गीदड़ के दरबार
मिर्च मसाले तक सीमित हैं,
आज सभी अखबार।
महिमामंडन खलनायक का,
चला रहे सरकार।
युग परिवर्तन की वेला में,
लगा भयंकर रोग।
दुष्टों के हिस्से में आता,
माखन मिश्री भोग।
चाटुकार का अभिनन्दन है,
भक्तों को फटकार।-----------(1)
उच्च सुरों में गायन करते,
कोरस में अब काग।
पूँछ दबाकर विस्मित होते,
कोयल के अनुराग।
चूहों सम्मुख मौन खड़ी है,
विषधर की फुसकार।----------(2)
आज बदलियों ने करली है,
धवल चांदनी कैद।
उसकी नब्ज पकड़कर बैठे,
अज्ञानी कुछ वैद्य।
बीच भंवर में डुबा रहे हैं,
केवट की पतवार।-------------(3)
असुर वृत्ति को अमृत प्याला,
भक्त करें विषपान।
सिंघासन चढ़ गंगू देखें,
भोजराज अवसान।
सिंहों की पंचायत होती,
गीदड़ के दरबार।---------------(4)
डॉ राजीव कुमार पाण्डेय
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