कलंक मुक्ति- सत्य का सूर्योदय

 

कलंकमुक्ति: सत्य का सूर्योदय

​अध्याय १: अंतर्मन का द्वंद्व और नीरज की संजीवनी

​कमरे में पसरा सन्नाटा किसी गहरे कुएँ की तरह था, जिसमें गिरती हुई हर सांस की गूंज साफ़ सुनाई दे रही थी। चारपाई पर सीधे लेटे अम्बुज की आँखें छत की कड़ियों को बिना पलक झपकाए निहार रही थीं। खिड़की से छनकर आ रही चाँदनी भी आज कमरे के अंधियारे को चीरने में नाकाम साबित हो रही थी। मन के भीतर विचारों का एक ऐसा चक्रवात चल रहा था, जिसकी गति को थाम पाना अम्बुज के वश में नहीं था।

​जब जीवन एक ऐसे चौराहे पर आकर खड़ा हो जाए जहाँ हर रास्ता गहरी खाई की तरफ जाता हो, तब मनुष्य का विवेक भी डगमगाने लगता है। अम्बुज के साथ भी यही हो रहा था। रह-रहकर उनके कानों में हिंदी साहित्य के महान कवि गोपालदास नीरज की वो अमर पंक्तियाँ गूंज उठतीं—

"कुछ सपनों के मर जाने से, जीवन नहीं मरा करता है।"


​जीवन में जब भी कभी छोटी-मोटी परेशानियाँ आईं, अम्बुज ने हमेशा इन्हीं पंक्तियों को गुनगुनाकर खुद को संभाला था। वे अपने विद्यार्थियों को भी यही सिखाते थे कि परिस्थितियाँ कैसी भी हों, जीवन की गति कभी नहीं रुकनी चाहिए। लेकिन आज? आज जब वे खुद इस अंतहीन दलदल में धँस चुके थे, तो यही पंक्तियाँ उनके होठों पर आकर दम तोड़ देती थीं। वे जितनी बार इन शब्दों को दोहराते, उनके भीतर की असहायता उतनी ही और गहरी होकर उभरती। निराशा ने हृदय के सबसे सुरक्षित कोने में अपना पक्का ठिकाना बना लिया था।

​"ऐसे जीवन से क्या लाभ?" अम्बुज ने करवट बदलते हुए ठंडी सांस ली।

​यह सवाल पिछले कई दिनों से उनके दिमाग की दीवारों से टकराकर वापस लौट रहा था। एक ऐसा जीवन, जिसमें डर, ग्लानि और कुंठा ने स्वाभिमान की बलि ले ली हो। जिस समाज के निर्माण में उन्होंने अपनी पूरी जवानी खपा दी, आज उसी समाज ने उनसे अपनी नज़रें फेर ली थीं। कल तक जो आँखें आदर और सम्मान से झुकती थीं, आज उनमें या तो तीखी घृणा थी या फिर एक चुभती हुई दया। और एक आत्मसम्मान से जीने वाले शिक्षक के लिए दया का पात्र बन जाना, घृणा से भी बदतर मौत होती है।

​निराशा के इस घने कुहासे में घिरे अम्बुज ने कई बार अंधेरे में हाथ जोड़कर उस परमपिता से प्रार्थना की थी—"प्रभु, यदि मेरी नियति में यही अपमान लिखा था, तो मुझे अपने पास बुला लो। इस घुट-घुट कर जीने वाले जीवन से तो मृत्यु की गोद कहीं अधिक शांतिपूर्ण होगी।"

​लेकिन, जब-जब उनका मन हार मानकर पूरी तरह टूटने की कगार पर पहुँचता, उनकी अंतरात्मा के किसी अज्ञात कोने से एक प्रतिध्वनि सुनाई देती। वह आवाज़ उनसे कहती कि संकट चाहे कितने भी विकराल क्यों न हों, पीठ दिखाकर भागना कायरता है। नीरज जी ने जो लिखा था, वो सिर्फ कागज़ के पन्ने नहीं, बल्कि जीवन का सबसे बड़ा सच था। और तभी, मन के किसी झरोखे से एक और काव्यात्मक संजीवनी उनके भीतर जैसे प्राण फूंक देती:

कंटकों में पुष्प से खिलखिलाना सीख लो।

झंझटों में दर्द से स्वर मिलाना सीख लो।

लाख खुशियाँ मिलेंगी जीवन में तुम्हारे,

संकटों में गर्व से मुस्कुराना सीख लो।


​इन चार पंक्तियों में छुपा जो शौर्य था, वह अम्बुज के मुरझाए हुए चेहरे पर एक हल्की सी चमक बिखेर देता। यह पंक्तियाँ केवल शब्द नहीं थे, उनके लिए उस वक़्त एक आध्यात्मिक औषधि बन जाती थीं, जो उन्हें दोबारा खड़े होने का हौसला देती थीं। वे सोचने पर विवश हो जाते कि जीवन की इस गहनतम तमस निशा (अंधेरी रात) में वे भले ही अकेले विचरण कर रहे हैं, लेकिन उनकी जीवन-नाव का पतवार अभी पूरी तरह टूटा नहीं है।

​अम्बुज को याद आने लगते अपने वो गिने-चुने सच्चे मित्र और परिवार के लोग, जिन्होंने इस तबाही के दौर में भी उनका हाथ नहीं छोड़ा था। उनके प्रोत्साहन, उनकी दी हुई हिम्मत ने ही अम्बुज को इस लायक बनाए रखा था कि वे आज सांस ले पा रहे थे। मन ही मन वे उन सब अपनों के प्रति कृतज्ञता और ऋण के भाव से भर जाते।

​परंतु, अतीत की स्मृतियाँ बहुत क्रूर होती हैं। वे जब लौटती हैं, तो घावों को दोबारा हरा कर देती हैं। अम्बुज सोने के लिए जैसे ही आँखें मूंदते, ठीक उसी पल काल का वह क्रूर पहिया घूमकर उन्हें वहीं ले जाता, जहाँ से इस बर्बादी की पटकथा लिखी गई थी।

​२२ अगस्त २०२३... वह मनहूस तारीख, वह काली घड़ी, जब उनके हँसते-खेलते संसार पर एक ऐसा वज्रपात हुआ था, जिसने उनके अस्तित्व की नींव हिलाकर रख दी। घोर अभावों और तूफानों से अपनी कश्ती को किनारे तक लाने वाला यह नाविक समझ ही नहीं पाया कि जब कश्ती किनारे पर आ चुकी थी, तब सुनामी की एक ऐसी लहर आएगी जो उन्हें डूबने और उतराने के लिए गहरे समंदर में वापस फेंक देगी।

​अम्बुज ने कसकर अपनी आँखें बंद कर लीं, मानो वे उस दृश्य को देखने से बचना चाहते हों। लेकिन वह घटना किसी सिनेमा की रील की तरह उनके मानस पटल पर चलने लगी।

​वह दोपहर... वे अपनी कुर्सी पर बैठे रोज़मर्रा के दफ़्तरी कार्यों को निपटा रहे थे, तभी स्कूल के मुख्य दरवाज़े पर कुछ गाड़ियाँ आकर रुकीं...।

अध्याय १ समाप्त।


अध्याय २: २२ अगस्त २०२३: नियति का वज्रपात

​२२ अगस्त २०२३ की वह सुबह भी रोज़ की तरह ही सामान्य थी। सावन के बीतते दिनों की वह एक उमस भरी दोपहर थी। राजकीय मर्यादाओं और अनुशासन को अपने जीवन का मूलमंत्र मानने वाले प्रधानाचार्य अम्बुज हमेशा की तरह समय से पूर्व विद्यालय पहुँच चुके थे। प्रार्थना सभा, बच्चों की कतारें, और हवा में गूंजता राष्ट्रगान—यही उनकी दुनिया थी, यही उनका अध्यात्म था।

​दफ़्तर के कमरे में मेज पर सलीके से रखी फाइलें और एक कोने में रखी कलम अम्बुज की दिनचर्या की गवाह थीं। वे अपनी कुर्सी पर बैठे दैनंदिन कार्यों को निपटा रहे थे, शिक्षकों की उपस्थिति और आने वाले परीक्षाओं की रूपरेखा तैयार कर रहे थे। शिक्षा का मंदिर कहे जाने वाले इस परिसर में अम्बुज के लिए हर बच्चा और हर सहकर्मी एक परिवार की तरह था। वे इस बात से पूरी तरह अनभिज्ञ थे कि इस शांत समंदर के नीचे षड्यंत्र का एक कितना भयानक तूफान आकार ले रहा था।

​ठीक दोपहर के समय, स्कूल के मुख्य द्वार पर अचानक कुछ गाड़ियाँ आकर रुकीं। दरवाज़े बंद होने की धमक और भारी जूतों की आवाज़ ने परिसर की शांति को भंग कर दिया। अम्बुज ने अपनी मेज से नज़रें उठाई ही थीं कि उनके कमरे का दरवाज़ा धड़धड़ाते हुए खुला।

​क्षेत्र के प्रभावशाली राजनीतिक रसूख और सत्ता के अहंकार से चूर स्थानीय काउन्सलर महोदया अपने लाव-लश्कर के साथ दफ़्तर में दाखिल हुईं। उनके साथ उनके कुछ वफादार गुर्गे थे, जिनकी आँखों में शिष्टाचार की जगह एक अजीब सी धृष्टता थी। इसी भीड़ के बीच से आगे आया अनिल, जिसके हाथ में एक प्रेस का कार्ड चमक रहा था। उसने एक बनावटी और शातिराना मुस्कान के साथ काउन्सलर महोदया का परिचय कराया।

​"सर, ये हमारी काउन्सलर साहिबा हैं," अनिल ने कार्ड लहराते हुए कहा। उसके साथ एक अन्य महिला और उसका सगा भाई सुनील (सुशील) भी थे। रसूख का प्रदर्शन करने के लिए उनके पीछे दो मुस्तैद अंगरक्षक खड़े थे—एक निजी सुरक्षाकर्मी और दूसरा सरकारी गनर।

​एक सम्मानित शिक्षक और संस्था के प्रमुख होने के नाते अम्बुज ने अपनी सहज शालीनता का परिचय दिया। उन्होंने उठकर काउन्सलर का स्वागत करना चाहा, लेकिन सत्ता के मद में चूर उन लोगों को किसी औपचारिकता की परवाह नहीं थी। वे बिना किसी अनुमति या पूर्व सूचना के, सीधे दफ़्तर को पार करते हुए क्लासरूम्स की तरफ बढ़ गए।

​अम्बुज कुछ समझ पाते, इससे पहले ही काउन्सलर महोदया और उनके साथ आई महिला सीधे उन कक्षाओं में जा पहुँचीं जहाँ छात्राएं पढ़ रही थीं। उनके हाथों में पहले से लिखी-लिखाई एक स्क्रिप्ट थी, एक ऐसा झूठा दस्तावेज़ जिसे बड़ी चालाकी से तैयार किया गया था। उन मासूम, भोली-भाली लड़कियों को डरा-धमकाकर और अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके, वे उस कागज़ पर जबरन उनके हस्ताक्षर करवाने लगीं। लड़कियां सहम गईं; उन्हें अंदाज़ा भी नहीं था कि उनके इन हस्ताक्षरों का इस्तेमाल किस भयानक साजिश के लिए होने जा रहा था।

​उधर अपने ऑफिस में बैठे अम्बुज इस पूरी हलचल से अनजान थे। उनके मन में बस यही विचार था कि शायद कोई स्थानीय जनप्रतिनिधि स्कूल की व्यवस्था देखने या किसी सामान्य समस्या को लेकर आया है। शिक्षक का हृदय हमेशा सामने वाले में भद्रता ही देखता है। वे उन मेहमानों के लिए मान-मनुहार और ठंडे पानी आदि की व्यवस्था करने में जुट गए। उन्होंने प्यून को बुलाकर पानी लाने का निर्देश दिया।

​लेकिन शातिर दिमाग अनिल ऑफिस के बाहर खड़े होकर किसी और ही खूनी पटकथा को अंतिम रूप दे रहा था। उसकी आँखें लगातार स्कूल के गेट की तरफ लगी हुई थीं। जैसे ही काउन्सलर महोदया का क्लासरूम में काम पूरा हुआ, अनिल ने अपने मोबाइल से एक इशारा किया।

​पलक झपकते ही, लाठियों, डंडों, हेलमेट और धारदार हथियारों से लैस पचास-साठ असामाजिक तत्वों की एक हिंसक भीड़ स्कूल परिसर के भीतर घुस आई। शोर-शराबा, गालियों की बौछार और चीख-पुकार से पूरा परिसर गूंज उठा।

​अम्बुज ने जब बाहर हंगामा सुना, तो वे अपनी कुर्सी से खड़े हुए। उन्हें लगा कि शायद कोई अभिभावक अपनी किसी समस्या को लेकर उग्र हो रहा है, जैसा कि कभी-कभार स्कूलों में हो जाता है। वे पूरी तरह निश्चिंत और निहत्थे थे। वे इस बात के लिए कतई तैयार नहीं थे कि उनके अपने ही दफ़्तर की चौखट मौत का कुआँ बनने जा रही है।

​"मारो! छोड़ना मत इसे!" एक तेज आवाज़ गूंजी।

​इससे पहले कि अम्बुज कुछ बोल पाते या संभल पाते, वह हिंसक भीड़ उनके दफ़्तर के भीतर ढह गई। साठ लोगों की उस हिंसक भीड़ ने उस अकेले, निहत्थे हेडमास्टर को चारों तरफ से घेर लिया। जिसके हाथ में जो आया—लाठी, डंडा, हेलमेट, चाकू—उसी से अम्बुज पर हमला बोल दिया गया।

​एक तेज धारदार हथियार हवा में लहराया और सीधे अम्बुज के सिर पर आकर लगा। खून का एक गर्म फव्वारा छूटा और उनकी आँखों के आगे अंधेरा छाने लगा। लेकिन हमलावर इतने पर भी नहीं रुके। सिर पर, पीठ पर, कंधों पर हेलमेट और डंडों के अंधाधुंध वार होते रहे। अम्बुज ने अपने हाथों से सिर को बचाने का निष्फल प्रयास किया, लेकिन उन कोमल हाथों में साठ भेड़ियों का मुकाबला करने की ताकत कहाँ थी?

​मारते-मारते जब अम्बुज का शरीर पूरी तरह लहूलुहान हो गया और वे अचेतन अवस्था में फर्श पर गिर पड़े, तब जाकर उन गुंडों का दिल भरा। वे उन्हें मरा हुआ समझकर पीछे हटे।

​कमरे की दीवारें, किताबें और फर्श अम्बुज के खून से लाल हो चुके थे। जैसे-तैसे, अपनी अंतिम सांसों को बटोरकर, असीम पीड़ा के बीच अम्बुज ने हिम्मत की। वे दीवारों का सहारा लेते हुए, घिसटते हुए दफ़्तर से बाहर खुले मैदान की तरफ निकले ताकि किसी से मदद मांग सकें।

​लेकिन बाहर का नज़ारा तो और भी खौफनाक था। शातिर अनिल वहाँ पहले से ही खड़ा मुस्कुरा रहा था। उसने अपनी स्क्रिप्ट के अनुसार पुलिस को पहले ही बुला लिया था। पुलिस की गाड़ी सायरन बजाती हुई स्कूल परिसर में दाखिल हुई। न्याय करने नहीं, बल्कि अन्याय की उस पटकथा के अगले अंक को पूरा करने।

​लहूलुहान, फटे हुए कपड़ों में कांपते अम्बुज को पुलिस ने सहारा देने के बजाय एक अपराधी की तरह खींचकर गाड़ी में डाल दिया।

​थाने पहुँचते ही, दर्द से कराहते अम्बुज के सामने दरोगा ने अपने पैर मेज पर रखे और अभद्र लहजे में हंसते हुए पूछा—"कहिए गुरुजी! क्या गुल खिला कर आ रहे हो? क्या किया था ऐसा?"

​अम्बुज ने फटी और सूजी हुई आँखों से उस खाकी वर्दी को देखा। सिर से बहता खून उनकी आँखों में जा रहा था। वे मन ही मन चीख उठे—'क्या विडंबना है इस संसार की! हमला मुझ पर हुआ, लहूलुहान मैं हूँ, और उल्टे सवाल मुझसे ही?'

​लेकिन वे सीधे-सरल शिक्षक थे, वे नहीं जानते थे कि न्याय अंधा नहीं होता, बल्कि उसे चंद सिक्कों की खनक से अंधा बना दिया जाता है। पुलिस बिक चुकी थी। कानून के रखवाले उस ताकतवर राजनीति और अनिल के पैसों के आगे नतमस्तक थे। अम्बुज की तहरीर (रिपोर्ट) लिखने को कोई मुंशी तैयार नहीं था। दूसरी तरफ से अम्बुज के खिलाफ गंभीर धाराओं में झूठी रिपोर्ट पहले ही दर्ज की जा चुकी थी।

​काफी समय बीतने और जब अम्बुज के कुछ शुभचिंतकों और मित्रों का दबाव पड़ा, तब कहीं जाकर पुलिस ने बेमन से अम्बुज की तरफ से एक कमजोर सी रिपोर्ट दर्ज की।

​अम्बुज ने आज तक फिल्मों में देखा था या किताबों में पढ़ा था कि खाकी का स्तर गिर सकता है, लेकिन नोटों की चमक इंसान के विवेक को इस हद तक अंधा कर सकती है कि न्याय का गला घोंटकर षड्यंत्र को मुकुट पहना दिया जाए, इसका साक्षात साक्षात्कार उन्होंने आज कर लिया था।

​विपत्ति की यह तो बस शुरुआत थी। तमस की यह रात अभी और गहरी होने वाली थी।

अध्याय २ समाप्त।


थाने के एक कोने में बनी वह लोहे की सलाखें अम्बुज को किसी कालकोठरी की तरह डरा रही थीं। भारी मन और लहूलुहान शरीर के साथ जब उन्हें उस हवालात के भीतर धकेला गया, तो लोहे के भारी दरवाज़े के बंद होने की आवाज़ सीधे उनके दिल पर चोट कर गई। 'खटाक' की वह ध्वनि जैसे उनके स्वाभिमान की आखिरी सांस थी।

​अम्बुज फर्श पर एक कोने में चुपचाप बैठ गए, जहाँ उमस, सीलन और पसीने की एक अजीब सी बदबू हवा में तैर रही थी। आँखों के आगे से आंसुओं और खून की सूखी परतें हट नहीं रही थीं। विचारों का जो सैलाब पिछले कुछ घंटों से मन में उमड़ रहा था, वह अब थककर शांत हो चुका था। मन पूरी तरह सुन्न था। रह-रहकर बस एक ही अध्यात्मिक और विवश विचार दिमाग में कौंध जाता था—“अब वही होगा, जो राम ने रच रखा है।” जब मनुष्य के सारे पुरुषार्थ और सत्य को व्यवस्था कुचल देती है, तब वह खुद को नियति के भरोसे ही छोड़ देता है।

​रात गहराने के साथ सिर के घाव का दर्द असहनीय होता जा रहा था। फटी हुई चमड़ी और जमे हुए खून पर मक्खियाँ भिनभिना रही थीं। दर्द की एक तेज लहर रीढ़ की हड्डी से होते हुए पूरे दिमाग को झकझोर देती थी, लेकिन उस निष्ठुर थाने में कोई पानी पूछने वाला भी नहीं था।

​समय का कोई अंदाज़ा नहीं था, लेकिन रात के सन्नाटे को चीरती हुई एक कड़क आवाज़ गूंजी। कोई सिपाही ताला खोल रहा था। रात का लगभग एक बजा होगा।

​"ए मास्टर! उठ। चलो, गाड़ी में बैठो," सिपाही ने रुखाई से आदेश दिया।

​शरीर में उठने की ताकत नहीं थी, लेकिन एक सच्चे और मर्यादित शिक्षक के संस्कार अम्बुज के भीतर कूट-कूट कर भरे थे। वे एक आज्ञाकारी छात्र की तरह बिना कोई प्रतिवाद किए खड़े हुए, अपने दर्द को दबाया और सिपाही के पीछे-पीछे चल दिए। उन्हें पुलिस की एक सरकारी गाड़ी में बैठाया गया।

​गाड़ी शहर की सूनी सड़कों को पार करती हुई 'मणिपाल हॉस्पिटल' के आपातकालीन कक्ष (इमरजेंसी वार्ड) के सामने जाकर रुकी। डॉक्टरों ने अम्बुज की गंभीर हालत को देखा। सिर के घावों का निरीक्षण किया गया, पट्टियाँ बांधी गईं और कुछ प्राथमिक उपचार देकर दवाइयाँ दी गईं। दर्द में थोड़ी राहत तो मिली, लेकिन मानसिक घाव का कोई इलाज उस अस्पताल के पास नहीं था। उपचार की औपचारिक प्रक्रिया पूरी होते ही, पुलिस वाले उन्हें दोबारा उसी सरकारी गाड़ी में लादकर वापस ले आए और उसी ठंडी, बदबूदार हवालात में बंद कर दिया।

​यह रात अम्बुज के जीवन की सबसे लंबी और खौफनाक रात होने वाली थी। उस छोटी सी हवालात में वे अकेले नहीं थे। वहाँ समाज के वो शातिर और आदतन अपराधी भी बंद थे, जिनके लिए अपराध एक पेशा और थाना उनका दूसरा घर था।

​रात भर उन अपराधियों का तांडव चलता रहा। कोई गंदी गालियाँ बक रहा था, कोई पुलिस वालों को चुनौती दे रहा था, तो कोई दीवार पर सिर मारकर हंगामा कर रहा था। पूरा वातावरण अश्लीलता, हिंसा और अराजकता से भरा हुआ था। अम्बुज एक कोने में सिमटे, घुटनों में सिर छिपाए यह सब चुपचाप देख रहे थे।

​बचपन से लेकर आज तक, उन्होंने जीवन में अनगिनत संघर्ष देखे थे। घोर अभावों में दिन काटे थे, सफलता पाने के लिए दिन-रात एक किए थे, जीवन के न जाने कितने पापड़ बेले थे। लेकिन यह अनुभव? यह पीड़ा? यह उनके जीवन के हर पिछले संघर्ष से बिल्कुल अलग और परे थी।

​जिस व्यक्ति ने अपना पूरा जीवन राष्ट्र धर्म के लिए समर्पित कर दिया हो, जिसने शिक्षा के क्षेत्र में नए कीर्तिमान स्थापित किए हों, जिसके पढ़ाए बच्चे आज समाज में बड़े पदों पर आसीन थे... उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि नियति उसके खाते में एक ऐसा कलंकित कीर्तिमान भी दर्ज कर देगी। जीवन का यह मोड़ सबसे क्रूर था।

​जैसे ही सुबह की पहली किरण हवालात की छोटी सी रोशनदान से भीतर आई, थाने में हलचल बढ़ गई।

​अम्बुज के कुछ गिने-चुने शुभचिंतक और एक साथी—जो साए की तरह पहले दिन से उनके साथ खड़ा था—थाने पहुँच चुके थे। सलाखों के बाहर समझौते के दौर शुरू हुए। विपक्षी और उनके आकाओं की तरफ से तरह-तरह की शर्तें रखी जाने लगीं। दबाव बनाने की कोशिशें हुईं, लेकिन अम्बुज का सत्य झुकने को तैयार नहीं था और विपक्षियों का अहंकार टूटने को। अंततः समझौते के सारे प्रयास एक-एक करके असफल हो गए।

​धीरे-धीरे सूरज चढ़कर ढलने लगा। शाम की कालिमा फिर से आसमान पर छाने लगी। अम्बुज का वह वफादार साथी लगातार भाग-दौड़ कर रहा था। वह अपने प्रिय शिक्षक, अपने भाई को उस नर्क से बाहर निकालने के लिए छटपटा रहा था। उसने कानून के दायरे में रहकर साम, दाम, दंड, भेद—सारे तरीके आज़मा लिए, लेकिन सत्ता के शीर्ष से आ रहे दबाव के कारण बाहर निकलने का कोई रास्ता, कोई खिड़की नज़र नहीं आ रही थी।

​जब सारे रास्ते बंद हो गए, तो उस साथी ने अंततः अपना 'ब्रह्मास्त्र' चलाने का फैसला किया। वह समाज के दो-चार रसूखदार, निष्पक्ष और भले लोगों को अपने साथ लेकर सीधे पुलिस अधीक्षक (एसपी) के सामने जा खड़ा हुआ। इस बार बात सिर्फ कानून की नहीं, बल्कि एक निर्दोष शिक्षक के साथ हो रहे अन्याय और मानवाधिकारों के उल्लंघन की थी। साथियों ने पूरी निडरता के साथ अधीक्षक को कानूनी और सामाजिक परिणामों की चेतावनी देते हुए घेरा।

​इस बार निशाना बिल्कुल सही जगह लगा। उच्च अधिकारी को समझ आ गया कि मामला दबाने से बात और बिगड़ सकती है। आनन-फानन में थाने को निर्देश जारी किए गए। तत्काल कागजी औपचारिकताएं पूरी की गईं।

​और इस तरह, ठीक ३४ घंटों के अमानवीय उत्पीड़न के उपरांत अम्बुज को उस हवालात से मुक्त किया गया। यह जानते हुए भी कि कानूनन किसी भी व्यक्ति को २४ घंटे से अधिक पुलिस अभिरक्षा में नहीं रखा जा सकता और उसे न्यायालय में प्रस्तुत करना अनिवार्य होता है, पुलिस ने सत्ता के दबाव में ३४ घंटे तक अम्बुज को बंधक बनाए रखा था।

​रात के अंधेरे में अम्बुज अपने घर पहुँचे। दो दिन के मानसिक और शारीरिक नर्क को भोगने के बाद उन्होंने स्नान किया और बिस्तर पर लेटे। वे सोने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन नींद आँखों से कोसों दूर थी। जैसे ही वे आँखें बंद करते, सलाखों की परछाईं उनकी आँखों के सामने आ जाती। वे बार-बार खुद से यही पूछते कि आख़िर उनके किस जुर्म की यह सज़ा थी? जीवन के इन दो महत्वपूर्ण दिनों ने उनके पूरे अतीत पर एक अमिट ग्रहण लगा दिया था।

​अगली सुबह जब अखबार घर आया, तो स्थिति और भयावह हो चुकी थी। अखबारों की सुर्खियाँ और स्थानीय समाचार चैनलों की हेडलाइंस में अम्बुज का नाम और उनका कथित 'प्रेस नोट' प्रमुखता से छप चुका था। आधी-अधूरी, मनगढ़ंत और सनसनीखेज खबरों ने समाज के सामने अम्बुज की चारित्रिक हत्या पूरी तरह से कर दी थी।

​अम्बुज खुली हवा में तो थे, लेकिन वे समझ चुके थे कि असली जेल तो अब शुरू हुई है।

अध्याय ३ समाप्त।


अध्याय ४: विकट काल का सप्ताह

​२२ अगस्त से २९ अगस्त २०२३ तक का वह समय अम्बुज के जीवन का सबसे विकट, सबसे क्रूर और अंधकारमय सप्ताह था। ३४ घंटे की उस अमानवीय हवालात से भले ही उनका शरीर मुक्त हो चुका था, लेकिन समाज की संकीर्णता ने उन्हें एक अदृश्य, मानसिक कारागार में कैद कर दिया था।

​घर के भीतर पसरे सन्नाटे को चीरते हुए अम्बुज का मोबाइल फोन लगातार घनघना रहा था। सहानुभूति का एक कथित दौर शुरू हो चुका था। कुछ लोग फोन पर सांत्वना दे रहे थे, तो कुछ साक्षात मिलने भी चले आ रहे थे। लेकिन अम्बुज शिक्षक थे, वे इंसानी चेहरों के पीछे छिपे भावों को पढ़ना बखूबी जानते थे। आने वाले लोग ऊपर से तो अपनापन और हमदर्दी जताते, लेकिन उनकी आँखों में कौंध रहा एक गुप्त और घिनौना प्रश्न सारी सहानुभूति को पल भर में धराशायी कर देता।

​आरोप ही कुछ ऐसा था—चरित्र पर लगा लांछन। यह एक ऐसा विषैला तीर है जो मनुष्य के प्राण तो नहीं लेता, लेकिन उसके स्वाभिमान को हर क्षण कत्ल करता है। इस घिनौने आरोप के कारण मिलने आने वालों के मन में घृणा और जिज्ञासा एक साथ जन्म ले रही थी। वे सांत्वना देने नहीं, बल्कि गड़े मुर्दे उखाड़ने और अपनी उत्सुकता शांत करने आ रहे थे। समाज का यह दोहरा रवैया अम्बुज के भीतर तक चुभ रहा था। स्थिति इतनी असहज हो चुकी थी कि अम्बुज को अपनी ही नजरों से छिपना पड़ रहा था। रातों को चैन की नींद सोने के बजाय, वे रोज अपना स्थान बदल-बदल कर, कभी इस परिचित के यहाँ तो कभी उस ठिकाने पर छिपकर रातें गुज़ार रहे थे। अपने ही शहर में, अपने ही लोगों के बीच एक अपराधी की तरह भटकने की इस आत्मग्लानि को अम्बुज अपने कई जन्मों तक नहीं भूल सकते थे।

​इस बात से अम्बुज पूरी तरह अनभिज्ञ थे कि व्यवस्था का जाल उन पर और कड़ा किया जा चुका था। उनका मोबाइल नंबर चुपके से सर्विलांस (निगरानी) पर लगा दिया गया था। उनकी हर बात, हर हरकत पर खाकी की पैनी नज़र थी।

​उधर, उस खूनी ड्रामे का मुख्य सूत्रधार और विलेन अनिल इस बात से बुरी तरह छटपटा रहा था। उसकी पूरी साजिश नाकाम होती दिख रही थी। उसे यह बात हजम नहीं हो पा रही थी कि इतना घिनौना, सुनियोजित आरोप लगाने के बाद भी अम्बुज सिर्फ ३४ घंटे में पुलिस की गिरफ्त से बाहर कैसे आ गया? उसे छोड़ा ही क्यों गया?

​अपनी असफलता से बौखलाए अनिल ने इस बार एक और बड़े, शातिर और षड्यंत्रकारी महंत से हाथ मिलाया। दोनों ने मिलकर इस चरित्र-हत्या के खेल को एक नया और ज्यादा खतरनाक मोड़ देने की योजना बनाई। जिन मासूम लड़कियों को मोहरा बनाकर पहली स्क्रिप्ट लिखी गई थी, उन्हें दोबारा डराया-धमकाया गया। इस बार साजिश को वीभत्स रूप देने के लिए, किसी मेडिकल लैब से खून का इंतजाम किया गया। उस खून से एक फर्जी शिकायती पत्र (लेटर) लिखवाया गया—एक ऐसा पत्र जो साक्षात किसी का भी कलेजा कँपा दे।

​और फिर, उस 'खून से लिखे पत्र' को सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया गया। यह पत्र इंटरनेट पर किसी बम धमाके की तरह फटा।

​आज के इस दौर में, महिलाओं या बच्चियों से जुड़े संवेदनशील मुद्दों पर राजनीति की रोटियां सेकना सबसे आसान काम बन चुका है। विपक्ष को घर बैठे-बैठे सरकार को घेरने का एक चमचमाता हुआ मुद्दा मिल गया। विपक्ष के एक बड़े और रसूखदार 'टोपी वाले नेता' ने तुरंत इस वायरल पत्र को लपक लिया और अपने ट्विटर (X) हैंडल पर एक आक्रामक पोस्ट डाल दी। नेता ने सरकार की कानून व्यवस्था पर तीखे सवाल दाग दिए।

​जब कोई भी सरकार राजनीतिक रूप से बैकफुट पर आती है, तो वह सही और गलत का फैसला नहीं करती; वह केवल अपना 'डैमेज कंट्रोल' (नुकसान की भरपाई) करने में जुट जाती है। उस समय सत्ता के गलियारों में बैठे 'बुलडोजर धारी आकाओं' को सिर्फ और सिर्फ सामने दिख रहा २०२४ का लोकसभा चुनाव नजर आ रहा था। उन्हें जनमत चाहिए था, सच नहीं। आदेश ऊपर से नीचे की तरफ कौंधा कि येन-केन-प्रकारेण अम्बुज को दोबारा उठाया जाए और जेल भेजा जाए, ताकि सरकार की छवि पर आंच न आए।

​एक दोपहर, स्थानीय चौकी प्रभारी का अम्बुज के पास फोन आया, "गुरुजी, एक बार आकर चौकी पर मिल लो, कुछ औपचारिकताएं बची हैं।"

​खतरे की बू अम्बुज को आ चुकी थी। वे स्वयं न जाकर, कानून और खाकी पर भरोसा करते हुए, अपनी दो सगी बहनों को अपने जवान बेटे के साथ चौकी पर भेज दिया। लेकिन वे यह भूल गए थे कि भेड़ियों के इलाके में कभी अपनों को नहीं भेजा जाता। जैसे ही ये लोग चौकी पहुँचे, पुलिस ने जाल बिछा दिया। औपचारिकता के नाम पर उन्हें वहीं बंधक बना लिया गया।

​बहनें तो किसी प्रकार रोती-बिलखती और पुलिस की मिन्नतें करके वहाँ से बाहर निकलने में सफल रहीं, लेकिन पुलिस ने अम्बुज के निर्दोष बेटे को थाने में ही बिठा लिया। उसे एक मोहरे की तरह इस्तेमाल किया जा रहा था ताकि अम्बुज खुद-ब-खुद सरेंडर कर दे।

​उस रात थाने की उस सीलन भरी कोठरी में अम्बुज के बेटे की रात कैसे कटी, वह खौफ और मानसिक प्रताड़ना कैसी थी, यह सिर्फ वही निर्दोष बेटा जान सकता था। जिस बेटे का कोई कसूर नहीं था, उसने अपने पिता के सम्मान और पिता की खातिर अपनी एक रात की आज़ादी खो दी थी। अपने कलेजे के टुकड़े के साथ हुए इस अन्याय और उसकी इस लाचारी को अम्बुज अपने जीते जी कभी भुला नहीं सकते थे।

​षड्यंत्र अब अपने चरम पर था, और अगली रात अम्बुज के जीवन की 'कयामत की रात' बनने जा रही थी।

अध्याय ४ समाप्त।


अध्याय ५: कयामत की रात और थाने की ओर यात्रा

​अम्बुज के बेटे की वह रात कोई वापस नहीं लौटा सकता था। थाने की उस सर्द और खौफनाक हवा में, बिना कुछ खाए-पिए, एक बेकसूर बेटे ने जो खौफ झेला था, उसकी टीस शब्दों में बयान नहीं हो सकती थी। लेकिन उधर, अपने बेटे को पुलिस की कस्टडी में छोड़कर भटक रहे अम्बुज की रात कैसे कटी, उसका जिक्र किया जाना इस गाथा की सबसे बड़ी मांग है।

​जब यह पूरी तरह साफ हो गया कि आज की रात पुलिस कुछ भी कर सकती है, तो अम्बुज के शुभचिंतकों ने उन्हें छिप जाने की सलाह दी। राज्य सरकार का भारी दबाव था, और खाकी अपने नंबर बढ़ाने के लिए किसी भी हद तक गिर सकती थी। पुलिस पकड़कर क्या हथकंडे अपनाएगी—थर्ड डिग्री टॉर्चर, अमानवीय यातनाएं—यह सोचकर ही रूह कांप जाती थी। अम्बुज को कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए कम से कम आज की रात अपने शरीर को सुरक्षित रखना बेहद जरूरी था।

​इस घोर अंधकार के बीच, नियति ने एक सुखद मोड़ लिया। उस कयामत की रात में अम्बुज के लिए एक परिचित बेटी साक्षात देवदूत बनकर सामने आई। वह भी किसी की बेटी थी, लेकिन उसने उन 'ब्रेनवॉश' की गई लड़कियों की तरह मर्यादाएं नहीं लांघी थीं, जिन्होंने झूठे अहंकार और अनिल के बहकावे में आकर एक पवित्र शिक्षक पर कीचड़ उछाला था। इस साहसी बेटी ने उस विकट परिस्थिति में अम्बुज की रक्षा करना अपना परम धर्म समझा।

​अम्बुज ने तुरंत अपने मोबाइल फोन बंद किए ताकि सर्विलांस की लोकेशन पुलिस को न मिल सके। एक अनजान कैब बुक की गई और वे रात के सन्नाटे को चीरते हुए उस परिचित के सुरक्षित ठिकाने पर जा पहुँचे। रात भर नींद तो आँखों से कोसों दूर थी। अम्बुज उस परिचित के फोन के जरिए अपने गिने-चुने शुभचिंतकों और वफादार मित्रों के साथ लगातार संपर्क में बने रहे।

​रणनीति साफ थी—सुबह होते ही आत्मसमर्पण करना होगा, क्योंकि अम्बुज के प्राण उनके बेटे में अटके थे। पुलिस रात भर उनके बेटे को गाड़ी में बैठाकर नगर के हर उस कोने और ठिकाने पर घूमती रही, जहाँ अम्बुज के परिचित रहते थे। पुलिस का मकसद अम्बुज को मनोवैज्ञानिक रूप से तोड़ना था, लेकिन वे हर जगह असफल रहे।

​रात भर अम्बुज के वफादार साथियों के फोन की घंटियाँ बजती रहीं। संकट के इस दौर में अम्बुज अकेले नहीं थे; उनके साथ कई भले परिवार उस रात सोए नहीं थे। सभी ने एक सुर में आश्वासन दिया—"गुरुजी, आप हिम्मत रखिए। सुबह ठीक ९ बजे हम सब आपके साथ थाने चलेंगे।" अम्बुज उन परिवारों के इस निस्वार्थ अहसान को इस जीवन में कभी नहीं भूल सकते थे। उधर, सुबह की पहली किरण की बाट जोहता उनका बेटा आसमान की तरफ देख रहा था। उसे अपने पिता के चरित्र पर पूरा भरोसा था, वह जानता था कि उसके पिता ने कोई गलत काम नहीं किया, लेकिन इस क्रूर व्यवस्था में बेकसूर होने की सजा तो वह भुगत ही रहा था।

​प्रातः काल हुआ। अम्बुज उठे, उन्होंने खुद को मानसिक रूप से मजबूत किया। आज वे उस यात्रा पर निकलने वाले थे जिसके कष्टों की कोई सीमा नहीं थी। अम्बुज ने अपने पुत्र समान प्रिय शिष्य सोम को आवाज दी। सोम बिना एक पल गंवाए, अपनी कार लेकर अपने आदरणीय पिताजी के साथ वहाँ पहुँच गया।

​अम्बुज ने अपनी पहचान छिपाने और सुरक्षित थाने तक पहुँचने के लिए अपनी टी-शर्ट उतारी और उस परिचित की एक शर्ट धारण की। सोम की कार का दरवाजा खुला। अमूमन कार में बैठना सुखद अहसास देता है, लेकिन आज सोम की गाड़ी की वह सवारी अम्बुज को ऐसी लग रही थी जैसे वे साक्षात नरक के द्वार में प्रवेश करने जा रहे हों। रास्ते में उन्होंने अपने उस सबसे भरोसेमंद साथी को भी गाड़ी में बिठाया, जिसने पहले दिन से परछाई की तरह उनका साथ दिया था।

​पुलिस की अपनी एक गढ़ी-गढ़ाई कहानी होती है, कुछ तयशुदा शब्द होते हैं जिन्हें लिखकर वे अपनी औपचारिकता पूरी करते हैं। पुलिस ने रात भर इस स्क्रिप्ट का अभ्यास कर लिया था, क्योंकि उन पर राज्य सरकार का भारी दबाव था। २०१४ का लोकसभा चुनाव नजदीक था, और विपक्ष के एक ट्वीट ने सरकार को डैमेज कंट्रोल के लिए मजबूर कर दिया था। आज लड़ाई सही और गलत की नहीं थी, आज लड़ाई सच और झूठ की नहीं थी; आज लड़ाई 'जनमत' की थी। और राजनीति के उस गंदे खेल में, जनमत के भूखे भेड़ियों के सामने सत्य बिल्कुल बौना हो चुका था।

​२०२४ के लोकसभा चुनाव का एक बेकसूर मोहरा बने अम्बुज की गाड़ी जैसे ही थाने के गेट पर रुकी, थाना इंचार्ज खुद बाहर खड़े मिले। ऐसा लग रहा था कि वे किसी वीवीआईपी (VVIP) के स्वागत में रात भर से पलकें बिछाए बैठे हों। अम्बुज को देखते ही इंचार्ज की बांछें खिल गईं; चेहरे पर एक घिनौना संतोष तैर गया, मानो उनकी कोई बड़ी मुराद पूरी हो गई हो।

​इंचार्ज ने बड़े आदर के साथ अम्बुज को अपने चैम्बर में बैठाया। चाय मंगवाई गई, बिस्कुट खिलाए गए, जोरदार आवभगत होने लगी। अम्बुज मुस्कुराए; वे समझ रहे थे कि यह खातिरदारी ठीक वैसी ही है जैसे हलाल करने से पहले बकरे को हरी घास खिलाई जाती है।

​तभी इंचार्ज साहब अत्यंत विनम्र और बनावटी लहजे में बोले, "गुरुजी, अब बाहर अग्रिम प्रक्रिया के लिए विपक्षी और मीडिया वाले आते ही होंगे। आप तब तक जरा अंदर बैठ लीजिए।" उन्होंने बहुत ही सलीके से हवालात की तरफ इशारा किया।

​एक मर्यादित और आज्ञाकारी बालक की तरह अम्बुज उठे और हवालात की तरफ बढ़ गए। तभी एक दीवान रैंक का पुलिसकर्मी आया और बोला, "गुरुजी, अब आपको इसके अंदर बैठना होगा।"

​अम्बुज ने बिना किसी विरोध के आज्ञा का पालन किया और उस लोहे के सीलन भरे पिंजरे के भीतर पैर रख दिए। बाहर से भारी ताला लगा दिया गया। 'खटाक' की आवाज़ गूंजी।

​अम्बुज अभी फर्श पर बैठने ही वाले थे कि एक दूसरा सिपाही वहाँ आया और बोला, "गुरुजी, जरा सलाखों के पास सीधे खड़े हो जाइए।"

​अम्बुज को जैसा कहा गया, उन्होंने वैसा ही किया। सिपाही ने अपने मोबाइल से अम्बुज के दो-चार फोटो खींचे, ताकि अपने हाईकमान को यह रिपोर्ट भेजी जा सके कि 'हाईलाइटेड अपराधी' को सफलतापूर्वक गिरफ्तार कर लिया गया है। तभी संबंधित चौकी प्रभारी भी वहाँ अपनी विजय का जश्न मनाने आ पहुँचा। उसने अम्बुज को हवालात से बाहर निकाला और गलियारे में कुछ कदम परेड कराते हुए एक वीडियो बनाई, ताकि गिरफ्तारी पूरी तरह असली और नाटकीय लगे। पुलिस के लिए अपनी पीठ थपथपाने और आला अफसरों की नजरों में नंबर बढ़ाने का यह सबसे मुफीद जरिया था।

​अब गाड़ी में बैठाकर कोर्ट ले जाने से पहले एक आखिरी और सबसे क्रूर रस्म निभाई जानी बाकी थी—वह रस्म जो हर मुलजिम की आत्मा को तोड़ देती है।

​एक सिपाही लोहे की भारी, ठंडी हथकड़ियाँ लेकर आगे बढ़ा। 'कच-कच' की आवाज़ के साथ वे हथकड़ियाँ अम्बुज के नाजुक, कोमल हाथों में कस दी गईं। हथकड़ियाँ मानो अम्बुज के बेकसूर होने का मज़ाक उड़ाते हुए अपनी क्रूर विजय पर मुस्कुरा रही थीं। जिन हाथों में हमेशा ज्ञान की कलम शोभा पाती थी, जो हाथ बच्चों का भविष्य लिखते थे, आज उन कोमल हाथों को लोहे के उस क्रूर जाल ने जकड़ लिया था।

​पुलिस को लग रहा था कि उन्होंने अम्बुज की शक्ति को कैद कर लिया है, वे अब कभी कुछ लिख नहीं पाएंगे। लेकिन यह मूर्ख समाज और अंधी व्यवस्था यह भूल गई थी कि शरीर को तो सलाखों में कैद किया जा सकता है, मगर कवित्व की शक्ति और अंतरात्मा की आवाज़ को कैद करना नामुमकिन है। जब भगवान कृष्ण को कंस के कारागार की भारी दीवारें और लोहे की जंजीरें गोकुल जाने से नहीं रोक पाई थीं, तो भला इन चंद रुपयों में बिकी खाकी और हथकड़ियों की क्या औकात थी जो सत्य की इस आवाज को दबा पातीं?

​अम्बुज ने हथकड़ियों से बंधे अपने हाथों को देखा, गहरी सांस ली, और न्याय की उस अंतहीन, पथरीली डगर पर अपने कदम आगे बढ़ा दिए।

अध्याय ५ समाप्त।


अध्याय ६: ६ जनवरी २०२५: आत्मसमर्पण की अग्निपरीक्षा

​समय का चक्र अपनी गति से घूमता रहा। २२ अगस्त २०२३ की उस खूनी दोपहर से लेकर जनवरी २०२५ की इस सर्द सुबह तक, अम्बुज के जीवन का हर एक दिन किसी जलते हुए अंगारे पर पैर रखने जैसा था। इस बीच कई तारीखें आईं, कई अदालती नोटिस आए, और जांच के नाम पर फाइलों का पेट भरा जाता रहा। लेकिन सत्य को पूरी तरह स्थापित करने के लिए अभी एक और बड़ी और अंतिम कानूनी अग्निपरीक्षा से गुजरना बाकी था—न्यायालय के समक्ष औपचारिक आत्मसमर्पण।

​६ जनवरी २०२५। कड़ाके की ठंड और घने कोहरे ने पूरे शहर को अपनी आगोश में ले रखा था। सूरज की किरणें भी कोहरे की मोटी चादर को चीरने में असमर्थ थीं, ठीक उसी तरह जैसे व्यवस्था के घने कुहासे में अम्बुज का बेकसूर होना छिपा हुआ था।

​अम्बुज आज सुबह समय से पहले ही तैयार हो गए थे। उन्होंने अपने माथे पर तिलक लगाया और ईश्वर के सामने हाथ जोड़कर बस इतना ही कहा—"प्रभु, परीक्षा लंबी है, पर भरोसा अटूट है।" उनके चेहरे पर भय की जगह अब एक गंभीर और शांत योद्धा के भाव थे। सोम और उनके वही पुराने, निष्ठावान साथी अपनी गाड़ियों के साथ घर के बाहर तैयार खड़े थे।

​अदालत परिसर की तरफ बढ़ती हुई गाड़ियों में सन्नाटा पसरा हुआ था। सब जानते थे कि आज का दिन बेहद संवेदनशील है। जैसे ही गाड़ियाँ जिला न्यायालय के भारी लोहे के गेट से भीतर दाखिल हुईं, वकीलों की फौज, मुवक्किलों की भीड़ और पुलिसकर्मियों की आवाजाही के बीच अम्बुज ने कदम रखा। यह वही कोर्ट रूम था, जहाँ रोज़ाना न जाने कितने सच झूठ में और झूठ सच में तब्दील होते थे।

​अम्बुज के वकील ने आत्मसमर्पण (सरेंडर) की अर्जी कोर्ट के क्लर्क को सौंपी। कुछ ही घंटों की अदालती जिरह और औपचारिकताओं के बाद, न्यायाधीश के आदेशानुसार अम्बुज को न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया।

​अदालत के उस कटघरे से निकलकर सीधे जेल की वैन की तरफ बढ़ते हुए, अम्बुज के कदमों में कोई हिचकिचाहट नहीं थी। उन्हें पता था कि कलंकमुक्ति का मार्ग इस नर्क से होकर ही गुज़रेगा। शाम ढलते-ढलते जेल के ऊंचे, संतरी पत्थरों से बने मुख्य द्वार ने अम्बुज का स्वागत किया। लोहे के भारी-भरकम कपाट 'घड़घड़ाहट' की आवाज़ के साथ खुले और बंद हो गए।

​जेल की वह पहली रात बैरक नंबर चार की सूनी, ठंडी सीमेंट की पटिया पर गुज़री। यहाँ न तो कोई बिस्तर था और न ही घर की वो आत्मीयता। कँपकँपाती ठंड में कंबल ओढ़े अम्बुज ने जब ऊपर देखा, तो लोहे के सींखचों के पार आसमान में कुछ धुंधले तारे टिमटिला रहे थे।

​मन के भीतर द्वंद्व अब भी था, लेकिन उसमें तड़प नहीं, बल्कि एक ठहराव आ चुका था। वे सोचने लगे कि जिस व्यक्ति ने ताउम्र बच्चों को सही राह दिखाई, नैतिक मूल्य सिखाए, उसे आज अपराधियों, चोरों और डकैतों के बीच इस ठंडी रात को काटना पड़ रहा है। लेकिन तभी उनके भीतर का कवि जाग उठा। उन्होंने खुद से कहा—"अगर महर्षि वाल्मीकि डाकू से कवि बन सकते हैं, अगर लोकमान्य तिलक जेल की कोठरी में 'गीता रहस्य' लिख सकते हैं, तो मैं तो एक शिक्षक हूँ, एक कवि हूँ। ये दीवारें मेरे शरीर को बांध सकती हैं, मेरी सोच और मेरी कलम को नहीं।"

​इस जेल यात्रा के दौरान, अम्बुज के मन में घोर वैराग्य और आत्मबल का एक अनूठा संगम हुआ। उन्होंने तय कर लिया था कि वे इस विकट परिस्थिति के सामने घुटने नहीं टेकेंगे। जेल के भीतर की अव्यवस्था, कैदियों का आपसी तनाव और खाकी का रौब—सब कुछ उन्होंने बहुत करीब से देखा। वे हर पल को अपने भीतर समेट रहे थे, क्योंकि वे जानते थे कि यही अनुभव भविष्य में उनके इस उपन्यास और उनकी कवित्व शक्ति की सबसे मजबूत रीढ़ बनने वाले थे।

​दिन बीतते रहे, और बाहर उनके वफादार मित्र और सोम कानूनी मोर्चे पर दिन-रात एक किए हुए थे। बेल (जमानत) की अर्जियां तैयार हो रही थीं, सबूतों को जुटाया जा रहा था और उस 'खून से लिखे पत्र' की फोरेंसिक सच्चाई को अदालत के सामने लाने की बिसात बिछाई जा रही थी।

​अम्बुज जेल की सलाखों के पीछे ज़रूर थे, लेकिन उनका मन आज़ाद था। वे रोज़ सुबह बैरक के कोने में बैठकर ईश्वर का ध्यान करते और नीरज जी की उन पंक्तियों को याद करते जो अब उनका मूलमंत्र बन चुकी थीं—"संकटों में गर्व से मुस्कुराना सीख लो।" और सचमुच, जेल के अन्य कैदी भी उस शांत, गंभीर और चेहरे पर हमेशा एक हल्की सी मुस्कान रखने वाले 'गुरुजी' का सम्मान करने लगे थे।

​अंधेरी रात अपने चरम पर थी, लेकिन ६ जनवरी २०२५ की इस आत्मसमर्पण की अग्निपरीक्षा ने अम्बुज को भीतर से फौलाद बना दिया था। अब इंतज़ार था आज़ादी की उस पहली किरण का, जो बहुत जल्द उनकी चौखट पर दस्तक देने वाली थी।

अध्याय ६ समाप्त।


अध्याय ७: आज़ादी की पहली किरण और राहत की सांस

​६ जनवरी २०२५ को शुरू हुआ जेल की सलाखों के पीछे का वह समय किसी लंबी तपस्या जैसा था। बाहर की दुनिया में दिन और रात सामान्य रूप से बदल रहे थे, लेकिन जेल के भीतर हर एक सेकंड एक युग की तरह बीत रहा था। आखिरकार, अम्बुज के वफादार साथियों और सोम के अनथक प्रयासों, कानूनी दांव-पेचों और ईश्वर की असीम अनुकंपा से वह दिन भी आया जिसका सबको बेसब्री से इंतज़ार था।

१५ जनवरी २०२५ की वह दोपहर... सूरज कोहरे को चीरकर पूरी ताकत से चमक रहा था। न्यायालय से जमानत (बेल) का आदेश जेल की चौखट पर पहुँचा। कागजी औपचारिकताएं पूरी होने के बाद, 'खटाक' की आवाज़ के साथ जेल का वह भारी लोहे का दरवाज़ा खुला। अम्बुज ने नौ दिनों के बाद खुली हवा में सांस ली।

​जेल के बाहर सोम, उनके परम मित्र और बहिनें खड़ी आँखों में आँसू लिए उनका इंतज़ार कर रही थीं। जैसे ही अम्बुज बाहर आए, अपनों के आंसुओं का सैलाब उमड़ पड़ा। वह कोई साधारण मिलाप नहीं था, वह एक बेकसूर इंसान की अस्मिता की पहली आंशिक जीत थी। घर वापसी पर दो दिनों तक स्नान और शांति की कोशिशें हुईं, लेकिन अम्बुज जानते थे कि यह केवल एक पड़ाव है, मंजिल अभी दूर है। अभी सिर्फ जमानत मिली थी, कलंक का वह दाग पूरी तरह धुला नहीं था।

​अम्बुज की असली मानसिक और कानूनी लड़ाई का अगला पड़ाव आया २४ जनवरी २०२५ को। उच्च न्यायालय और जिला न्यायालय के बीच चल रही जिरह में अम्बुज के वकील ने पुख्ता सबूतों के साथ विपक्ष की साजिश की धज्जियां उड़ानी शुरू कर दी थीं। २४ जनवरी को अदालत ने मामले की गंभीरता और विरोधाभासों को देखते हुए अम्बुज को एक बहुत बड़ी कानूनी राहत प्रदान की। कोर्ट ने उनके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई और पुलिसिया उत्पीड़न पर सख्त रुख अपनाते हुए अंतरिम राहत के आदेश जारी कर दिए।

​३४ घंटे की हवालात, समाज का बहिष्कार, बेटे की वो कयामत की रात और जेल की कँपकँपाती रातों के बाद, २४ जनवरी २०२५ को अम्बुज ने जीवन में पहली बार 'राहत की असली सांस' ली। उनके घर में महीनों बाद चूल्हा पूरी गरिमा के साथ जला था और अपनों के चेहरे पर संतोष की लकीरें उभरी थीं।

​अध्याय ८: चक्रव्यूह के नए कांटे और आर्थिक तंगी

​राहत की सांस तो मिली थी, लेकिन नियति का क्रूर खेल अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ था। जमानत पर बाहर आते ही अम्बुज को समझ आ गया कि समाज की अदालत कानून की अदालत से कहीं ज्यादा निष्ठुर होती है।

​विलेन अनिल और उस षड्यंत्रकारी महंत को जब पता चला कि अम्बुज जेल से बाहर आ चुके हैं और उन्हें कोर्ट से राहत मिल गई है, तो उनकी बौखलाहट सातवें आसमान पर पहुँच गई। उन्होंने अपनी रणनीति बदली। अब उन्होंने सीधे तौर पर केस के मुख्य गवाहों और उन भोली-भाली लड़कियों के परिवारों को डराना-धमकाना शुरू कर दिया, ताकि वे कभी अदालत में सच न बोल सकें।

​"अगर गुरुजी के पक्ष में एक शब्द भी बोला, तो अंजाम अच्छा नहीं होगा," अनिल के गुर्गों ने सरेआम मोहल्ले में धमकी दी।

​इस सामाजिक दबाव का असर यह हुआ कि समाज के जिन लोगों के बच्चे अम्बुज के स्कूल में पढ़ते थे, उन्होंने डर और लोकलाज के कारण अम्बुज से पूरी तरह कतराना शुरू कर दिया। यहाँ तक कि रास्ते में मिलने पर लोग अपनी नज़रें फेर लेते या रास्ता बदल लेते थे। जिस शिक्षक को कभी पूरा कस्बा 'गुरुजी' कहकर सम्मान से शीश झुकाता था, आज उसी शिक्षक को एक सामाजिक अछूत की तरह देखा जाने लगा।

​परेशानियों का सिलसिला यहीं नहीं रुका। इस पूरे झूठे केस, पुलिस की रिश्वतखोरी (जिसका साक्षात रूप अम्बुज ने देखा था) और वकीलों की भारी-भरकम फीस ने अम्बुज की जमा-पूंजी पूरी तरह समाप्त कर दी थी। स्कूल की नौकरी और प्रबंधकीय स्थिति पर कानूनी अड़चनें आ चुकी थीं, जिसके कारण नियमित आय का स्रोत पूरी तरह बंद हो गया था।

​घर में राशन की किल्लत, बिजली के बिल और रोज़मर्रा के खर्चों के लिए भी अब संघर्ष करना पड़ रहा था। एक आत्मसम्मान से जीने वाले विद्वान के लिए आर्थिक तंगी का यह दौर किसी मानसिक प्रताड़ना से कम नहीं था। रह-रहकर मन में वही ग्लानि जाग उठती, लेकिन अम्बुज के भीतर का योद्धा अब हार मानने के लिए तैयार नहीं था। उन्होंने अपनी फटी जेब देखी, पर अपने स्वाभिमान को झुकने नहीं दिया। कंटकों का यह नया जाल उन्हें और मजबूत बनाने के लिए ही बुना गया था।

​अध्याय ९: तमस में उम्मीद की किरणें

​जब चारों तरफ से रास्ते बंद दिखाई दे रहे हों, तभी कहीं न कहीं से उम्मीद की एक महीन सी किरण फूटती है। घोर आर्थिक तंगी और सामाजिक बहिष्कार के इस तमस (अंधेरे) में अम्बुज ने अपनी कलम को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाने का फैसला किया।

​उन्होंने सोच लिया था—"यदि समाज ने मुझसे मेरी कक्षाएं छीन ली हैं, तो क्या हुआ? ज्ञान को बांटने से कोई ताला नहीं रोक सकता।"

​अम्बुज ने अपने घर के एक छोटे से कमरे में, बिना किसी शोर-शराबे के, उन गरीब और जरूरतमंद बच्चों को गुप्त रूप से मुफ्त में पढ़ाना शुरू किया, जो महंगे ट्यूशन की फीस नहीं दे सकते थे। धीरे-धीरे, बच्चों की पढ़ाई के प्रति उनकी निष्ठा देखकर कुछ प्रबुद्ध अभिभावकों का डर दूर होने लगा। वे समझने लगे कि जो व्यक्ति बच्चों के भविष्य के लिए इतना समर्पित है, वह कभी ऐसा घिनौना कृत्य नहीं कर सकता।

​इसी दौर में अम्बुज की साहित्यिक चेतना पूरी तरह जागृत हो गई। उन्होंने रातों को जागकर अपनी पीड़ा, व्यवस्था के खोखलेपन, पुलिस की अंधी कार्यप्रणाली और सत्य के संघर्ष पर कविताएं और संस्मरण लिखना शुरू किया। उनकी कलम अब कागज़ पर आग उगल रही थी।

​इस कठिन समय ने अम्बुज को एक और बड़ा सबक सिखाया—'सच्चे मित्रों की पहचान'। जहाँ उनके सैकड़ों तथाकथित दोस्त और रिश्तेदार पल्ला झाड़कर गायब हो चुके थे, वहीं सोम, उनका वह पहला अनथक साथी और दो-चार भले लोग चट्टान की तरह उनके साथ खड़े रहे। वे बिना मांगे अम्बुज के घर की जरूरतों का ख्याल रखते और हर अदालती तारीख पर अपनी जेब से गाड़ी का ईंधन जलाकर उनके साथ खड़े होते।

​इन सच्चे मित्रों की संगति और बच्चों की निश्छल मुस्कान ने अम्बुज के जीवन में संजीवनी का काम किया। तमस की रात अभी लंबी थी, लेकिन अब अम्बुज के हाथ में उम्मीद की एक ऐसी मशाल थी, जिसे अनिल या महंत की कोई भी आंधी बुझा नहीं सकती थी। केस अब अपनी अंतिम जिरह की ओर बढ़ रहा था।

अध्याय ७, ८ और ९ समाप्त।


अध्याय १०: सत्य की कसौटी और अदालती जिरह (२०२८)

​वक़्त कभी किसी के लिए नहीं ठहरता, न सुख के दिनों में और न ही विपत्ति के काल में। वर्ष २०२५ की वे कड़वी स्मृतियाँ अब धीरे-धीरे कानूनी दस्तावेजों और तारीखों में तब्दील हो चुकी थीं। समय का पहिया घूमकर वर्ष २०२८ पर आ पहुँचा था। इन तीन वर्षों में अम्बुज ने हर महीने अदालत के चक्कर काटे थे। समाज के तानों को सहा था, लेकिन उनके चेहरे की आभा और सत्य के प्रति उनकी निष्ठा कम नहीं हुई थी। अब यह मामला अपने सबसे निर्णायक दौर में प्रवेश कर चुका था—गवाहों के बयान और वकीलों की तीखी जिरह।

​ज़िला न्यायालय का कमरा नंबर १० खचाखच भरा हुआ था। दोनों पक्षों के वकील अपनी-अपनी फाइलों के साथ मुस्तैद थे। विपक्षी अनिल और उसके गुर्गे चेहरे पर एक बनावटी आत्मविश्वास ओढ़े अग्रिम पंक्ति में बैठे थे। लेकिन आज अम्बुज की आँखों में भय नहीं था; आज उनकी आँखों में एक शांत दृढ़ता थी, जो केवल उस व्यक्ति में होती है जिसका दामन पूरी तरह साफ हो।

​अम्बुज के वरिष्ठ वकील ने बेहद आक्रामक और रणनीतिक तरीके से मामले को अपने हाथ में लिया। उन्होंने अदालत के सामने सबसे पहला और सबसे मजबूत तर्क उन बच्चियों की गवाही का रखा, जिनसे जबरन दस्तखत कराए गए थे।

​"माई लॉर्ड," अम्बुज के वकील की गूंजती आवाज़ ने पूरे कोर्ट रूम में सन्नाटा पसरा दिया। "इस पूरे मामले की बुनियाद ही एक सोची-समझी राजनीतिक और व्यक्तिगत रंजिश पर टिकी है। २२ अगस्त २०२३ को जो कुछ भी स्कूल में हुआ, वह कोई जांच नहीं बल्कि एक पूर्व-नियोजित हमला था।"

​वकील ने अदालत के समक्ष उस दिन के सीसीटीवी फुटेज और कुछ स्वतंत्र गवाहों को पेश किया, जो अनिल के गुर्गों द्वारा लाठियों और हेलमेट से किए गए हमले की गवाही दे रहे थे। जब कोर्ट रूम में अम्बुज के सिर से बहते खून और लहूलुहान हालत की तस्वीरें पेश की गईं, तो वहां मौजूद हर शख्स का दिल दहल गया। न्यायाधीश महोदय ने भी उन तस्वीरों को बेहद गंभीरता से देखा। विपक्ष के वकील ने मामले को भटकाने की पूरी कोशिश की, लेकिन सच के अकाट्य साक्ष्यों के सामने उनकी दलीलें खोखली साबित होने लगीं।

​अध्याय ११: खून का सच और वैज्ञानिक साक्ष्य (२०२९)

​वर्ष २०२९ की शुरुआत के साथ ही इस मुकदमे में वह ऐतिहासिक मोड़ आया, जिसने विपक्षियों के पैरों के नीचे से जमीन खिसका दी। यह मोड़ था—उस 'खून से लिखे पत्र' की वास्तविकता का परीक्षण, जिसे अनिल और षड्यंत्रकारी महंत ने इंटरनेट पर वायरल रूपी बम की तरह इस्तेमाल किया था।

​अम्बुज के वकील ने कोर्ट के सामने एक सीलबंद रिपोर्ट पेश की। यह रिपोर्ट किसी साधारण लैब की नहीं, बल्कि राज्य की मुख्य फॉरेंसिक साइंस लैबोरेटरी (FSL) की थी। वकील ने मुस्कुराते हुए जज साहब की तरफ देखा और कहा—

​"हुजूर! इस केस का सबसे बड़ा 'ब्रह्मास्त्र' वह पत्र बताया गया था, जिसे कथित तौर पर पीड़ित लड़कियों ने अपने खून से लिखा था। राजनीति के आकाओं ने इसी पत्र को आधार बनाकर मेरी मुवक्किल की चारित्रिक हत्या की थी। लेकिन विज्ञान कभी झूठ नहीं बोलता। इस फॉरेंसिक रिपोर्ट को ध्यान से देखा जाए।"

​पूरे कोर्ट रूम की सांसें थम गईं। अनिल के चेहरे का रंग उड़ चुका था।

​वकील ने रिपोर्ट की मुख्य पंक्तियों को पढ़ते हुए कहा, "फॉरेंसिक जांच में यह पूरी तरह साबित हो चुका है कि उस पत्र पर मौजूद खून किसी जीवित मनुष्य की उंगली को काटकर या साक्षात रूप से नहीं निकाला गया था। वह खून एक कमर्शियल मेडिकल लैब से प्रिजर्वेटिव (anticoagulant) मिलाकर लाया गया था, जिसे एक खास तापमान पर रखा गया था ताकि वह जमे नहीं। इतना ही नहीं, उस पत्र पर की गई लिखावट और लड़कियों के वास्तविक लिखावट के नमूनों में जमीन-आसमान का अंतर है। यह पत्र पूरी तरह से अनिल और उसके सहयोगियों द्वारा रचित एक घिनौना, वैज्ञानिक षड्यंत्र है।"

​इस वैज्ञानिक साक्ष्य के सामने आते ही अदालत में कानाफूसी शुरू हो गई। सरकारी वकील के पास भी इस फॉरेंसिक रिपोर्ट का कोई काट नहीं था। जो लड़कियां पहले दबाव में थीं, वे भी अब अदालत के इस रुख को देखकर सच बोलने का साहस जुटाने लगीं। उनमें से दो मुख्य लड़कियों ने अदालत के सामने फूट-फूट कर रोते हुए स्वीकार कर लिया कि "गुरुजी हमारे पिता समान हैं, उन्होंने कभी हमसे कोई दुर्व्यवहार नहीं किया। काउन्सलर साहिबा और अनिल अंकल ने हमारे परिवारों को जान से मारने की धमकी देकर हमसे खाली कागजों और उस पत्र पर दस्तखत कराए थे।"

​सत्य का सूर्य अब बादलों की ओट से बाहर निकल रहा था। षड्यंत्र का वह चक्रव्यूह, जो बड़ी चालाकी से बुना गया था, विज्ञान और सत्य के प्रहार से तिनका-तिनका होकर बिखर चुका था। अब बारी थी अंतिम फैसले की।

अध्याय समाप्त


​भाग ४: सुखांत: योद्धा का उदय (२०३१)

​अध्याय १२: वर्ष २०३१: न्याय का ऐतिहासिक फैसला

​समय की नदी अपने पूरे वेग से बहती रही। वर्ष २०२९ के उस फॉरेंसिक खुलासे के बाद कानून का पलड़ा पूरी तरह अम्बुज के पक्ष में झुक चुका था। अगले दो वर्ष अदालत की अंतिम बहसों, लिखित दलीलों और गवाहों के बयानों को दर्ज करने में बीते। और देखते-देखते वर्ष २०३१ का वह ऐतिहासिक दिन भी आ गया, जो अम्बुज के जीवन की नियति को हमेशा-हमेशा के लिए बदलने वाला था।

​जिला एवं सत्र न्यायालय का मुख्य कक्ष आज खचाखच भरा हुआ था। हर तरफ सुरक्षा के कड़े इंतजाम थे। इस केस पर पूरे प्रदेश की नजरें थीं, क्योंकि इसमें खाकी, राजनीति और एक निर्दोष शिक्षक के सम्मान का दांव लगा था। कटघरे में अम्बुज शांत चित्त खड़े थे, उनके दोनों हाथ स्वतंत्र थे, लेकिन मन में एक आध्यात्मिक संतोष था। दूसरी तरफ अनिल, सुनील और उनके रसूखदार आका आज सिर झुकाए खड़े थे।

​ठीक दोपहर १२ बजे न्यायाधीश महोदय अपनी कुर्सी पर विराजे। कोर्ट रूम में पिन-ड्रॉप साइलेंस छा गया। जज साहब ने चश्मा ठीक किया, फाइलों के पन्ने पलटे और फैसला पढ़ना शुरू किया।

​"इस न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किए गए सभी साक्ष्य, फॉरेंसिक रिपोर्ट और गवाहों के बयानों से यह पूरी तरह स्पष्ट है कि आरोपी अम्बुज के खिलाफ लगाया गया मामला पूरी तरह से मनगढ़ंत, सुनियोजित और राजनीति से प्रेरित था।"

​न्यायाधीश की गंभीर आवाज़ पूरे कक्ष में गूंज रही थी। उन्होंने आगे कहा:

​"एक पवित्र पेशे से जुड़े शिक्षक को बदनाम करने के लिए जिस तरह मेडिकल लैब से खून लाकर फर्जी पत्र तैयार किया गया, वह न केवल एक गंभीर अपराध है बल्कि हमारी सामाजिक चेतना पर भी कलंक है। पुलिस ने भी राजनीतिक दबाव में आकर अपनी शक्तियों का दुरुपयोग किया और कानून की स्थापित मर्यादाओं (२४ घंटे की कस्टडी) का उल्लंघन कर बेकसूर को ३४ घंटे तक बंधक बनाए रखा। यह न्यायालय पुलिस की इस कार्यप्रणाली की तीखी भर्त्सना करता है।"


​और अंततः वह पंक्तियाँ आईं, जिसने पिछले आठ साल के तमस को एक झटके में मिटा दिया:

"अतः यह न्यायालय अम्बुज को उनके ऊपर लगे सभी आरोपों से ससम्मान बाइज्जत बरी (कलंकमुक्त) करता है। साथ ही, मुख्य साजिशकर्ता अनिल, सुनील और उनके सहयोगियों के खिलाफ फर्जी दस्तावेज बनाने, गवाहों को डराने और न्यायालय को गुमराह करने के जुर्म में तत्काल मुकदमा दर्ज कर उन्हें हिरासत में लेने का आदेश देता है।"

​न्यायाधीश का हथौड़ा मेज पर पड़ा—'ठक, ठक'।

​अदालत का कमरा तालियों की गड़गड़ाहत और अम्बुज के शुभचिंतकों के आंसुओं से भर गया। सोम ने तुरंत आगे बढ़कर अम्बुज के पैर छुए और उन्हें गले लगा लिया। अम्बुज की आँखों से आंसुओं की अविरल धारा बहने लगी, लेकिन ये आँसू कमजोरी के नहीं, बल्कि आठ साल की तपस्या के सफल होने के थे। सत्य का सूर्योदय हो चुका था।

​अध्याय १३: योद्धा की वापसी: कंटकों में मुस्कुराता पुष्प

​अदालत के उस ऐतिहासिक फैसले की गूंज पूरे शहर में फैल गई। जो अखबार कभी अम्बुज की चारित्रिक हत्या की हेडलाइन छापते थे, आज उन्हीं अखबारों के पहले पन्ने पर बड़े अक्षरों में छपा था—"शिक्षक अम्बुज बेकसूर, बाइज्जत बरी; साजिशकर्ता भेजे गए जेल।"

​शाम को जब अम्बुज अपने घर पहुँचे, तो नज़ारा बिल्कुल बदला हुआ था। समाज, जिसने कभी उनसे अपनी नज़रें फेर ली थीं, आज उनके स्वागत में पलकें बिछाए खड़ा था। मोहल्ले के मुख्य द्वार पर फूलों के हार लेकर लोग खड़े थे। ढोल-नगाड़ों की थाप पर बच्चे झूम रहे थे। जो लोग कभी रास्ता बदल लेते थे, आज वे अम्बुज के चरणों की धूल छूने के लिए आतुर थे।

​लेकिन अम्बुज का व्यक्तित्व इन सब चीजों से ऊपर उठ चुका था। वे इस झूठी वाहवाही से विचलित नहीं हुए। वे सीधे अपने घर के भीतर गए, अपनी दोनों बहनों के सिर पर हाथ रखा और अपने उस बहादुर बेटे को गले से लगा लिया, जिसने अपने पिता के लिए एक रात हवालात की प्रताड़ना झेली थी। पिता और पुत्र का वह आलिंगन साक्षात न्याय की साक्षात प्रतिमूर्ति था।

​अगले ही सप्ताह, राजकीय सम्मान के साथ अम्बुज को उनके विद्यालय के प्रधानाचार्य पद पर पुनः बहाल किया गया। जब वे दोबारा स्कूल के मुख्य द्वार से भीतर प्रविष्ट हुए, तो सभी शिक्षक, कर्मचारी और छात्राएं कतारबद्ध होकर उनके स्वागत में खड़े थे। हवा में राष्ट्रगान की धुन गूंज रही थी और तिरंगा पूरी शान से लहरा रहा था।

​अम्बुज अपने दफ़्तर की उसी कुर्सी पर जाकर बैठे, जहाँ से २२ अगस्त २०२३ को उन्हें लहूलुहान करके उठाया गया था। उन्होंने अपनी मेज पर रखी उसी कलम को उठाया और डायरी के पहले पन्ने पर बड़े अक्षरों में लिखा—"कलंकमुक्ति: सत्य का सूर्योदय"

​रात को जब वे अपने कमरे में लेटे, तो खिड़की से छनकर आ रही चाँदनी आज बेहद शांत और शीतल लग रही थी। मन का सारा द्वंद्व, सारी कुंठा और सारा दर्द हमेशा के लिए शांत हो चुका था। वे एक विजेता, एक सच्चे योद्धा के रूप में समाज के सामने खड़े थे।

​अम्बुज ने धीरे से अपनी आँखें मूंदीं। उनके होठों पर एक गहरी, आत्मिक मुस्कान तैर गई और उनके अंतर्मन में गोपालदास नीरज की वे पंक्तियाँ अब एक नए और अमर अर्थ के साथ गूंज उठीं:

कंटकों में पुष्प से खिलखिलाना सीख लो।

झंझटों में दर्द से स्वर मिलाना सीख लो।

लाख खुशियाँ मिलेंगी जीवन में तुम्हारे,

संकटों में गर्व से मुस्कुराना सीख लो...।


​हाथों की हथकड़ियाँ टूट चुकी थीं, कलम जीत चुकी थी। योद्धा अपने घर लौट आया था।

​..:: उपन्यास पूर्ण ::..








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