सावन की बरसात

 *सावन की बरसात।*


तप्त दुपहरी का सपना है , सावन की बरसात।

घोर घटा से तड़ित  दामिनी,करती मन की बात।।


घोर अमावस की रातों में  ,बना रहा विस्वास।

प्राची का सूरज लाता था, किरणों में उल्लास।

उम्मीदों ने जिंदा रक्खे, अंतर के जज्बात।। 1


कभी रूठना कभी मनाना, ये जीवन के अंग।

अनसुलझे धागों से गुम्फित,मरते दम तक संग।

विविध रंगों से बनी रंगोली,बांट रही सौगात।। 2


निर्जन उपवन में बोए थे, आशाओं  के बीज।

अपने इस सन्तोषी मन में,कभी न लाये खीझ।

रोक न पायी संध्या रानी,अपनी नूतन प्रात।। 3


चढ़ते सूरज से अठखेली,करती नितप्रति शाम।

फुलस्टॉप के कम अवसर थे,केवल अल्प विराम।

शब्दों की मरहम लगते  ही, ठीक   हुए आघात।। 4


सात जन्म के रिश्ते वाली,है जीवन की सीख।

विस्वासों को डिगा न पायें , चना चबैना ईख।

मन में पंख लगाए रहती,सपनों  की बारात।। 5

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