धंधे में बरकत
सूरज की किरणें परदों से छन छन कर अंदर तक आ रही थीं । बाहर पेड़ों पर खगकुल परिहास करने लगा था। उनके उसी परिहास की चूं-चूं कानों में टकरा रही थी। आँखों में कुछ अजीब सा महसूस होने लगा था तभी चादर को ऊपर तक खींचकर अपना चेहरा ढक लिया था छुटकी ने देर तक सोने की इच्छा से।
चादर को ऊपर तक खींचकर सिर ढका ही था तभी घर की डोर बेल बजी छुटकी ने एक दम अपना चादरा को दूर फेंक दिया और उठ खड़ी हुई दरवाजे की तरफ जाने के लिये।
"बेटा और सो ले थोड़ी देर।" माँ ने कहा।
लेकिन बेटा सबसे पहले गेट पर। ऐसा इसलिये नहीं कि कोई द्वार पर आया है ऐसा इसलिए क्योंकि उसके दादा जी प्रातः काल को सैर से वापस जो आ गए थे । पिछले एक महीने से उस पर विशेष प्यार उड़ेल रहे थे। बिना टॉफी, बिना चॉकलेट घर में घुसते ही नहीं थे।
इन्हीं टॉफियों और चॉकलेटों ने छुटकी को चादरा छोड़ने पर मजबूर कर दिया था।
मम्मी 10 बजे तक मुश्किल से जगा पाती थी लेकिन आजकल पहली डोर वेल पर उपस्थित हो जाती थी।
छदामी लाल अपनी पोती पर पिछले एक महीने से बडे दयालु थे। उसकी हर इच्छा पूरी करते थे। नये खिलौने भी आ गए,नई फ्रॉक भी और प्रतिदिन चॉकलेट अलग अलग टेस्ट की टाफियां और पता नही क्या-क्या?
ये वही छदामी लाल थे जो चार साल पहले बड़े दुखी थे कि उनके इकलौते बेटे के पुत्री हुई है। कई दिनों तक इसी दुख में गले के नीचे निवाला नहीं गया था। आज दिल खोलकर अपनी पोती की नहीं बल्कि पूरे घर की हर फरमाइश पूरी। घर का नक्शा ही बदल डाला इसी एक महीने के अंदर। पर्दे नये हो गए थे,बहु के लिए ज्वेलरी बेटे के लिये एक चमचमाती कार,घर के बाहर बड़ी सी नेमप्लेट 'सेठ छदामी लाल'।
सोसायटी वाले घर से बाहर तो निकलते नहीं थे क्योंकि पिछले एक महीने से लॉक डाउन की मार झेल रहे थे। घर का हाल बेहाल हो रहा था और इधर सेठ जी के बढ़ते प्रभाव को देखकर लग रहा था कि सेठ जी की कहीं लॉटरी लग गयी है।
सेठ जी अपने परिवार का बड़ा ध्यान रख रहे थे बेटा अंशुल और बहू व्यंजना को घर से बाहर नहीं निकलने दे रहे थे। इच्छाओं की पूर्ति घर पर ही कर थे। दूसरा अपने परिवार को कोरोना से भी बचाना था,स्वयं भी अपना बड़ा ध्यान रखते थे।
"क्यों पप्पू एक बात समझ में नहीं आ रही इस मक्खी चूस सेठ ने अपनी पगार इस महीने क्यों बढ़ा दी।" बालों को खुजलाते हुए रामू ने कहा।
"हाँ रामू सेठ जी आजकल डाँट भी नहीं रहे। बड़े प्यार से बात करते हैं कुछ गले के नीचे नहीं उतर रहा।" पप्पू भी चिंतन की मुद्रा में आ गया।
ग्राहक कुछ सामने खड़े थे उन्हें भी चला रहे थे। आजकल धंधा पूरे यौवन पर था। आज 10 -12 साल हो गए थे रामू और पप्पू को इस दुकान पर काम करते -करते उन्होंने कभी नहीं देखा था कि इतना अच्छा बिजनिस चला हो।
बाहर दुकान के आकर एक गाड़ी रुकी रामू और पप्पू के हाथ एकाएक तेज चलने लगे बातें भी बंद करलीं आज्ञाकारी सेवकों की भाँति।
बाहर से ही छदामी लाल जी अपने नौकरों को आवाज लगाई
"अरे कहाँ हो मेरे दोनों शेरो।"
पिछले कई दिनों से यही सम्बोधन हो गया था जो कहा करता था-
"अरे कहाँ मर गए कम्बख्तों दिन भर गप्पें मारते रहते एक धेला का काम नहीं करते हो।"
इस परिवर्तन पर नौकरों के पैर जल्दी उठने लगे थे।
दौड़ते हुए आये कार की डिग्गी से दोनों पोटली निकाल लीं अंदर ले जाकर रख लीं। यही क्रम था पिछले महीने भर से।
काफी पुराने थे रामू और पप्पू अब हर बात इशारों में समझने लगे थे अपने सेठ जी की।
अंदर जाकर पूरी गठरी को खोला और जो काम दिया गया था पूरा करने लगे।
इधर सेठ जी ने काउंटर सम्भाल लिया था सामने खड़े ग्राहकों को भी बड़ी ततपरता से निपटा रहे थे।
कोई भी ग्राहक उनकी दुकान पर कभी मोल भाव नहीं किया करता था। क्योंकि उनका और कोई प्रतिद्वंद्वी था ही नहीं पूरे शहर में,जो मांगते थे वही मिलता था।
उन्हीं की दुकान ऐसी थी पूरे शहर में जो पूरे दिन खुलती थी इस आपदा में। कोई पुलिस वाला भी बंद नहीं कराता था। वैसे पूरे शहर में कर्फ़्यू लगा था कोरोना के कारण लेकिन सेठ जी को अति आवश्यक वस्तुओं को बेचने के कारण उन्हें स्पेशल परमिशन मिली हुई थी।
रुपये तिजोरी में बनते नहीं थे। शाम तक बैग भरकर अपने घर ले जाते थे।
हर तरफ शहर में हाहाकार मचा था इस वैश्विक महामारी से प्रतिदिन इतने बुरे समाचार मिलते थे की दिल घबराने लगता था। कहीं न कहीं से कोई न कोई समाचार पूरा दिन खराब कर देता था। पूरा शहर ही क्या पूरा देश त्राहिमाम- त्राहिमाम कर रहा रहा था तब उस काल मे सेठ छदामी लाल अंदर ही अंदर मुस्करा रहे थे क्योंकि उन्होंने अपने धंधे की ऐसी बरकत कभी नहीं देखी थी। सेठ जी जो आराम से 9 बजे तक सोते थे आज रात में भी नहीं सोते हैं इतना बरकत मिल गयी थी धंधे को ।
बेटा अंशुल अक्सर कहा करता था
" बाबूजी दुनिया घरों में आराम कर रही है और आपकी गाड़ी दौड़ती ही रहती है। कुछ आराम भी कर लिया करो। कहीं बीमार पड़ गए तो।"
"नहीं बेटा ये आराम करने का समय नहीं है। यही समय है पीड़ित मानवता की सेवा करने का,वही कर रहा पूरी लगन के साथ। आज हम ये नहीं करेंगे तो शहर में कोई दूसरा नहीं है जो इस काम को करता हो।" सेठ जी अपने बेटे को समझाते हुए कहा।
हाँ बाबूजी वो तो है लेकिन फिर भी अपना ध्यान रखिये ये महामारी बहुत बुरी है। पता नहीं कहाँ से कौन चपेट में आ जाये।"
"देख बेटा मैं तो बस गाड़ी में बैठा रहता हूँ। गाड़ी में माल भरना उतारना नौकरों का काम है ।मैं कहीं हाथ भी नहीं लगाता पूरी तरह ध्यान रखता हूँ तू निश्चिंत होकर सो जा। अब बहुत समय हो गया है।"
सेठ जी विश्राम करने जा ही रहे थे तभी अचानक कुछ गाड़ियां सायरन बजाती हुई उनके दरवाजे पर आकर रुकीं सोसायटी वाले भी जग ही रहे थे। उन्होंने भी अपनी खिड़कियों से झाँक कर देखा इतनी सारी गाड़िया सेठ जी के द्वार पर।
मन में एकाएक वहीं दृश्य कौंध रहा था कहीं कोरोना की चपेट में तो नहीं आ गए । लेकिन एम्बुलेंस इसमें एक भी नहीं आखिर माजरा क्या था।कुछ समझ मे नहीं आ रहा था।
पोल की लाइट भी आज नहीं जल रही थी इसलिए कुछ साफ नहीं दिख रहा था पड़ौसी सुरेश चंद्र को। बाहर निकलने की किसी की हिम्मत नहीं हो रही थी कौन आफत मोल ले। आजकल वैसे ही हवा में वायरस घूम रहा।
गाड़ियों से पुलिसवालों का उतरना सेठ जी के घर जाना और पुनः किसी को खींचते हुए गाड़ी में बैठाना सब कुछ नाटकीय किसी फिल्मी दृश्य की तरह इस लगा जैसे कोई सीन शूट किया जा रहा हो।
गाड़ियां पुनः फर्राटा भरती हुई रवाना । सभी के समझ से परे केवल अनुमान और कुछ नहीं।
अनेको अनुत्तरित प्रश्न छोड़ गई सोसायटी में पुलिस का आगमन ।
सेठ जी के मोबाइल की कई घण्टिया भी बजी। लेकिन फोन स्विच ऑफ। माजरा कुछ समझ नहीं।
बड़ी हिम्मत करके पड़ौसी सुरेश ने अंशुल को फोन लगाया उसने इतना ही बताया पुलिस वाले कह रहे थे कि आवश्यक कार्य से ले जा रहे हैं थोड़ी देर के लिये फिर छोड़ जायेंगे।
यह जबाब कुछ गले नहीं उतरा सुरेश के रात भर सोचते रहे लेकिन कब आँख लगी पता ही नहीं चला।
सुबह पूरे शहर में हंगामा मच गया अखबारों और चैनलों की खबर देखकर।
मानवता शर्मशार हो गयी ,पूरा देश थू-थू कर रहा था । सभी टीवी पर बस एक ही खबर कफ़नचोर सेठ छदामी लाल।
छुटकी ने जैसे ही टी वी खोला उसे अपने दादा जी की फोटो दिखाई दी उसने अपने मम्मी पापा को बुलाया देखो दादाजी टी वी पर देखो दादाजी टी वी पर । उछलने लगी मेरे दादाजी टी वी पर ।
अंशुल और उसकी पत्नी व्यंजना ने दौड़कर देखा तो आँखे फ़टी की फटी रह गयी अंशुल धड़ाम से सोफे पर गिर पड़ा। जैसे तैसे उसकी पत्नी ने सम्भाला । यही हैं उसके पापा सेठ छदामी लाल अंतिम संस्कार वाले। जो आस-पास के सभी शहरों से लाशों के कफ़न उठवाकर , लाउंड्री में धुलवाकर अपना लेवल लगाकर आज बेच रहे थे ,तभी धंधे में बरकत आ रही थी। छुटकी को आज टॉफी व चॉकलेट अच्छी नहीं लग रही थी। उसने अपनी सभी टॉफी और चौकलेट डस्टबिन में फेंक दी थी उसे घिन आ रही थी अपने दादाजी पर।
बाहर लगी नेमप्लेट को कुछ लोगों ने काले रंग से पोत दिया था।
डॉ राजीव कुमार पाण्डेय
महामारी में मरती मानवता का सजीव चित्रण करती हुई कहानी है।
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