कलंक मुक्ति- सत्य का सूर्योदय
कलंकमुक्ति: सत्य का सूर्योदय अध्याय १: अंतर्मन का द्वंद्व और नीरज की संजीवनी कमरे में पसरा सन्नाटा किसी गहरे कुएँ की तरह था, जिसमें गिरती हुई हर सांस की गूंज साफ़ सुनाई दे रही थी। चारपाई पर सीधे लेटे अम्बुज की आँखें छत की कड़ियों को बिना पलक झपकाए निहार रही थीं। खिड़की से छनकर आ रही चाँदनी भी आज कमरे के अंधियारे को चीरने में नाकाम साबित हो रही थी। मन के भीतर विचारों का एक ऐसा चक्रवात चल रहा था, जिसकी गति को थाम पाना अम्बुज के वश में नहीं था। जब जीवन एक ऐसे चौराहे पर आकर खड़ा हो जाए जहाँ हर रास्ता गहरी खाई की तरफ जाता हो, तब मनुष्य का विवेक भी डगमगाने लगता है। अम्बुज के साथ भी यही हो रहा था। रह-रहकर उनके कानों में हिंदी साहित्य के महान कवि गोपालदास नीरज की वो अमर पंक्तियाँ गूंज उठतीं— "कुछ सपनों के मर जाने से, जीवन नहीं मरा करता है।" जीवन में जब भी कभी छोटी-मोटी परेशानियाँ आईं, अम्बुज ने हमेशा इन्हीं पंक्तियों को गुनगुनाकर खुद को संभाला था। वे अपने विद्यार्थियों को भी यही सिखाते थे कि परिस्थितियाँ कैसी भी हों, जीवन की गति कभी नहीं रुकनी चाहिए। लेकिन आज? आज जब व...