हाहाकार मचा है

 हाहाकार मचा है


महाकाल से अनुनय इतनी, रख्खो रूप विराट।

यमराज का  मर्दन करके, खाली कर दो  घाट।

हाहाकार मचा है

महाप्रलय के विकट रूप से 

साँसे हैं आतंकित।

दानव दल दैत्यों के सम्मुख,

भयभीत आशंकित।

क्रूर काल की फैली जिव्हा,दो जड़ से तुम काट।


जहर घुला है खुली हवा में,

प्राणवायु का टोटा।

मानवता का दानवता ने , 

गला पकड़कर घोंटा। 

जीवन रक्षक प्रणाली को ,रहे दबाकर चाट।

हाहाकार मचा है।


कहीं कलाई सूनी होती, 

कहीं पुँछते सिंदूर।

साँसे भी सब गिरबी रख दी,

फिर भी हैं मजबूर।  

चिंताओं की जली चिता पर,चढ़ते रोज़ ललाट।

हाहाकार मचा है।


तालाबंदी किरणों की है,

तमस निशा का जीता।

उम्मीदों के तटपर आकर,

पाया घट है रीता।

नौनिहाल के आंसू भी अब, जोह रहे हैं बाट।

हाहाकार मचा है।


सभी सहारे बेसहारे हैं, 

इस युग की पीड़ा में,

किसके घर का दीप बचेगा, 

तांडव की क्रीड़ा में।

वृद्धजनों  के सम्मुख उठती, नौजवान की खाट।

हाहाकार मचा है।

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