अपने आप झरें
*अपने आप झरें*
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अपने मन की करुण कथा को,
जब अभिव्यक्त करें।
मेघ नयन के अश्रु इस लिये,
अपने आप झरें।
मेरे मनभावों को पढ़ना, बिल्कुल छोड़ दिया।
प्रीति रीति के दरवाजों से, रिश्ता तोड़ दिया।
गली गली में रौद्र रूप की,
परतें अब उघरें।
मेघ नयन के अश्रु इस लिये,
अपने आप झरें।
जंगल से शिखरों तक हमने,कड़वा घूँट पिया।
संस्कार के घर मे रहकर, परहित धर्म जिया।
घनीभूत पीड़ा को लेकर,
कब तक हम विचरें।
मेघ नयन के अश्रु इस लिये,
अपने आप झरें।
प्राणवायु का गला घोंटना, युग की परिपाटी।
सुबक रही है अवशोषण में, अब पर्वत घाटी।
अकुलाहट के मौन अधर पर,
संवेदन उभरें।
मेघ नयन के अश्रु इस लिये,
अपने आप झरें।
आशाओं की बूढ़ी अँखियां ,उगल रही पानी।
करुण कहानी कहने आई,हिमनद की नानी।
घोर घटा के यौवन रथ पर,
अल्कावलि बिखरें।
मेघ नयन के अश्रु इस लिये,
अपने आप झरें।
कठिन परीक्षा काल भोगकर, संयम ना छोड़ा।
दायित्यों के परिचालन में ,मुख को ना मोड़ा।
तीब्र तड़ित सह वारिद मुख पर,
गर्जन विकट धरें।
मेघ नयन के अश्रु इस लिये,
अपने आप झरें।
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