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कलंक मुक्ति- सत्य का सूर्योदय

  कलंकमुक्ति: सत्य का सूर्योदय ​अध्याय १: अंतर्मन का द्वंद्व और नीरज की संजीवनी ​कमरे में पसरा सन्नाटा किसी गहरे कुएँ की तरह था, जिसमें गिरती हुई हर सांस की गूंज साफ़ सुनाई दे रही थी। चारपाई पर सीधे लेटे अम्बुज की आँखें छत की कड़ियों को बिना पलक झपकाए निहार रही थीं। खिड़की से छनकर आ रही चाँदनी भी आज कमरे के अंधियारे को चीरने में नाकाम साबित हो रही थी। मन के भीतर विचारों का एक ऐसा चक्रवात चल रहा था, जिसकी गति को थाम पाना अम्बुज के वश में नहीं था। ​जब जीवन एक ऐसे चौराहे पर आकर खड़ा हो जाए जहाँ हर रास्ता गहरी खाई की तरफ जाता हो, तब मनुष्य का विवेक भी डगमगाने लगता है। अम्बुज के साथ भी यही हो रहा था। रह-रहकर उनके कानों में हिंदी साहित्य के महान कवि गोपालदास नीरज की वो अमर पंक्तियाँ गूंज उठतीं— ​ "कुछ सपनों के मर जाने से, जीवन नहीं मरा करता है।" ​जीवन में जब भी कभी छोटी-मोटी परेशानियाँ आईं, अम्बुज ने हमेशा इन्हीं पंक्तियों को गुनगुनाकर खुद को संभाला था। वे अपने विद्यार्थियों को भी यही सिखाते थे कि परिस्थितियाँ कैसी भी हों, जीवन की गति कभी नहीं रुकनी चाहिए। लेकिन आज? आज जब व...

ये मेंहदी वाले पाँव

 रंजित नव-नूतन आभा से, ये मेहँदी वाले पाँव। करते मुखरित मृदु नूपुर से, सुकुमार सजीला चाँव॥ पद-पद्मों की यह अरुण कांति, हर लेती मन का ताप, मृदु गमन देख विस्मित समीर, मिट जाता संसृति-ताप। आगमन सुभग इनका ऐसा, ज्यों मरुथल में हो ठाँव, रंजित नव-नूतन आभा से, ये मेहँदी वाले पाँव॥ कुमकुम-मंडित ये चरण-कमल, रचते सुख का संसार, कल्याणमयी इन पग-ध्वनि से, गुंजित होता घर-द्वार। इस पावनता के सम्मुख तो, फीका पड़ता हर दाँव, रंजित नव-नूतन आभा से, ये मेहँदी वाले पाँव॥ मंजुल महावर की रेखा में, अंकित अमिट अनुराग, गृहिणी बनकर जब कदम बढ़े, जागा गृह का सौभाग्य। पुलकित हो उठती अमराई, शीतल कर देती छाँव, रंजित नव-नूतन आभा से, ये मेहँदी वाले पाँव॥ सुर-लोचन विस्मित देख रहे, भू पर लक्ष्मी का रूप, संस्कृति का अनुपम शृंगार, यह गरिमा-मयी अनूप। जिस ओर मुड़ें ये सुभग चरण, तर जाता वह भी नाव (नाँव) रंजित नव-नूतन आभा से, ये मेहँदी वाले पाँव॥