ये मेंहदी वाले पाँव

 रंजित नव-नूतन आभा से, ये मेहँदी वाले पाँव।

करते मुखरित मृदु नूपुर से, सुकुमार सजीला चाँव॥


पद-पद्मों की यह अरुण कांति, हर लेती मन का ताप,

मृदु गमन देख विस्मित समीर, मिट जाता संसृति-ताप।

आगमन सुभग इनका ऐसा, ज्यों मरुथल में हो ठाँव,

रंजित नव-नूतन आभा से, ये मेहँदी वाले पाँव॥


कुमकुम-मंडित ये चरण-कमल, रचते सुख का संसार,

कल्याणमयी इन पग-ध्वनि से, गुंजित होता घर-द्वार।

इस पावनता के सम्मुख तो, फीका पड़ता हर दाँव,

रंजित नव-नूतन आभा से, ये मेहँदी वाले पाँव॥


मंजुल महावर की रेखा में, अंकित अमिट अनुराग,

गृहिणी बनकर जब कदम बढ़े, जागा गृह का सौभाग्य।

पुलकित हो उठती अमराई, शीतल कर देती छाँव,

रंजित नव-नूतन आभा से, ये मेहँदी वाले पाँव॥


सुर-लोचन विस्मित देख रहे, भू पर लक्ष्मी का रूप,

संस्कृति का अनुपम शृंगार, यह गरिमा-मयी अनूप।

जिस ओर मुड़ें ये सुभग चरण, तर जाता वह भी नाव (नाँव)

रंजित नव-नूतन आभा से, ये मेहँदी वाले पाँव॥

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