बना रही है रील
जिम्मेदारी भाग भाग कर, बना रही है रील।
कालचक्र में उलझी दुनिया, होते रिश्ते सील।
गर्दन को लटकाएं देखें, बड़ा अजूबा यन्त्र।
जैसे इसमें मिल जाता है, जीवन का कुछ
मन्त्र।
दांत निपोरे समझ रहे हैं, इसे बतासा खील।
कालचक्र-----
बलिबेदी पर संवेदन
की,चढा रहें हैं भेंट।
अरमानों के फड़ पर आकर पत्ते रहें हैं फेंट।
लोकलाज के
चौराहों पर, द्रोपदियों की डील।
कालचक्र-----
भजन आरती लगें उबाऊ,देख रहे अश्लील।
गोरी की आंखों में खोजे, मानसरोवर झील।
चौपाई में कब मिलती है, डी जे वाली फील।।
कालचक्र----
मोबाइल पर सुपरफास्ट है अंगुलियों के नर्तन।
नई रील हित पीट रहीं है,
ग्रहदेवी जी वर्तन।
ब्रेकफास्ट का पता नहीं है, उपवासों पर मील।
कालचक्र----
देर
रात तक चले जागरण, अलसाती है भोर।
सपनों में है मादक नर्तन,कहीं पपीहा मोर।
तुलसी
के गमलों पर कब्जा, करते रोज करील।। कालचक्र--
[
सूर्य किरण की आभा से,प्रमुदित सभी दिशायें।
तरुओं की शाखाओं पर,खगकुल स्वर में गायें।
प्रात मिलन की अगवानी में,विकल खड़ीं हैं कलियां।
भृमरों के आलिंगन को,षोडस कला दिखायें।
भीषण ताप देखकर भू पर, अनुनय मनुज करें।
तप्त धरा के आंगन में अब, खगकुल ना विचरें।
अनुकूलन में दोहन निशिदन,करते सभी मिले,
बोते पेड़ बबूलों के फिर, हालत क्यों सुधरें।
स्वयं प्रस्फुटित भावों को जब , मधुरिम स्वर मिल जाएं।
शुष्क मरुस्थल के कण कण में,नव पल्लव खिल जाएं।
त्याग समर्पण मनोभाव की,मन में प्रीत जगाकर,
सच्ची श्रद्धा से हर युग में,प्रस्तर भी हिल जाएं।
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