मैं दिये की रोशनी हूँ

 *मैं दिये की रोशनी हूँ।*


मैं दिए की रौशनी हूँ,

आंधियों से कब डरी हूँ।

भोर किरणों तक जली हूँ, 

आस पर उतरी खरी हूँ।

मैं दिये  की रोशनी हूँ।


सेविका बनकर किया है,

तम निशा का दूर हमने।

प्रेम में होता समर्पण 

नहीं किया मजबूर हमने।

उन पतंगो की कहानी,

आज तक दिल में धरी हूँ।

मैं दिये की रोशनी हूँ।


हर भटकती राह को भी,

आ रही गन्तव्य देती।

सब अधूरे प्रश्न को भी, 

बिन कहे मंतव्य देती।

काल को भी मात देकर,

नित्य ही नर्तन करी हूँ।

मैं दिये कि रोशनी हूँ।


दीप्ति, ज्योति और उजाला,

है  प्रभा सा नाम मेरा।

नाम सुनकर भागता है, 

नित्य ही भू से अँधेरा।

तन जलाकर चैन पाती,

व्योम से उतरी परी हूँ।

मैं दिये की रोशनी हूँ।


बाँटती आलोक जग को,

स्वयं को कब है निहारा।

टिमटिमाती मुद्दतों से,

 नापती ब्रह्मांड सारा।

रच नया संसार जाती,

भाग्य की कारीगरी हूँ।

मैं दिये की रोशनी हूँ।


*डॉ राजीव पाण्डेय*

टिप्पणियाँ

  1. बहुत ही सुंदर भावपूर्ण रचना आदरणीय
    हार्दिक बधाई आपको 💐💐

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