ग़ज़ल
आशाओं के पुष्प खिलेंगें, बंजर भूमि बुबाई से।
पछुआ की उम्मीदें कायम, पूरब की अंगड़ाई से।
जिम्मेदारी बोझ लिये है, जीवन अपने कंधों पर ,
पैबन्धों को टांक रहे हैं, हम अपनी तुरपाई से।
दो नावों में रखकर चलते,अपनी मंजिल पाने को
उनकी पीठें कब बच पाती, बेलन मार कुटाई से।
बाँहो में आकाश मिलेगा,दिली तमन्ना सुलग रही,
सम्बन्धों को चले बांधने,अपनी लिखी रुबाई से।
शायद कुछ अवशेष मिलेंगें,जाकरके हमें हड़प्पा,
उम्मीदों को पंख मिलेंगे , अबकी बार खुदाई से।
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