।

इधर दो तीन बार घर से फोन आ लिया जल्दी करो डॉक्टर साहब से ऑक्सीजन लगाने वाला भेज दिया है सिलेंडर मंगाओ।

आज सेठ जी  जिंदगी में पहली बार इतने उदास हुए थे जब ओहदा पैसा कुछ काम नहीं आ रहा था।

ग्राहक फिर बोला 

"बाबूजी बहुत परेशान हो आखिर कुछ बताओ कि क्या  हुआ है?"

"अरे तुम क्या करोगे जानकर? यहां शहर के नामी गिरामी लोगों से बात कर ली । मन्त्री जी ने भी हाथ खड़े कर दिए तुम कह रहे हो बताओ तो कुछ ! क्या कर लोगे जानकर?"

कभी सेठ जी पसीना पौंछे कभी सिर खुजलायें आखिर  करें  तो क्या करें? कोई रास्ता नज़र नहीं आ रहा था।

ग्राहक ने एक बार फिर पूछ लिया आखिर आपके बेटे सोनू को क्या हुआ है।

कई बार फोन पर सुनी बात से अनुमान लगा लिया था  सोनू इनका बेटा है।

"क्यों बेकार में दिमाग खा रहे हो? अपना कार्ड लो और जाओ यहां से।" इस बार झुंझला पड़ा सेठ

कार्ड को पर्स में रखते हुए हिम्मत करके फिर पूछ लिया 

"सेठ जी क्या हुआ आपके सोनू को हो सकता मैं आपके कुछ जाम आ जाऊं।"

चारों तरफ से असहाय सेठ जी को कुछ नहीं दिखाई दे रहा था सोचा ये बार बार ये पूछ रहा है तो बता देता हूँ।

"मेरा बेटा बहुत बीमार है डाक्टर ने कहा है अभी अभी ऑक्सीजन चाहिये।अब सिलेंडर नहीं मिल रहा कोई? बताओ क्या करें। "

"अरे सेठ जी आज वाकई इसकी ,बड़ी मारामारी है, लेकिन आपके लिये कुछ करता हूँ।"

क्या मतलब ?

मतलब कुछ नहीं आप फौरन घर पहुँचो और आपके पहुँचने से पहले सिलेंडर घर पहुंच जाएगा।

वो कैसे?

"आप अपना पता दीजिए।और मोबाइल नम्बर भी।"

सेठ जी ने अपना विजिटिंग कार्ड देते हुए तुरन्त अपनी गाड़ी ली और घर निकल लिये अपने सोनू के पास।

इधर ग्राहक ने अपने छोटे भाई को फोन किया और ऐड्रेस बोलते हुए कहा कि सिलेंडर लेकर तुम फौरन यहाँ आ जाओ।

यह क्या भैया जैसे तैसे तो एक की व्यवस्था की थी वो भी किसी को दे रहे हो।

कोई बात नहीं भाई फिलहाल  माताजी को जरूरत नहीं है तब तक किसी की जान बच जाए  तो ठीक रहेगा।

दो दिन के बाद मोहन के घर के आगे आकर एक बड़ी सी गाड़ी आकर रुकी । गाड़ी से एक मोटे से सेठ जी उतरे और मोहन लाल के घर की कॉल बेल बजाई।

अंदर से मोहनलाल जी निकले तो देखा ये वही सेठ जी हैं दोनों हाथ जोड़ते हुए पैरों पर गिर पड़े। 

"ये क्या कर रहे हो सेठ जी ? आप उम्र में हमसे बड़े हो ,मुझे पाप लगाओगे क्या?"

"नहीं भाई जी आपने जो मेरे लिये किया उसका एहसान जिंदगी भर नहीं भूलूँगा।"

आपने मेरे बेटे की जान बचाई है उस दिन आपने सिलेंडर न दिया होता तो मेरा बेटा राम का प्यारा हो गया होता।" 

सेठ जी पैर छोड़ने को तैयार नहीं सारा मुहल्ला इकट्ठा हो गया ये हो क्या रहा है।

"उठो सेठ जी आप इज्जत वाले आदमी हो।"

सेठ जी बोले मेरी एक प्रार्थना स्वीकार कर लो भाई

क्या सेठ जी?

मेरा बेटा ठीक हो गया आपकी कृपा से अब आप यह छोटी सी भेंट स्वीकार कर लो पैकेट आगे बढाते हुए बोले सेठ जी।

ये क्या है सेठ जी उस दिन मैंने वही किया जो एक इंसान को करना चाहिए था। इसकी क्या आवश्यकता है।

मोहन ने उपहार समझकर रख लिया।

सेठ जी के जाने के बाद खोलकर देखा था तो दंग रहा गया। वह पैकेट नोटों से भरा था।ऊपर एक पत्र रखा था उसमें लिखा था।

आपको जो नेबुलाइजर और औक्सीमीटर दिया था वह मात्र 1500 का था आपकी विवशता को देखकर 5000 लिये थे लेकिन आपने फिर भी निस्वार्थ भाव से मेरे बेटे की जान बचाई । यह तुच्छ राशि आपके किये गए उपकार के समक्ष कुछ भी नहीं कृपया स्वीकार कर लेना इतनी हाथ जोडकर प्रार्थना है। 

साथ ही इन शब्दों के साथ समापन था उस पत्र का।

"आज से शपथ लेता हूँ कि आज से किसी की मजबूरी का कोई फायदा नहीं उठाऊंगा। तुमने बिना कुछ कहे बहुत बड़ा पाठ पढ़ा दिया है आजीवन उस पर चलने का प्रयास करूंगा। प्रयास करूँगा की एक सिलेंडर ऑक्सीजन की वजह से किसी की जान नहीं जाने दूँगा।"




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