आखिरी मुस्कान समीक्षा
"आखिरी मुस्कान " अंतस को झकझोरने वाली अद्वितीय कृति
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हिंदी साहित्य की गहराई में जाकर शब्दों से खेलते हुए, लेखक ने मनु और मधुरेश के रिश्ते की शुरुआत अत्यंत ही आध्यात्मिक और साहित्यिक अंदाज में शुरू की l हिंदी के जटिल लेकिन सुधर शब्दों का आश्रय लेते हुए उपन्यासकार ने अपनी साहित्यिक परिपक्वता का बोध पाठकों कराते हुए लिखा कि.....
" भाउकता अंतस का आभूषण है और आभूषणों की दमक से कोई भी अछूता नहीं रह सकता मधुरेश बोला "
उपन्यास के प्रथम भाग में पुरुष एवं स्त्रियों के अधिकारों और कर्तव्यों का मंथन करते हुए,मधुरेश और मनु के विचार, आपस में प्रश्नोत्तर करते हुए प्रतीत होते हैं l
उपन्यास के प्रारंभ से ही लेखक ने उपमा, उपमेय और अलंकारों का आश्रय लेते हुए, प्रत्येक संवादों को साहित्य सजाने पर जोर दिया है, जैसे...
" पिछले कई घंटों से हृदय में संगीत की देवी की प्रतिमा को मन में सजाएं बैठा हूं और आप कह रही हैं कि किससे बातें कर रहे हैं "
इस बहुपक्षीय उपन्यास के प्रारम्भिक पक्ष से यदि हम चर्चा प्रारम्भ करें,तो मधुरेश के जीवन का प्रारम्भिक दौर कुछ ऐसा होता है कि..
मधुरेश को बचपन से ही परिवार की जिम्मेदारियों का बोध है l मधुरेश को यह नहीं समझ में आ रहा था कि उसका बचपन कहां खो गया है l
इसे उपन्यासकार अपने शब्दों के माध्यम से बड़े सुंदर ढंग से चित्रित करते हुए लिखता है कि...
" इन सारी जिम्मेदारियों ने उसके बचपन को छीन लिया था l खुशियां गिरवी रख दी थी "
मां और बेटे की श्रम और सामर्थ्य का प्रतिफल यह हुआ कि उन्होंने अपने प्लाट पर दो कमरों का मकान खड़ा कर लिया l
अपनी आत्मा के दमन के दम पर मधुरेश आखिरकार शादी की स्वीकृति भी देता है और अपने संस्कार और माँ के सम्मान तथा अपने कर्तव्य बोध को कायम रखता है l
उपन्यास के अगले भाग में सरिता के प्रस्ताव पर मधुरेश की विवशता को उपन्यासकार, मधुरेश के इन पंक्तियों के साथ हल निकालता है कि..
" आपके प्रश्नों का उत्तर कल मिल जाएगा और उसका जवाब लिफाफे में बंद फोटोग्राफ था..
उपन्यास की एक भाग में, मनु के रूप में पत्नी का कर्तव्य बोध दर्शाया गया है,तो वही तरुण के रूप में, उपन्यासकार ने एक निर्दयी, क्रूर, पुरुष प्रधान समाज के चेहरे को निरूपित किया है,जिसमें तरुण के मुंह से अपनी पत्नी के लिये निकली हुई अभद्र गालियां तथा उसके चरित्र पर लगाए गए लांछन को उपन्यासकार ने बिम्बित किया है l वही लेखक ने मनु के दुर्गा स्वरूप, को दिखाते हुए नारी की प्रतिशोध अग्नि की ज्वाला को भी अपने उपन्यास में दिखाने का प्रयास किया है l
तरुण और मनु के बीच का द्वंद तलाक तक जाता है l
तलाकशुदा की स्त्री की सामाजिक,पारिवारिक दशा एवं उसके चरित्र पर लगाए गए लांछन पर सजीव प्रकाश डालते हुए लेखक लिखता है कि...
" हर मोड़ पर धोखे हैं जवानी में,जिसे झेला था मनु ने "
मधुरेश का हिमाचल प्रवास और प्रणम्य से मिलना, प्रकृति के साथ, कवि ह्रदय,प्रकृति के व्यक्ति का स्वाभाविक मिलन प्रतीत होता है l जहां प्रणम्य प्रकृति के गोद में खेलती सुंदरी है, तो मधुरेश कवि ह्रदय रसिक है l
लेकिन जब प्रकृति सुंदरी, मधुरेश पर पाशा फेकते हुए कहती है..
" कल दस बजे तक तुम्हारा इंतजार करूंगी और उस दिन नहीं आए तो तुम्हारे नाम का नोट लिखकर,यहां से कूदकर जान दे देगी, और तुम्हें जिंदगी भर जेल में सड़ना होगा "
ऐसे खतरनाक जाल में फंसा मधुरेश, वीणा को इस फंदे से बचने का साधन बना कर लाता है
उपन्यासकार ने मधुरेश के स्त्री मैत्री जैसी कमजोरी को, प्रारंभ से अंत तक केंद्र में रखा है..
एक समीक्षक के रूप में, इस उपन्यास को पढ़ने के बाद, कुछ पंक्तियां मेरे जेहन में आती है, जिन्हें हम अपने शब्दों में कुछ इस प्रकार व्यक्त कर सकते हैं....
" स्त्री मैत्री ने मधुरेश को पूरे उपन्यास में ऐसे झकझोरा है, मानो उसकी छीना झपटी हो रही हो l ऐसी स्थिति में उसका एक जगह स्थिर बने रहना ना सिर्फ मुश्किल हो रहा है, बल्कि उसके बाजुओं को उखाड़ने तक की नौबत आती हुई प्रतीत होती है "
उपन्यासकार के लिखे इस उपन्यास के कथानक को पढ़कर, समीक्षक के दिमाग में यह कौतुहल होता है कि आखिरकार ऊंट किस करवट बैठेगा,
उपन्यास के एक भाग मे, जब मधुरेश की पत्नी वीणा मनु से कहती है..
" तुम्हें अपना आपरेशन कराना होगा "
वीणा मनु को अपने इस प्रस्ताव के माध्यम से मधुरेश से दूर करना चाहती है...
" लेकिन मनु को यह सब बातें तुच्छ लग रही थी l वह सहसा बोली कि यह तो मेरे लिए छोटी बात हैl मैं अपना प्रमाण पत्र सौंप दूंगी "
उपन्यासकार अपनी लेखनी से, पूरी कहानी को इस प्रकार पलट कर रोचक बना देता है l
लेकिन अभी भी ऊंट सही करवट नहीं बैठा है..
उपन्यासकार अपने उपन्यास के अंत में अपने पाठक को असमंजस, उहापोह की गलियों से गुजारते हुए ऐसे मोड़ पर पहुंचाने में सफल होता है जहां..
मनु का हाथ मधुरेश के हाथ में देकर, वीणा की आंतरिक प्रसन्नता उसके अधरों पर आकर मुस्कान के रूप में बिखर जाती है और वह पंचतत्व में विलीन हो जाती है l वीणा के निर्जीव चेहरे की "आखिरी मुस्कान" को अपने ऐतिहासिक उपन्यास का शीर्षक देकर, उपन्यासकार ने पाठक की दृष्टि में, इस उपन्यास को संपूर्ण बनाने की सफलता हासिल कर ली है l
राजेश कुमार सिंह "श्रेयस"
कवि लेखक, समीक्षक
लखनऊ, उप्र
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