श्री हनुमान स्तुति

 



निसन्तान दशरथ हुए, पुरी अयोध्या धाम ।

तीन रानियों से चला, नहीं वंश का नाम।


पूजन वन्दन सब किया, पूजे सन्त समाज।

अग्निदेव पूरण करें, सबके बिगड़े काज।


घोर तपस्या से किया , अग्निदेव का यज्ञ।

मन्त्रों को खुद बोलते, जैसे कोई विज्ञ।


अग्निदेव खुश हो दिया, 'तस्मै' का एक पात्र।

इच्छित फल रानी मिले, खाएं इसको मात्र।


कौशल्या कैकई चखा ,सँग सुमित्रा स्वाद।

पल में सब के कट गए,जीवन के अवसाद।


पंख पसारे उड़  रही, नभ में कोई चील।

खीर पात्र को देखकर, उडने में दी ढील।


बिनु विलंब के ले गयी, नभ में खीर उड़ाय।

यही सोच मन में लिए ,आज पेट भर जाय।


ठिठकी लखिकर आश्रम, करने को विश्राम।

जहाँ अंजना माई का,चले भजन  अभिराम।


नभ में उड़ती चील को, रही अंजना देख।

गिरा चील के पात्र से, वहीं खीर की रेख।


मुख अंजना के गिरी, आकर के कुछ खीर।

खीर उदर  जाकर   लगी, माता हुई अधीर।


उदर अंजना के गयी, अग्निदेव की खीर।

आराधन शिव का हरे,सदा उदर की पीर।


चैत्र मास तिथि पूर्णिमा, शुक्ल पक्ष का योग।

मंगल था पावन दिवस,जननी का सुख भोग।


मात अंजना ने जने ,  हनुमान से   वीर।

सेवक बन जपते रहे,अपने प्रभु रघुवीर।


तन जनेऊ से हुआ, पावन  परम    पुनीत।

जन्मजात जिसको मिला, राम नाम संगीत।


पिता केसरी के हुए , पुत्र   बहुत  बलवान।

पवनपुत्र निशिदिन भजें,प्रेम सहित श्रीमान।


शिव के ग्यारेवें हुए ,    ये  हैं  रुद्र   अवतार।

जिनका सुमिरन कर सके,हम सबका उद्धार।


मिला जगत में सात को ,सदा रहे असितत्व।

इनमें इक हनुमान   हैं, जो  पाये    अमरत्व।


 विध्वंसक  हैं पाप  के, और  बांटते नेह।

बजरंगी कहते इन्हें,क्योंकि बज्र सी देह ।


स्वर्ण मुकुट सिर पर रखे,तन पर मात्र लँगोट।

हाथ गदा एक अस्त्र है, कवच पूँछ की ओट।


माता  सीता से लिया  ,  सिन्दूर का ज्ञान।

पोता पूर्ण शरीर पर ,करने प्रभु कल्याण।


ऐसे हनुमत  वीर को, जो करता है याद।

जीवन में  निर्भय बने, और रहे आबाद।


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