समीक्षाएं
तुमसे क्या छिपाना-राजेश कुमार सिंह,लखनऊ
*क्षयमुक्त भारत की परिकल्पना में प्रेम का तड़का लगाता है उपन्यास 'तुमसे क्या छिपाना'।*
उपन्यास वर्तमान युग की लोकप्रिय साहित्यिक विधा है आज की युग चेतना इतनी गुफित और असाधारण हो गयी है कि इसे साहित्य के किसी अन्य रूप में इतने आकर्षक और सहज रूप में प्रस्तुत करना दुष्कर है किन्तु उसे उपन्यास पूरी सम्भावना और सजीवता के साथ उपस्थित करता है। इसलिए अनेक विद्वानों ने उपन्यास को आधुनिक युग का महाकाव्य कहा है।
उपन्यास जीवन के लघुतम और साधारणतम तथ्यों को भी पूर्ण स्वच्छता तथा स्पष्टता के साथ प्रस्तुत करता है।
उपन्यास शब्द उप समीप तथा न्यास थाती के योग से बना है जिसका अर्थ है (मनुष्य )के निकट रखी वस्तु अर्थात वह वस्तु या कृति जिसको पढ़कर ऐसा लगे कि हमारे ही जीवन का प्रतिबिंब है उपन्यास।
संस्कृत में "उपन्यास: प्रसादन:।" अर्थात प्रसन्न करने को ही उपन्यास कहते हैं।
एक अन्य परिभाषा के अनुसार -
"'उपपत्ति कृतोहार्थ उपन्यास: सनकीर्तित।"
कहने का अर्थ है किसी अर्थ को युक्ति युक्ति रूप से उपस्थित करना उपन्यास कहलाता है।
इन्हीं सन्दर्भो में आज मॉरीशस के प्रकांड विद्वान हिंदी कहानी उपन्यास क्षणिका आदि के बड़े साहित्यकार रामदेव धुरन्धर के साहित्य का श्री राजेश कुमार सिंह श्रेयस के लेखन पर गहरा प्रभाव पड़ा है।
जिस लेखक के बारे में कहा जाता है कि पहले कुदाल उठाई फिर कलम ।
जिसने अपने जीवन में सघर्ष झेला हो उस संघर्ष को उसके लेखन में परिलक्षित होना स्वाभविक ही है। श्री रामदेव धुरन्धर का चर्चित उपन्यास "पथरीला सोना" छः खण्डों में प्रकाशित है। इस महाकाव्यात्मक उपन्यास में किसान मजदूरों के रूप में भारत से मॉरीशस गए अपने पूर्वजों की संघर्षमय जीवन यात्रा का कारुणिक चित्रण किया है। इसके साथ धुरन्धर साहब की छोटी मछली बड़ी मछली , चेहरों का आदमी , बनते बिगड़ते रिश्ते, पूछो इस माटी से , विष मंथन, जन्म एक भूल, आदि प्रकाशित कृतियों का श्री राजेश सिंह श्रेयस जी ने विशद अध्ययन किया है। उसी अध्ययन की भट्टी में तपकर *तुमसे क्या छिपाना* निकला है। जिस प्रकार धुरन्धर साहब का शिल्प कैमरे से खींचा गया चित्र सा लगता है। उसी प्रकार श्रेयस जी जी के उपन्यास में लगता है।
धुरन्धर साहब के बारे में अध्ययन करने पर पता चलता है कि उनके पिताजी पढ़े लिखे नहीं थे लेकिन वो गुने बहुत थे। उन्होंने माँ सरस्वती का कलेण्डर लाकर अपने पुत्र से कहा था कि विद्या प्राप्ति के लिए नित्य ही उनका वन्दन करें।
वह एक साल का कलेण्डर था किंतु दीवार से कभी उतारा नहीं गया। जब नया घर बना तब उस घर में भी सरस्वती की मूर्ति स्थापित की गई।
श्री राजेश सिंह श्रेयस जी पर बहुत बड़ा प्रभाव श्री धुरन्धर जी का है। प्रातः काल में जागरण करके वो लगभग 2घण्टे प्रतिदिन लिखते हैं । उन पर माँ सरस्वती की पूरी कृपा है। इसी कृपा कोर इस उपन्यास की परिणित हुई जो हमारे समक्ष है।
किसी भी उपन्यास की समीक्षा उसके तत्वों के आधार पर की जाती है। 11 अध्याय की कथावस्तु कुछ इस प्रकार है। उपन्यास की नायिका देवंती है जिसके माता टीवी की बीमारी से मर जाती है पिता ही उसका पालन पोषण करता है उसकी पढ़ाई और खेल को प्रोत्साहित करने के लिये झूलन महाजन से 20000 हजार रुपया उधार लेता है। तभी बीच में वैश्विक महामारी कोरोना आ जाता है जिसमें वह भी स्वर्ग सिधार जाता है।
देवंती एकादश की छात्रा है जिसकी मित्रता शशांक से हो जाती है और यही मित्रता प्यार में परिवर्तित हो जाती है।
शशांक का मित्र भावेश है जो टीवी हॉस्पिटल में है जिसके साथ वह भी उसी सेवा भाव में लग जाता है। बाद में एन जी ओ तक का सफर तय होता है
लेकिन इस उपन्यास में प्यार और जीवन का वास्तविक संघर्ष दोनो एक साथ चलते हैं। किसी कारणवश अपने घर से शशांक अपने पिताजी के व्यवहार से अंसतुष्ट होकर भाग जाता है और नोयडा पहुँच जाता है। तभी कोरोना पाँव पसार लेता है। उसे एक सोसायटी में मैनेजर की नौकरी मिल जाती है । वहीं फ्लेट नम्बर 215 में डॉ साहनी जी रहते है जिससे उसकी निकटता बढ़ जाती है। उनकी पत्नी की कोरोना काल मे बहुत मदद करता है लेकिन प्रभु को प्यारी हो जाती है। उसका स्वयं का पुत्र गुरुग्राम से नहीं आता है तभी डॉ साहनी अपने पुत्र से सम्बंध विच्छेद कर लेते हैं और शशांक को ही अपना पुत्र मान लेते है।
इधर शशांक की याद में उसकी माँ अस्पताल तक पहुँच जाती है। उसी समय देवंती भावेश की सलाह पर झूठ बोलकर उसके प्राण बचाती है।
देवंती के पिता ने जो कर्ज लिया था उसके बदले महाजन के घर नौकरी करनी पड़ती है । गाँव का सुधीर हो या महाजन का बेटा रामानन्द उनकी गिद्ध दृष्टि देवंती के यौवन पर है। लेकिन वह अपने को बचाने के लिये झूठे मुक़दमे में फस जाती है।
इधर शशांक वापिस घर आ जाता है और प्राणपण से देवंती की सहायता करता है किसी प्रकार सेठ के नौकर निर्मल की गवाही से बाइज्जत बरी हो जाती है सेठ और उसके बेटे को जेल हो जाती है।
एन जी ओ का काम तेजी से चलता है प्रधानमंत्री के उस संकल्प को पूरा करने के लिए कि 2025 तक भारत को क्षय रोग से मुक्त करना है।
जिस दिन जेल से मुक्ति हुई पिता के विरोध के कारण शादी को मंदिर में किया जाता है जहाँ अपने माता पिता को यह कहकर बुलाया जाता है कि एक अनुष्ठान रखा है। उसके पिताजी और जसबन्त की दृष्टि देवन्तिनके 12 विस्वा जमीन पर टिकी है। इसीलिए विरोध है।
जयमाला पहनाते हुए अपना सच बताते हुए देवंती कहती है-
" मिस्टर ज्वाय तुमसे क्या छिपाना मैं टी वी चैंपियन हूँ।
शशांक भी कहता है -
"यदि तुम टीवी चैंपियन हो तो मैं भी टी वी वारियर हूँ। मुझे तुमसे ही शादी करनी है।"इसके साथ ही जयमाला पहना दी।
मिस्टर साहनी ने दोनों को आशीर्वाद दिया नोयडा का एक फ्लैट भी गिफ्ट किया अपना पुत्र मानते हुए। उपन्यास का प्रारम्भ और समापन जिन पंक्तियों से होता है उन्हें यहॉं उद्धृत कर रहा हूँ।
क्षयमुक्त होगा राष्ट्र अपना, स्वस्थ होगी भारती।
समृद्धि भी आकर उतारेगी हमारी आरती।।
उपन्यास के प्रमुख पात्र देवंती सुखदेव, ,शशांक, रामचन्द्र, भावेश, सीमा, जसवंत, राजकुमारी, झूलन ,रामानन्द, सुधीर, निर्मल डॉ साहनी,आदि हैं अन्य लगभग सौ पात्र है जो कथा को विस्तार देते हैं।
भाषा की दृष्टि से वास्तविक उसी भाषा का प्रयोग किया गया है जिसकी आवश्यकता है। ग्रामीण अंचल की भाषा इसी एक वाक्य से ज्ञात हो जाती है-
"भैंसिया विशुक गयी है, गोरस गर्म कर रही हूँ।"
संवाद योजना में अध्याय 6 से एक संवाद देखिए
"नमस्ते चाचा।" सुखवंती ने साड़ी का पल्लू ठीक करते हुए कहा।
"फिर कवनो जाँच पड़ताल चल रहा है बिटिया।"सुक्खू ने पूछा।।
" हाँ चाचा टीवी रोगियन की खोजे वदे एक अभियान चला है ,ओहिमा हम घरे घरे जईवे और पता करिबे कि कहुका दुइ हफ्ता से ऊपर खांसी तो ना आवत है या कहुका संझा को बुखार ते न आवत है अगर यहि सब लक्षण मिलिहैं तो हम सबै ओहिका बलगम का जाँच करैइवै और अगर जाँच मा टीवी निकरी, तो ओहिका पूरा कोर्स का दवा चलावा जहिये। बस यहमा सबका जागरूक करे का जरूरत है।"
उपन्यास का काल लगभग 8 वर्ष का है 2013 से 2021 तक का कालखंड लिया गया है । यहां 2025 का मोदी जी का संकल्प क्षयमुक्त भारत को दर्शाया गया है।
चाहता तो उपन्यास कर उपदेशक बन सकता किन्तु इस लालच से बचते हुए इस महत्वपूर्ण सूक्ति से नायिका देवंती के चरित्र को उभारा है।
जेल से जमानत मिलने पर जब देवंती मोटर साइकिल पर बैठी है।
अपने मर्यादा के दुपट्टे को ठीक से लपेट लिया ताकि बदनीयत की तेज हवाएं उसे दोबारा न उड़ा ले जायें।
उपन्यास का मुख्य उद्देश्य भारत को टी वी (क्षय) से मुक्त कराना है उपन्यासकार अपने उद्देश्य में सफल भी हुआ है।
उपन्यास का शीर्षक "तुमसे क्या छिपाना" बिल्कुल समीचीन है। क्योंकि अब यह छिपाने की नहीं बल्कि बताकर इलाज कराने का युग है। प्रमुख पात्र देवंती अंतिम पृष्ठ पर अपने होने वाले पति से कहती है
"अब तुमसे क्या छिपाना मैं टीवी चैंपियन हूँ।"
उपन्यास में कई कष्टों एवं दुखों का वर्णन किया है फिर भी सुखांत बन गया है। यह उपन्यास क्षयरोग निवारण के साथ साथ प्रेम की पराकाष्ठा को भी स्पर्श करता है। एक सामाजिक उपन्यास के सभी तत्व विद्यमान हैं । उपन्यासकार को एक श्रेष्ठ सर्जना के लिये बधाई देते हुए आशा करते हैं कि वे अपनी लेखनी से माँ भारती का भंडार भरेंगें।
समीक्षा 2
मानव मन की संवेदना *मैं सौन्दर्य हूँ,मुझे मत छुओ*
अनिल पालीवाल जी द्वारा रचित प्रथम काव्य संग्रह 'मैं सौन्दर्य हूँ,मुझे मत छुओ' में मानव मन की संवेदनाओं को स्वर मिला है। माँ शारदा के चरणों में चढ़ाया गया यह प्रथम काव्य पुष्प अपनी अपनी सुरभि बिखेर कर वातायन को गन्धित कर रहा है।
माँ शारदा की कृपा से इस संग्रह का प्रारम्भ भी वाणी वन्दना से किया गया है। देवभूमि उत्तराखंड के मूल निवासी आजकल राष्ट्रीय राजधानी परिक्षेत्र में में इंजीनियरिंग क्षेत्र में अपनी सेवाएं देते हुए काव्य के क्षेत्र में अपनी विशिष्ट प्रतिभा को निखार रहे हैं।
भवनों के नक्शे डिजाइन करते- करते शब्दों के भी मानचित्र खड़े करने में सिद्धहस्त हो रहें है श्री अनिल पालीवाल जी।
काव्य संग्रह की शीर्षक रचना 'मैं सौंदर्य हूँ मुझे छुओ मत'
सिर्फ देखो ! पर समाप्त होती है कविता; जिसमें आध्यात्मिकता के दर्शन होते है।
भजन महारास के साथ इष्ट के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हुए आगे बढ़े हैं आप। काव्य संग्रह की कवितायें सहज ढंग से प्रारम्भ होकर गम्भीर होती जाती है यही कवि की कसौटी है।
अनिल पालिवाल जी द्वारा प्रणीत प्रथम काव्य सँग्रह के प्रकाशन पर अपनी हार्दिक शुभकामनाएं व्यक्त करता हूँ और आशा करता हूँ भविष्य में अन्य पुस्तकें भी माँ भारती का भंडार भरेंगी।
समीक्षा 3-जयप्रकाश अग्रवाल, काठमांडू
*सहमी सहमी गहमागहमी*
बागमती नदी के तट पर बसे काठमांडू में भगवान पशुपतिनाथ के सानिध्य में कलम के धनी वरिष्ठ साहित्यकार श्री जयप्रकाश अग्रवाल जी सहमी सहमी घाटियों और वादियों में अपनी कलम से गहमा गहमी करते दृष्टि गोचर हो रहे हैं। 1968 से 1972 के मध्य की यादों के झरोखों से प्रकाश पुंज ऐसे निकल रहा है जैसे प्राची से किरणें।
कहीं हस्ताक्षर पदाक्षर होते हैं तो कहीं आँसू मुस्काते हैं।वहीं भू पर बिखरे मोती सागर में कलम डुबाती है। अग्निपरीक्षा कविता मन के भावों को उद्देलित करती फिर वही प्रश्न वाचक चिन्ह छोड जाती है। जो परिस्थितियां त्रेता काल में थी वही आज के समाज मे भी विद्यमान हैं- अग्निपरीक्षा कविता की ये पंक्तियां ह्रदय को झकझोर देती हैं-
"पर अच्छा हुआ,नहीं तो भविष्य में तुम्हें भी भूमिगत होना पड़ता।
सीता का भाग्य दोहराया जाता,त्रेता के बाद कलि में वही गीत गाया जाता।"
गीता का वह सन्देश जिसमें कर्म को प्रधानता दी ही ही श्री अग्रवाल जी ने अपनी कविता श्रम गान में बहुत सुंदर वर्णन पढ़ते पढ़ते याद आ जाती हैं ये पंक्तियां
कस्तूरी कुंडल बसे------
यही भाव इन पंक्तियों में देखिए-
कस्तूरी मृग सा पागल फिरता,
आनन्द हेतु उठता गिरता।
तेरा आनन्द तुझमें ही है।
कस्तूरी गन्ध तुझमें ही है।
फिर क्यों फिरता मारा मारा,
योन बुझा बुझा हारा-हारा।
जग तेरा हो सकता ,
गर श्रम से दुनिया धो सकता।
श्रम के महत्व को रेखांकित करके श्री अग्रवाल जी ने अपने कवि धर्म को निभाया है। कविता की भाषा सपाट बयान बयाजी नहीं होती बल्कि उपमान और प्रतीक कथ्य को सम्बल प्रदान करते है। एक बहुत छोटी सी कविता इस ग्रन्थ की 'अभिनय' कवि की कल्पना शक्ति को परिलक्षित करती है-
"देखे नृत्यरत गीत आज,
ज्यों कल्पना अभिनीत आज।
मदमत्त काव्य साकार हुआ,
या मचल उठा संगीत आज।
या चित्र लिखित चित्रलेखा,
जब तेरा अभिनय देखा।"
श्री जयप्रकाश अग्रवाल जी एक नैसर्गिक कवि हैं जिन्हें छात्र जीवन से माँ सरस्वती का वरदहस्त प्राप्त है। वे अपनी कलम के माध्यम से प्राकृतिक दृश्यों का सजीव वर्णन करते हैं तो आज की विसंगतियों पर पर भी करारा प्रहार करते हैं। श्रृंगार की पराकाष्ठा को बड़े सहज ढंग से कह जाते हैं।
बिम्ब कविता की प्रारंभिक पंक्तियों को रेखांकित करने से अपने आप को रोक नहीं या रहा हूँ-
ज्यों ही,
तुमने दर्पण उठाया
चटक गया
क्योंकि
हर खूबसूरत चीज
अपने
सुंदर को देखते ही
जाती है चटक।।
कविता वही प्रभावी होती है जो कम शब्दों में अपना असर छोड़ जाए।
"उपहार" कविता को पाठकों के समक्ष रखकर अपने समीक्षक धर्म का पालन करना चाहता हूँ
एक दर्द भरा उपहार दिया,
मैंने भी स्वीकार किया।
गरल समझकर पी डाला,
आँखों से बह निकली हाला।
मैंने तुमको ठाव पहचाना अंतर्मन जा भाव भी जाना।
प्रिये!
यह तुमने कैसा प्यार किया,
एक दर्द भरा एहसास दिया।
श्री जयप्रकाश अग्रवाल ऐसे अद्भुत कवि हैं जो किसी भी जटिल बात को सहज रूप से कहने की सामर्थ्य रखते हैं।
"आँसू पी खून, मैंने महल बनाया है" विचारों की झूठन कविता की पंक्तियों में हकीकत भी है और आज का दर्द भी। ऐसे ही इस ग्रन्थ की अंतर्यात्रा करते हुए मैंने इस ग्रन्थ को आत्मसात किया है।
भाषा और बिम्ब की कसौटी पर कसते हुए कवि की शैली व्यंग्यात्मक भी हो जाती है।
प्रारम्भिक जीवन की यादों को बड़े मन से कलमबद्ध करके सहेजा है श्री जयप्रकाश अग्रवाल जी ने। इन यादों में यदि पाठक अपने आप को कहीं न कहीं पा अवश्य लेगा यही इस ग्रन्थ की सफलता होगी। पाठकों का प्यार और स्नेह इस ग्रन्थ को गरिमा प्रदान करेगा।
मेरी शुभकामनाएं कृतिकार के साथ हैं आशा है कि श्री जयप्रकाश अग्रवाल की कलम अबाध गति से चलते हुए माँ भारती का भंडार भरेगीं।
समीक्षा 4-अनुराग मिश्र 'गैर',लखनऊ
अद्भुत गज़लों का गुलदस्ता - खेत के पाँव
-----------------------------------------------
ख्याति प्राप्त शायर ज़नाब अनुराग मिश्र 'ग़ैर' के सद्य प्रकाशित ग़ज़ल संग्रह 'खेत के पाँव' में महबूबा महबूब की शाइरी भी है तो आज की विद्रूपता का असल चेहरा भी है।इश्क से मानवता तक की ग़ज़लों का संग्रह न केवल पठनीय है बल्कि संग्रहनीय भी है।
पुस्तक की समीक्षा से पूर्व ग़ज़ल क्या है इस पर चर्चा कर लेना समीचीन है।
हिन्दी काव्य शास्त्र का आधार पिंगल या छन्दशास्त्र है लेकिन ग़ज़ल क्योंकि सबसे पहले फ़ारसी में कही गयी इसलिये इसके छ्न्द शास्त्र को इल्मे-अरूज़ कहते है।
एक बात स्पष्ट करना आवश्यक है कि बिना बहर क ग़ज़ल आज़ाद नज़्म होती है ग़ज़ल कतई नहीं। और आज़ाद नज़्म का काव्य में कोई वजूद नहीं है। लेकिन शायर अनुराग मिश्र की गज़लें बहर में हैं।
वर्णों का समूह रुक्न और रुक्न का बहुवचन अरकान होता है। इन्हीं अरकानों के आधार पर फारसी में बहरें बनीं।
मूल रूप से आठ अरकान हैं-
फ़ा-इ-ला-तुन(2-1-2-2)
मु-त-फा-इ-लुन((1-1-2-1-2)
मस-तफ-ई-लुन((2-2-1-2)
मु-फा--ई-लुन(1-2-2-2)
मु-फा-इ-ल-तुन(1-2-1-1-2)
मफ-ऊ-ला-त(2-2-2-1)
फा-इ-लुन(2-1-2)
फ़ारसी में 18 बहरों में ग़ज़ल कही गयी है । श्री ग़ैर की ग़ज़ल बहर में है। ये एक सिद्धहस्त शायर की पहचान है।
वैसे गज़ल का प्रत्येक शेर स्वतंत्र होता है। यदि एक ही विषय पर लिखी गयी ग़ज़ल है तो उसे ग़ज़ल मुसल्सल कहते हैं।
ग़ज़ल के बहर के इल्म को अरूज़(छंदशास्त्र)कहते हैं और इसका इल्म रखने वाले को अरुजी(छंदशास्त्री) कहा जाता है।
इस किताब की भूमिकाओं में कई जाने माने अरुजी हैं जिनका आशीष मिला है श्री ग़ैर जी को।
ग़ज़ल में दो चीजें महत्वपूर्ण हैं मश्क(अभ्यास)और सब्र(धैर्य)। जो इसे अपनाते हैं वे बड़े शायर हो जाते हैं। ये दोनों ही चीजें श्री अनुराग मिश्र 'ग़ैर' को बड़ा शायर बनातीं हैं।
श्री ग़ैर की ग़ज़लों की अन्तर्यात्रा में जो कुछ पाया उसे इस प्रकार रेखांकित करने का प्रयास किया है।
पुस्तक की पहली ग़ज़ल की पहली शेर बनी उसका शीर्षक-
धूप के फूल खिल रहे होंगे
खेत के पाँव जल रहे होंगे।
बुजुर्गों का आशीर्वाद हमेशा फलित रहा है-
बुजुर्गों की दुआओं का तो साया,
हमेशा सर पे अम्बर सा रहा होगा।
इक्यावनवीं ग़ज़ल में भी -
ये बापू की पाती है।
रखलो बेटे थाती है।
मोबाइल के इस युग में,
चिठ्ठी किसकी आती है।
सूर्य को भी औकात बताने वाले मिल ही जायेंगे।
टिमटिमाया सूर्य जुगनू की तरह,
अर्श पर जब भी घना कुहरा रहा।
माँ एक ऐसा पावन नाम जिसका हर कवि शायर वर्णन करता ही है
आँगन में इक धूप का टुकड़ा
सुनता बूढ़ी माँ का दुखड़ा।
एक नसीहत मां की-
सच की जीत हुआ करती है,
माँ यह बात कहा करती है।
न जाने गाँव कब लौटेगा बेटा,
गिने माँ उंगलियों पर साल अब तो।
एक मुस्कराहट पर तो ताजमहल भी बन जाते है-
दर्द को आसरा दीजिए,
कम से कम मुस्करा दीजिए।
सभ्यता के नाम पर कहाँ आ पहुँचे ,व्यंजना में देखिए-
पेड़ बरगद के अजाने हो गए,
यूकेलिप्टस क्या सयाने हो गए।
लोकतंत्र की विडम्बना का चित्र-
बचपन से मैं देख रहा हूँ,
दंगे में मुफ़लिस मरता है।
फूलों की किस्मत तो देखो
काँटो संग रहना पड़ता है।
शायर लिखता है-
केवल अपना ग़म लिखता हूँ,
मैं अब थोड़ा कम लिखता हूँ।
मृग मरीचिका जैसा जीवन,
फिर भी इसे सुगम लिखता हूँ।
आज रिश्ते गायब हैं, अपनापन कहाँ रह गया है-
मैं कबीर का चेला हूँ।
भीड़ में बहुत अकेला हूँ।
रात में हूँ तन्हा लेकिन,
दिन में पूरा मेला हूँ।
सत्ता जब गलत हाथों में पड़ जाये तो सोचना पड़ता है-
जब सिकन्दर महान होता है।
खौफ़ में ये जहान होता है।
कल्पना के लोक में उपमायें देता शायर-
क्षितिज में डूबने वाला है सूरज,
गगन सिंदूर फिर मलने लगा है।
ग़ज़ल में मोहब्बत की बात न हो ऐसा हो ही नहीं सकता है-
रेत पर नाम मेरा लिख के मिटा देता है।
वो फजाओं में मुहब्बत को छिपा लेता है।
दे दूँगा जान जिगर दोनों ही लेकिन,
मैं तेरी मुहब्बत को तोल रहा हूँ।
जब आये मधुमास प्रिये,
फूलों सी तू महका कर।
आसमां है बहुत बुलन्द मगर,
हुस्न के आगे सर झुकायेगा।
जमाने को अपनी खबर लग गयी है।
मुहब्बत को सबकी नजर लग गयी है।
रिश्ते सामने वाले को देखकर बदलने पड़ते है-
जब से वो ग़द्दार हो गया।
मैं भी कुछ खुद्दार होगया।
जैसे जैसे शायर आगे बढता है आध्यात्मिक हो गया है-
एक सांस का फेरा है।
लेकिन लम्बा डेरा है।
कुछ लेकर जाना है कब,
क्या तेरा , क्या मेरा है।
कवि शायर आशावादी स्वर जरूर रखता है
बात आगे न टाली जाएगी।
कोई सूरत अब निकाली जाएगी।
आयेगा सूरज नयी लेकर सहर,
देखना यह रात काली जाएगी।
सौवी ग़ज़ल का ये शेर जमीनी हकीकत को बयां करता है-
हारता जा रहा मैं हर बाजी,
कौन सकुनी सी चाल चलता है।
हो गया है खोखला बहुत मानव,
खुद की परछाईं से भी डरता है।
शायर की भाषा हिन्दी उर्दू मिश्रित है लेकिन आम जन की भाषा है कहीं भी दुरूह नहीं हुई है। यह बात उसके पक्ष में है क्योंकि अधिकतर शेरो शायरी के शौकीन पाठकों के हाथों में पहुंचकर अपना असर छोड़ेगी।
अंत में शायर को ढेर सारी शुभकामनाएं और आशाएं कि इसी प्रकार अन्य ग़ज़ल संग्रह भी माँ भारती का भंडार भरेंगे।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें