गुरूजी वन्दन बारम्बार

 दिव्य ज्ञान के अनुपम ज्ञाता,जगत निर्माता कुम्भकार।

सुप्त ह्रदय की वीणा के भी ,  कर देते है झंकृत तार ।

गुरूजी वन्दन बारम्बार।


पाषाणों के अधर प्रफुल्लित।

सघन वनों के पथ आलोकित।

पाकर शुष्क सुमन भी सौरभ

भ्रमरों को करते आकर्षित।

दिव्य अलौकिक अनुकम्पा से, मिट्टी को देते आकार।

गुरूजी  वन्दन बारम्बार।


डगमग  कदमों में है स्थिरता।

कोमल मन की दूर विकलता।

प्रश्न शेष ना   रहा  उत्तरित।

पाते चक्षु सदा   ही  दृढ़ता।

नाप रहे अपने क़दमों से,चंदा मामा का आकार।

गुरूजी  वन्दन बारम्बार।


विपुल सिंधु में सीप खोजते।

चट्टानों पर  फसल रोपते ।

हमसे जो टकराये अवयव,

अपने सिर को रहे नोचते।

लघुता में गुरुता को भरकर,रचते एक नया संसार।

गुरूजी वन्दन बारम्बार।


नीरवता भी मानव  मन की।

तमस निशा भू के आंगन की।

पीडाओं को  हरकर    देते,

निशिदिन शीतलता चन्दन की।

शांति पाठ के साथ पढ़ी है,क्रांति मन्त्र की इक हुँकार।

 गुरूजी वन्दन बारम्बार।


सिंधु सुखाते रीते घट में।

शक्ति बहुत अपने केवट में

नहीं डूबती कहीं किश्तियाँ

वापिस आती अपने तट में।

आस्था की डुबकी में खोजे,हम विज्ञानों के चमत्कार।

गुरूजी वन्दन बारम्बार।

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